IIT Kanpur के वैज्ञानिकों ने सुलझाई C5aR2 रिसेप्टर की रहस्यमयी गुत्थी

आईआईटी कानपुर के शोधकर्ताओं ने प्रोफेसर अरुण के. शुक्ला के नेतृत्व में हमारे इम्यून सिस्टम के एक रहस्यमयी रिसेप्टर 'C5aR2' की आणविक संरचना और काम करने के अनोखे तरीके (अटिपिकल सिग्नलिंग) को डिकोड कर लिया है। क्राईओ-ईएम (Cryo-EM) तकनीक की मदद से टीम ने एक नया चुनिंदा मॉलिक्यूल 'R8Y' भी विकसित किया है, जो भविष्य में सुरक्षित और अधिक प्रभावी दवाएं बनाने के मार्ग प्रशस्त करेगा।

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कानपुर (उत्तर प्रदेश) [भारत]: चिकित्सा और इम्यूनोलॉजी (प्रतिरक्षा विज्ञान) की दुनिया से आज एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक खबर सामने आ रही है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर के वैज्ञानिकों ने मानव शरीर के इम्यून सिस्टम में मौजूद एक ऐसे रिसेप्टर की रहस्यमयी गुत्थी को सुलझा लिया है जो दशकों से दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली बना हुआ था। प्रोफेसर अरुण के. शुक्ला के नेतृत्व में शोधकर्ताओं की एक टीम ने C5aR2 नामक इम्यून रिसेप्टर के एटॉमिक स्ट्रक्चर (परमाणु विवरण) और उसके काम करने के अजीबोगरीब व्यवहार को समझने में अभूतपूर्व सफलता हासिल की है।

हमारा शरीर हर पल बैक्टीरिया, वायरस और अन्य घातक पैथोजन्स (रोगजनकों) से लड़ता रहता है। इस लड़ाई में सबसे अग्रिम पंक्ति की रक्षा प्रणाली के रूप में हमारा कॉम्प्लीमेंट सिस्टम (Complement System) काम करता है। यह प्रणाली असल में प्रोटीनों और एंजाइमों की एक श्रृंखला होती है जो शरीर में आने वाले हानिकारक तत्वों को साफ करने का काम करती है। जब भी शरीर में कोई संक्रमण या चोट लगती है, तो यह सिस्टम एक नियंत्रित सूजन या जलन (inflammatory response) पैदा करने के लिए कुछ छोटे प्रोटीन रिलीज करता है जिन्हें कॉम्प्लीमेंट एनाफिलाटॉक्सिन (Complement Anaphylatoxins) कहा जाता है। ये छोटे प्रोटीन हमारी इम्यून कोशिकाओं की सतह पर मौजूद विशेष रिसेप्टर्स को सक्रिय करते हैं, जिन्हें ‘कॉम्प्लीमेंट एनाफिलाटॉक्सिन रिसेप्टर्स’ कहा जाता है।

इन्हीं में से एक प्रमुख एनाफिलाटॉक्सिन C5a दो अलग-अलग रिसेप्टर्स को एक्टिवेट करता है:

  1. C5aR1: जिसके बारे में विज्ञान को पहले से काफी जानकारियां उपलब्ध हैं।
  2. C5aR2: जो अब तक पूरी तरह से रहस्य के घेरे में था।

इस शोध के जरिए वैज्ञानिकों ने न केवल यह पता लगाया कि C5aR2 अपने साथी C5aR1 से संरचनात्मक रूप से कितना अलग है, बल्कि एक नया मॉलिक्यूल R8Y भी तैयार किया है जो विशेष रूप से C5aR2 को टारगेट करता है। यह खोज आने वाले समय में ड्रग डिजाइनिंग (दवा निर्माण) के पूरे परिदृश्य को बदलने की क्षमता रखती है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विकासक्रम (History of Receptor Research)

बायोमेडिकल साइंस के इतिहास पर नजर डालें तो रिसेप्टर्स और इम्यून सिस्टम के आपसी संबंधों को समझना हमेशा से एक लंबी और चुनौतीपूर्ण यात्रा रही है। 20वीं सदी के मध्य में जब वैज्ञानिकों ने पहली बार शरीर के ‘कॉम्प्लीमेंट सिस्टम’ की पहचान की, तो इसे केवल एक साधारण सुरक्षा कवच माना जाता था। लेकिन जैसे-जैसे समय बदला और तकनीक विकसित हुई, यह साफ हो गया कि यह सिस्टम अत्यधिक जटिल प्रोटीनों का जाल है।

परंपरागत रूप से, वैज्ञानिक जी-प्रोटीन कपल्ड रिसेप्टर्स (GPCRs) के काम करने के तरीकों का अध्ययन करते आए हैं। C5aR1 इसी श्रेणी में आता है जो कैनोनिकल (canonical) यानी पारंपरिक रास्तों से कोशिकाओं के भीतर सिग्नल भेजता है। इसके विपरीत, C5aR2 को हमेशा एक ‘अटिपिकल’ या गैर-पारंपरिक रिसेप्टर माना जाता रहा। इतिहास में कई दशकों तक वैज्ञानिकों के पास ऐसी तकनीक नहीं थी जिससे वे जीवित कोशिकाओं के भीतर मौजूद इन रिसेप्टर्स के आणविक स्तर (atomic level) की तस्वीरें देख सकें। अतीत में एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी (X-ray Crystallography) जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन उनकी अपनी सीमाएं थीं, विशेष रूप से सेल मेंब्रेन (कोशिका झिल्ली) के भीतर पाए जाने वाले लचीले रिसेप्टर्स की संरचना को पकड़ने में वे अक्सर नाकाम साबित होती थीं। यही कारण है कि C5aR2 का वास्तविक कार्य और उसकी बनावट लंबे समय तक एक अनसुलझा रहस्य बनी रही।

वर्तमान रुझान और तुलनात्मक विश्लेषण

आज का आधुनिक चिकित्सा विज्ञान स्ट्रक्चरल बायोलॉजी (Structural Biology) और प्रिसिजन मेडिसिन (Precision Medicine – सटीक दवाएं) की ओर तेजी से बढ़ रहा है। वर्तमान दौर में वैज्ञानिकों का मुख्य ध्यान इस बात पर है कि दवाएं शरीर में जाकर केवल बीमार हिस्से या विशिष्ट रिसेप्टर पर ही असर करें, जिससे उनके साइड-इफेक्ट्स को न्यूनतम किया जा सके।

इस संदर्भ में, IIT कानपुर का यह शोध वर्तमान ट्रेंड्स के साथ पूरी तरह मेल खाता है। टीम ने अत्याधुनिक क्रायोजेनिक-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (cryo-EM) तकनीक का उपयोग किया। यह तकनीक नमूनों को बेहद कम तापमान पर जमाकर उनके वास्तविक और प्राकृतिक रूप में परमाणु-स्तर की तस्वीरें लेने की अनुमति देती है।

C5aR1 बनाम C5aR2: एक तुलनात्मक विश्लेषण

शोधकर्ताओं ने अपनी जांच में पाया कि C5aR1 और C5aR2 के बीच एक बहुत ही दिलचस्प संरचनात्मक अंतर है:

विशेषता (Features)C5aR1 रिसेप्टरC5aR2 रिसेप्टर (नया खुलासा)
बाहरी हिस्सा (Extracellular Side)C5a प्रोटीन को बांधने के लिए समान संरचनाC5aR1 के समान ही दिखाई देता है
आंतरिक हिस्सा (Intracellular Side)पारंपरिक (Canonical) संरचनापूरी तरह से भिन्न और अद्वितीय संरचना
सिग्नलिंग तंत्र (Signaling Mechanism)कैनोनिकल पाथवे का उपयोग करता हैनॉन-कैनोनिकल (वैकल्पिक) पाथवे का उपयोग
दवाओं की सटीकता (Drug Targeting)पहले से कई दवाएं लक्षित हैंअब तक कोई विशिष्ट ड्रग उपलब्ध नहीं था

इस तुलना से स्पष्ट होता है कि C5aR2 का अंदरूनी हिस्सा पूरी तरह से अलग होने के कारण यह उन पारंपरिक सिग्नलों को आगे नहीं बढ़ा पाता जो अन्य सामान्य GPCRs बढ़ाते हैं। इसके बजाय, इसका दूरस्थ सिरा (distal sequence) कोशिकाओं के भीतर मौजूद अन्य गैर-पारंपरिक पार्टनर्स के साथ जुड़कर वैकल्पिक तंत्रों के जरिए काम करता है।

R8Y’ मॉलिक्यूल की खोज और भविष्य की राह

इस परमाणु विवरण का लाभ उठाते हुए प्रोफेसर शुक्ला की टीम ने R8Y नाम का एक नया मॉलिक्यूल डिजाइन किया है। इस मॉलिक्यूल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह से चुनिंदा (selective) है। यह केवल C5aR2 से जाकर जुड़ता है और C5aR1 को बिल्कुल भी प्रभावित नहीं करता।

अब तक वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि जब भी वे कॉम्प्लीमेंट सिस्टम को नियंत्रित करने वाली दवाएं बनाते थे, तो वे दोनों रिसेप्टर्स पर एक जैसा असर डालती थीं, जिससे सटीक परिणाम नहीं मिल पाते थे। लेकिन अब R8Y की मदद से दोनों रिसेप्टर्स की भूमिकाओं का अलग-अलग और सटीक मूल्यांकन किया जा सकेगा। यह वैज्ञानिकों को भविष्य में ऐसी दवाएं बनाने में मदद करेगा जो इम्यून सिस्टम से जुड़ी बीमारियों (जैसे अत्यधिक सूजन, ऑटोइम्यून विकार और गंभीर संक्रमण) का इलाज बिना किसी अनचाहे प्रभाव के कर सकेंगी। वैज्ञानिकों की टीम अब इस मॉलिक्यूल का परीक्षण जानवरों के मॉडल (animal models) पर करने की तैयारी कर रही है ताकि इसके सुरक्षित और प्रभावी होने की पुष्टि की जा सके।

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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