ग्रेटर निकोबार परियोजना के अंतर्गत एक बार फिर पर्यावरण बनाम विकास का मुद्दा चर्चा में है। विपक्ष ने आरोप लगाया है परियोजना दुनिया के सबसे खास पौधों और जानवरों के इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा सकती है और यह इलाका प्राकृतिक आपदाओं के लिए बहुत ज्यादा संवेदनशील है। इसके अलावा विपक्ष ने वन अधिकारों के उल्लंघन का भी आरोप लगाया है। हालांकि सरकार का तर्क है कि नीति आयोग तथा अन्य समितियों के अध्ययन करने के बाद ही इस परियोजना का निर्माण किया जा रहा है, जो रणनीतिक, व्यापारिक रूप से देश के हित में है।
क्या है ग्रेटर निकोबार परियोजना
ग्रेटर निकोबार द्वीप प्रोजेक्ट भारत सरकार की 72000 करोड़ लागत वाली एक बड़ी योजना है, जो ग्रेट निकोबार द्वीप पर विकास और रणनीतिक लाभ के लिए बनाई जा रही है। इसमें ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, इंटरनेशनल एयरपोर्ट , ऊर्जा संयंत्र और एक नया शहर बसाने की योजना शामिल है। इस प्रोजेक्ट की शुरुआत केंद्र सरकार ने 2021 में की थी। हालांकि इस प्रोजेक्ट के लिए द्वीप के लगभग 15 प्रतिशत जंगल काटे जाएंगे, जो वहां बड़ा पर्यावरण संकट बन सकता है। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार ने ‘प्रतिपूरक वनरोपण’ के रूप में प्रस्तावित समाधान दिया है।
अगर अवस्थिति की बात करें तो ग्रेट निकोबार द्वीप भारत की मुख्य जमीन से करीब 1,800 किलोमीटर दूर पूर्व में स्थित है। इस द्वीप पर इंदिरा पॉइंट भी है, जो इंडोनेशिया के सबसे बड़े द्वीप सुमात्रा से महज 170 किमी दूर है।

क्या हैं FRA से जुड़े विवाद
विपक्ष ने आरोप लगाया है कि अंडमान और निकोबार प्रशासन ने गलत तरीके से दावा किया कि FRA से जुड़े अधिकार “निपटा” दिए गए हैं और 13,075 हेक्टेयर वन भूमि को डायवर्ट करने के लिए मंजूरी दे दी गई। जबकि ट्राइबल काउंसिल ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया है। हालांकि सरकार ने FRA के मुद्दे पर बताया है कि निकोबार के इन क्षेत्रो में पहले से ही अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (आदिवासी जनजातियों का संरक्षण) विनियमन, 1956 लागू है, इसलिए FRA 2006 लागू करने की आवश्यकता नहीं।
समृद्ध जैव विविधिता के सामने कई चुनौतियां
ग्रेट निकोबार द्वीप ईकालजी के नजरिए से समृद्ध द्वीप है। यह सुंडालैंड ग्लोबल बायो डाइवर्सिटी हॉटस्पॉट के रूप में मान्यता प्राप्त है। जिसमें कैंपबेल बे राष्ट्रीय उद्यान, गैलाथिया राष्ट्रीय उद्यान, ग्रेट निकोबार बायोस्फियर रिज़र्व (जिसे UNESCO द्वारा मान्यता प्राप्त जैवमंडल संरक्षित क्षेत्र के रूप में विकसित किया गया है) स्थित हैं। इसके अलावा कई स्थानिक प्रजातियां जैसे निकोबार मेगापोड, डुगोंग और निकोबार ट्री श्रू (टुपैया निकोबारिका) भी पाई जाती हैं। माना जा रहा है प्रस्तावित विकास परियोजना से इस अद्वितीय पारिस्थितिकी को ज्यादा खतरा पहुँच सकता हैं।
क्या है FRA अथवा वन अधिकार अधिनियम 2006
इसे अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 के नाम से भी जाना जाता है। वन अधिकार अधिनियम 2006 आदिवासी और परंपरागत वनवासियों को उनके रिहायशी और उपयोग की जमीन पर अधिकार देता है। ये वही जमीनें हैं जिन पर वे पीढ़ियों से रह रहे हैं या उनकी रक्षा करते आ रहे हैं।
पात्रता शर्तों की बात करें तो वे आदिवासी समुदाय जो 13 दिसंबर 2005 से पहले से वनों में रह रहे हैं,इस कानून के तहत पात्र हैं। अन्य पारंपरिक वन निवासी (Other Traditional Forest Dwellers- OTFD) भी जो 13 दिसंबर 2005 से पहले कम-से-कम 75 वर्षों तक वनों में रह रहे हैं, वे भी इस अधिनियम के तहत अधिकारों का दावा कर सकते हैं।
क्या है अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (आदिवासी जनजातियों का संरक्षण) विनियमन, 1956
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (आदिवासी जनजातियों का संरक्षण) विनियमन, 1956, अंडमान की स्वदेशी जनजातियों की सुरक्षा के लिए बनाया गया एक कानून है, जो उनके पारंपरिक क्षेत्रों को सुरक्षित करता है और बिना अनुमति के प्रवेश को रोकता है, उल्लंघनकर्ताओं के लिए दंड का प्रावधान है। यह कानून सेंटिनली, जरावास जैसी जनजातियों के लिए कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है और बाहरी हस्तक्षेप को सीमित कर उनके अलगाव को बनाए रखने का प्रयास करता है। यह कानून उन क्षेत्रों को आरक्षित घोषित करता है जहाँ जनजातियाँ निवास करती हैं। किसी भी व्यक्ति के लिए इन क्षेत्रों में प्रवेश करना प्रतिबंधित है। अगर फिर भी जाना जरूरी है तो विशेष अनुमति की आवश्यकता होती है।
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आइए जानते हैं अंडमान निकोबार में पाई जाने वाली मुख्य जनजातियाँ
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में कई जनजातियां रहती हैं। नेग्रिटो प्रजाति की ग्रेट अंडमानी, ओन्गे, जारवा और सेंटिनली अंडमान द्वीप समूह में निवास करती हैं। वहीं निकोबार द्वीप समूह में मंगोलॉयड प्रजाति की शोम्पेन और निकोबारी जनजातियाँ पाई जाती हैं। ये जनजातियाँ शिकारी और संग्राहक हैं। बाहरी दुनिया से इनका संपर्क न के बराबर है। निकोबारी को छोड़कर, बाकी पांच जनजातियां विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) हैं।
ग्रेट अंडमानी: अंडमान द्वीपसमूह की यह सबसे बड़ी जनजाति रही है लेकिन जनगणना 2001 के अनुसार इनकी संख्या केवल 43 रह गई है। ऐतिहासिक रूप से इस जनजाति को एबरडीन की लड़ाई (वर्ष 1859) के लिये जाना जाता है।
ओंगे: 2001 की जनगणना के अनुसार, ओंगेस एक अर्द्ध-खानाबदोश जनजाति है जिसकी जनसंख्या 96 है। पारंपरिक रूप से प्रकृति पर निर्भर रहने वाले ये लोग अब सरकारी सहायता प्राप्त करते हैं और अपने डोंगी निर्माण तथा शिल्पकला (Canoe-Making And Crafts) के लिये जाने जाते हैं।
जारवा: मध्य और दक्षिण अंडमान के पश्चिमी तट पर रहने वाली एक खानाबदोश, शिकार-संग्रहकर्त्ता जनजाति हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, उनकी जनसंख्या 380 है।
सेंटिनली: यह एक शिकार और संग्रह करने वाली जनजाति है, जो उत्तरी सेंटिनल द्वीप पर निवास करती है और बाहरी लोगों के प्रति शत्रुतापूर्ण रहती है। हालाँकि वर्ष 1991 में इनके बीच कुछ समय के लिये मैत्रीपूर्ण संपर्क हुआ था, लेकिन ये लोग ज़्यादातर बातचीत से बचते हैं। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार, इनकी जनसंख्या 39 थी।
शोम्पेन: शोम्पेन में मंगोलॉयड विशेषताएँ हैं, जो अन्य नीग्रोइड विशेषताओं वाली जनजातियों (जैसे ग्रेट अंडमानी, ओन्गे, जारवा और सेंटिनली) से भिन्न हैं। शोम्पेन ग्रेट निकोबार में निवास करते हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के आँकड़ों के अनुसार, शोम्पेन जनजाति की अनुमानित जनसंख्या 229 थी।
निकोबारी: निकोबारी जनजाति निकोबार द्वीपसमूह के 19 द्वीपों में निवास करती है। इनकी उत्पत्ति मंगोलवंशीय मानी जाती है और इनकी जनसंख्या 27,000 से अधिक है।
ग्रेट निकोबार परियोजना अंडमान निकोबार द्वीप समूह के विकास के लिए बहुत बड़ी पहल है, लेकिन पर्यावरण को ध्यान में रखना भी ज़रूरी है। यह द्वीप एक बहुत समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र का निवास स्थान है, जिसमें एंजियोस्पर्म, फर्न, जिम्नोस्पर्म, ब्रायोफाइट्स की 650 प्रजातियाँ शामिल हैं। अतः सभी पक्षों को देखते हुए एक संतुलित विकास के साथ आगे बढ़ने की रणनीति बनाई जानी चाहिए।



