नई दिल्ली: जलवायु संकट अब सिर्फ बाढ़ या सूखे तक सीमित नहीं रह गया। एक ताजा रिसर्च ने खुलासा किया है कि गर्म हो रहे महासागरों में न्यूरोटॉक्सिन मर्करी का खतरा कई गुना बढ़ सकता है। स्वीडन की उमेआ यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने ब्लैक सी के गहरे तलछटों से प्राचीन डीएनए निकालकर यह राज खोला है। 9,000 से 5,500 साल पुरानी परतों में उन्होंने पाया कि जब पानी में ऑक्सीजन घटी, तो कुछ खास बैक्टीरिया ने साधारण मर्करी को उसके सबसे जहरीले रूप मिथाइलमर्करी में तब्दील कर दिया। यह जहर चेन रिएक्शन की तरह फैलता है, छोटे जीवों से बड़ी मछलियों तक, और आखिरकार हमारी थाली तक। आज के दौर में, जहां समुद्री डेड जोन्स (ऑक्सीजन-रहित क्षेत्र) फैल रहे हैं, यह पुरानी घटना एक बड़ा खतरे का संकेत दे रही है।
बैक्टीरिया का छिपा खेल: मर्करी से जहर कैसे बनता है?
मिथाइलमर्करी की खौफनाकी इसी में है कि यह बायोमैग्निफिकेशन के जरिए घातक हो जाता है। प्लैंकटन इसे सोख लेते हैं, फिर छोटी मछलियां प्लैंकटन निगलती हैं, और बड़े शिकारी मछलियां सबको चट कर जाती हैं। हर स्टेप पर इसकी मात्रा दोगुनी-तिगुनी हो जाती है। वजह? समुद्र की गहराई में ऑक्सीजन की कमी। ऐसे हालात में कुछ सूक्ष्मकाय जीव खासकर वे जो hgcA जीन लिए घूमते हैं, मर्करी को ‘मिथिलेट’ कर देते हैं, यानी उसे चिपचिपा और घुलनशील बना देते हैं। जलवायु बदलाव ने इस प्रोसेस को और आसान कर दिया है। गर्म पानी स्थिर हो जाता है, शैवालों का फूलना ऑक्सीजन चुरा लेता है, और बाकी काम बैक्टीरिया के हवाले। बाल्टिक सी जैसे तटीय इलाकों में ये ‘डेड जोन्स’ सालाना दोगुने हो रहे हैं, जो मर्करी के जहर को आसमान छूने का बहाना दे रहे हैं।
पुराने समुद्रों से आज की चेतावनी: डीएनए का राज
रिसर्चर्स ने ब्लैक सी की 13,500 साल पुरानी तलछटों को खंगाला, जहां डीएनए के अवशेष अभी भी जिंदा थे। सबसे ज्यादा hgcA जीन की मौजूदगी उसी दौर में मिली, जब ग्लोबल तापमान चढ़ा और पानी की ऊपरी-निचली परतें अलग-थलग पड़ गईं। ऑक्सीजन लेवल इतना गिरा कि बैक्टीरिया राज करने लगे। उमेआ यूनिवर्सिटी के इकोलॉजी एक्सपर्ट और लीड रिसर्चर एरिक कैपो कहते हैं, “यह स्टडी साबित करती है कि जलवायु की गर्मी और सांस रुकने जैसी ऑक्सीजन की कमी अकेले ही मिथाइलमर्करी के हॉटस्पॉट्स पैदा कर सकती है बिना किसी फैक्ट्री स्मोक या इंडस्ट्रियल डंपिंग के। आज का सीन कुछ वैसा ही लग रहा है। प्रदूषण तो है ही, ऊपर से ग्लोबल वार्मिंग ने बैलेंस बिगाड़ दिया। ईस्टर्न ट्रॉपिकल पैसिफिक, अरेबियन सागर और बाल्टिक जैसे समुद्रों में ये जोन बढ़ रहे हैं, जो मछली पकड़ने वालों और सीफूड खाने वालों के लिए बम की तरह हैं।
जहर का चेन रिएक्शन, थाली तक का सफर
जब हवाएं या करंट्स पानी को हिलाते हैं, तो गहरे समुद्र की ऑक्सीजन-रहित परतें ऊपर उछल आती हैं। साथ में आता है मिथाइलमर्करी प्लैंकटन में घुसता है, फिर चेन में ऊपर चढ़ता है। बड़ी मछलियां जैसे टूना या शार्क में यह जहर इतना जमा हो जाता है कि एक कौर ही दिमाग और नर्व्स को निशाना बना सकता है। विशेषज्ञ चेताते हैं कि यह सिर्फ मछलियों का मसला नहीं; करोड़ों लोग जो सीफूड पर निर्भर हैं, उनके लिए हेल्थ रिस्क बढ़ रहा है। प्राचीन रिकॉर्ड बताते हैं कि बिना मॉडर्न पॉल्यूशन के भी ये बैक्टीरियल सिस्टम एक्टिव हो सकते हैं। अगर ट्रेंड यूं चला, तो आने वाले दशकों में मिथाइलमर्करी प्रोडक्शन स्पाइक्स लेगा।
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रास्ता निकालें: प्रदूषण रोकें, समुद्र बचाएं
अभी वक्त है कार्रवाई का। पहला स्टेप: मर्करी एमिशन कट कोयला प्लांट्स, माइनिंग से आने वाला जहर कम करें। दूसरा, न्यूट्रिएंट रनऑफ रोकें खेती के केमिकल्स जो शैवाल ब्लूम ट्रिगर करते हैं। तीसरा, कोस्टल वाटर्स में करंट्स को रिस्टोर करें ताकि पानी मिले-जुला रहे। प्राचीन डीएनए डेटा को मॉडर्न मॉनिटरिंग से जोड़कर हम फ्यूचर प्रेडिक्शन बेहतर बना सकते हैं। यह मॉडल दिखाता है कि जलवायु, ऑक्सीजन डिप, माइक्रोब एक्टिविटी और टॉक्सिन्स कैसे एक-दूसरे को फ्यूल देते हैं। अगर हमने अभी हाथ-पैर फैलाए, तो न सिर्फ समुद्री जीवन बचेगा, बल्कि हमारी प्लेटें भी सेफ रहेंगी। वैज्ञानिकों का मैसेज साफ है। समुद्र सांस लेना बंद कर रहा है, तो जहर फैल रहा है, हमें अब जगना होगा।



