Dharali Tragedy: हर्षिल की कृत्रिम झील कितनी खतरनाक?

5 अगस्त को उत्तरकाशी के धराली में आई बाढ़ ने क्षेत्र को तबाह कर दिया, जिसमें 42 लोग लापता हैं और हर्षिल में बनी कृत्रिम झील खतरे की आशंका पैदा कर रही है। प्रशासन राहत कार्यों में जुटा है, लेकिन बारिश और मलबा चुनौतियां बढ़ा रहे हैं।

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नई दिल्ली: 5 अगस्त 2025 को उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में खीरगंगा नदी में अचानक आई बाढ़ ने धराली कस्बे को भारी नुकसान पहुंचाया। इस आपदा ने न केवल धराली का भौगोलिक स्वरूप बदल दिया, बल्कि हर्षिल के निकट एक कृत्रिम झील के निर्माण से नई चिंताएं भी पैदा कर दीं। इस बाढ़ ने घर, दुकानें और सड़कें तबाह कर दीं, जिससे क्षेत्र में राहत और बचाव कार्यों में भारी मुश्किलें आ रही हैं।

हर्षिल में कृत्रिम झील का खतरा

खीरगंगा के साथ-साथ हर्षिल में तेलू गाड़ नदी के उफान ने भी तबाही मचाई, जिससे वहां स्थित सेना के शिविर को नुकसान पहुंचा। भूस्खलन के कारण भागीरथी नदी में मलबे का जमावड़ा हुआ, जिससे एक कृत्रिम झील बन गई। यह झील अब स्थानीय लोगों और प्रशासन के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। हालांकि, उत्तराखंड के सिंचाई विभाग का कहना है कि झील से तत्काल खतरा नहीं है, क्योंकि पानी का रिसाव लगातार हो रहा है। ऐसे में सड़क मार्ग अवरुद्ध होने के कारण झील के मुहाने को मैन्युअल रूप से खोलने की कोशिश की जा रहा है।

लापता लोगों और राहत कार्यों की स्थिति

गढ़वाल मंडल आयुक्त विनय शंकर पांडे ने उत्तरकाशी के आपदा नियंत्रण कक्ष में बताया कि इस त्रासदी में अब तक 43 लोग लापता बताए गए थे, जिनमें से धराली के एक युवक, आकाश पंवार का शव बरामद हो चुका है। मृतक के परिवार को आर्थिक सहायता दी जा चुकी है। शेष 42 लापता लोगों में 9 सैन्यकर्मी, धराली के 8 स्थानीय लोग, आसपास के क्षेत्रों के 5 लोग, टिहरी का 1, बिहार के 13 और उत्तर प्रदेश के 6 व्यक्ति शामिल हैं। इसके अलावा, 29 नेपाली मजदूरों के लापता होने की सूचना थी, जिनमें से 5 से संपर्क हो चुका है, लेकिन बाकी 24 के बारे में अभी कोई ठोस जानकारी नहीं मिली है। आयुक्त ने बताया कि 2013 की केदारनाथ त्रासदी की तरह, कुछ लापता लोग अपने घरों को लौट चुके हो सकते हैं। प्रशासन अन्य राज्यों के लापता लोगों के पते जुटाकर उनकी तलाश कर रहा है, और अगले कुछ दिनों में स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।

राहत और बचाव के प्रयास

प्रशासन ने अब तक 1,278 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया है। मलबे में दबे लोगों की तलाश के लिए एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, सेना और पुलिस की टीमें दिन-रात काम कर रही हैं। देहरादून से 10 विशेषज्ञ भूवैज्ञानिकों की एक टीम भी भेजी गई है ताकि बाढ़ के कारणों का पता लगाया जा सके। प्रभावितों को 5 लाख रुपये की तत्कालिक सहायता राशि का वितरण शुरू हो चुका है, साथ ही खादयान, कपड़े और दैनिक जरूरतों का सामान भी उपलब्ध कराया जा रहा है। राहत और पुनर्वास के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया है।

झील से खतरे को कम करने की कोशिश

सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता सुभाष चंद्र ने बताया कि भागीरथी नदी में मलबे के कारण बनी यह झील लगभग 1.3 किलोमीटर लंबी और 75-80 मीटर चौड़ी है। 5 अगस्त को बनी इस झील का निरीक्षण 7 अगस्त को किया गया था। शुरू में मशीनों से मलबा हटाने की योजना थी, लेकिन सड़क मार्ग अवरुद्ध होने के कारण मैन्युअली तौर पर काम शुरू किया गया। ऐसे में हेलीकॉप्टर से 20 मजदूर, दो सहायक अभियंता और पांच कनिष्ठ अभियंता भेजे गए हैं। लिंचागाड़ में बेली ब्रिज के निर्माण के बाद सड़क बहाली का काम तेजी से चल रहा है, और जल्द ही चार पोकलैंड मशीनें झील तक पहुंचेंगी। सुभाष चंद्र ने आशंका को खारिज करते हुए कहा कि झील का पानी दाईं ओर से लगातार निकल रहा है, और इसका स्तर स्थिर है। मैन्युअल रूप से मुहाने को चौड़ा करने की कोशिश की जा रही है, ताकि पानी सुरक्षित तरीके से निकाला जा सके। मजदूरों की सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी जा रही है।

मौसम की स्थिति और चुनौतियां

मौसम विज्ञान केंद्र, देहरादून के प्रभारी रोहित थपलियाल ने बताया कि मंगलवार को उत्तरकाशी में बारिश में कमी की उम्मीद है, जो राहत कार्यों के लिए मददगार होगी। हालांकि, यह राहत केवल एक दिन की होगी, क्योंकि बुधवार से फिर बारिश का अनुमान है। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 30 जुलाई से 6 अगस्त तक उत्तरकाशी में सामान्य बारिश (104.4 मिमी) के मुकाबले 104.1 मिमी बारिश दर्ज की गई। इससे साफ है कि खीरगंगा में बाढ़ का कारण बादल फटना नहीं था, और इसके पीछे के असल कारणों का पता लगाने के लिए और शोध की जरूरत है।

निष्कर्ष

धराली और हर्षिल में आई इस त्रासदी ने न केवल लोगों के जीवन को प्रभावित किया है, बल्कि हर्षिल की कृत्रिम झील ने नए खतरे की आशंका पैदा की है। प्रशासन और सेना के संयुक्त प्रयासों से राहत कार्य तेजी से चल रहे हैं, लेकिन बारिश और अवरुद्ध सड़कें चुनौतियां बढ़ा रही हैं। इस आपदा ने एक बार फिर प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए बेहतर तैयारी और संरक्षण उपायों की जरूरत को उजागर किया है।

Sakshi Pal

sakshipal8700@gmail.com

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