नई दिल्ली: अफ्रीका के हॉर्न क्षेत्र में बसा इरिट्रिया एक छोटा देश है, जिसकी जनसंख्या लगभग 60 लाख है। 1993 में इथियोपिया से स्वतंत्रता मिलने के बाद लोगों को लोकतंत्र की उम्मीद थी, लेकिन यह सपना अधूरा रहा। आजादी के बाद से इस देश में एक भी चुनाव नहीं हुआ। इसाईस अफवर्की 1993 से देश के एकमात्र राष्ट्रपति हैं और उनकी पार्टी, पीपुल्स फ्रंट फॉर डेमोक्रेसी एंड जस्टिस, एकमात्र राजनीतिक दल है। विपक्ष का कोई अस्तित्व नहीं है और चुनाव की बातें सिर्फ कागजों तक सीमित रहीं।
लोकतंत्र की जगह डर का शासन
इरिट्रिया में न बोलने की स्वतंत्रता है, न प्रेस की आजादी, और न ही धार्मिक स्वतंत्रता। यह देश एकदलीय और सैन्य शासन के अधीन है। सरकार की आलोचना करने वालों को जेल में डाल दिया जाता है और कई लोग बिना मुकदमे के कैद हैं। नागरिकों को अनिश्चितकाल के लिए जबरन सैन्य सेवा में भेजा जाता है। यहां के लोग मतदान की प्रक्रिया से पूरी तरह अनजान हैं, क्योंकि शिक्षा और मीडिया पर कड़ा नियंत्रण है। लोकतंत्र, स्वतंत्रता और मानवाधिकार जैसे शब्द यहां के लोगों के लिए अपरिचित हैं।
दुनिया में और कहां है लोकतंत्र का अभाव?
इरिट्रिया के अलावा, उत्तर कोरिया जैसे देशों में भी चुनाव नाममात्र के हैं, जहां शासक दल का एकछत्र नियंत्रण है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, विश्व के 85% देशों में सरकारें चुनी जाती हैं, लेकिन केवल 39% देश ही पूरी तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराते हैं। कई देशों में चुनाव होते हैं, लेकिन विपक्ष को दबाया जाता है और मतदाताओं पर दबाव बनाया जाता है। अफगानिस्तान और ईरान जैसे देशों में भी स्वतंत्र चुनावों की कमी देखी जाती है।
मुस्लिम देशों में स्थिति
इरिट्रिया में मुस्लिम और ईसाई आबादी बराबर है, लेकिन यह एकमात्र मुस्लिम बहुल देश नहीं जहां लोकतंत्र सीमित है। सऊदी अरब और कतर जैसे देशों में भी राष्ट्रीय स्तर पर कोई लोकतांत्रिक चुनाव नहीं होते और शासन राजशाही या एकदलीय व्यवस्था पर आधारित है।
इरिट्रिया जैसे देशों में लोकतंत्र की अनुपस्थिति लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित रखती है। यह स्थिति वैश्विक समुदाय के लिए एक चेतावनी है कि स्वतंत्रता और लोकतंत्र हर जगह समान रूप से उपलब्ध नहीं हैं।



