DU में 12 घंटों की शिफ्ट: संसाधन का बेहतर इस्तेमाल या शिक्षकों का शोषण?

DU ने कॉलेजों को अब सुबह 8 से रात 8 बजे तक चलाने का आदेश जारी किया है। इस मसले पर शिक्षण व विश्वविद्यालय प्रशासन आमने-सामने है। दोनों की अपनी दलीलें हैं।

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नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) एक बार फिर शिक्षकों और छात्रों के बीच चर्चा का केंद्र बन गया है। नए शैक्षणिक सत्र 2025-26 से पहले, विश्वविद्यालय ने सभी कॉलेजों और संस्थानों को सुबह 8 बजे से रात 8 बजे तक संचालन का निर्देश जारी किया है। यह फैसला 31 जुलाई को आधिकारिक रूप से जारी किया गया और इसे “संसाधनों के बेहतर उपयोग” के उद्देश्य से लागू किया जा रहा है। हालांकि, यह निर्णय लागू होने से पहले ही शिक्षकों और कर्मचारियों में भारी असंतोष फैला चुका है। कई फैकल्टी सदस्यों ने इसे अव्यवहारिक, शिक्षक और छात्र विरोधी करार दिया है।

कार्य समय बढ़ाने के पीछे क्या तर्क है?
DU प्रशासन का कहना है कि यह निर्णय 12 जुलाई को हुई एग्जीक्यूटिव काउंसिल की बैठक में विचार-विमर्श के बाद लिया गया। विश्वविद्यालय के अनुसार, संसाधनों का पूरा लाभ लेने और स्टाफ की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए फैकल्टी और कर्मचारियों की ड्यूटी शिफ्ट में तय की जाएगी।

चार वर्षीय पाठ्यक्रम के चलते नई व्यवस्था
सत्र 2025-26 दिल्ली विश्वविद्यालय के लिए खास है क्योंकि पहली बार छात्र चौथे वर्ष में प्रवेश करेंगे। ऐसे में बढ़े हुए शैक्षणिक भार को मैनेज करने के लिए गेस्ट फैकल्टी की भी नियुक्ति की जा सकती है। वहीं चौथे वर्ष के छात्रों को पढ़ाने की जिम्मेदारी सीनियर रेगुलर फैकल्टी को दी जाएगी।

शिक्षकों और छात्रों में नाराजगी
DU के इस आदेश को लेकर शिक्षकों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। किरोरीमल कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर रूद्राशीष चक्रवर्ती ने इसे ‘तानाशाहीपूर्ण’, ‘शिक्षक और छात्र विरोधी’ कदम बताया। उन्होंने कहा कि बिना आधारभूत ढांचा तैयार किए इस तरह का आदेश देना अव्यावहारिक है।उन्होंने यह भी कहा कि कई कॉलेजों में शिक्षकों के बैठने तक की जगह नहीं है, ऐसे में 12 घंटे की ड्यूटी कैसे संभव होगी? साथ ही उन्होंने सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई-खासकर उन शिक्षकों और छात्रों के लिए जिन्हें जल्दी सुबह या देर शाम सफर करना पड़ सकता है।

गुणवत्ता पर पड़ेगा असर
मिरांडा हाउस की फैकल्टी सदस्य आभा देव हबीब ने नए शिक्षण ढांचे पर सवाल उठाते हुए कहा कि संभवतः अब प्रथम वर्ष के छात्रों को पढ़ाने की जिम्मेदारी कम अनुभवी या गेस्ट फैकल्टी को दी जाएगी। उन्होंने कहा, “किसी नए छात्र को यूनिवर्सिटी में स्वागत करने का ये सही तरीका नहीं है।”

बुनियादी संसाधनों की कमी भी मुद्दा
शिक्षकों का मानना है कि कॉलेजों में पहले से ही कक्षाओं की कमी, स्टाफ रूम और बुनियादी सुविधाओं की घोर कमी है। ऐसे में बिना संसाधनों को मजबूत किए 12 घंटे की कार्यप्रणाली लागू करना जमीनी सच्चाई से अनभिज्ञता को दर्शाता है।

निष्कर्ष
दिल्ली विश्वविद्यालय का यह नया निर्णय “संसाधनों के बेहतर उपयोग” के नाम पर लिया गया है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसे लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। जहां प्रशासन इसे एक रणनीतिक बदलाव मान रहा है, वहीं शिक्षक समुदाय इसे शोषण और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के खिलाफ उठाया गया कदम बता रहा है।

Ashutosh Mishra

mishutosh@yahoo.co.in

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