आज उच्च आर्थिक संवृद्धि नदी, पहाड़, हवा, पेड़-पौधों की कीमत पर लाई जा रही है। पहाड़ों का गिरना, नदियों का सूखना, दूषित होना, वनों का खत्म होना, पशुधन गंवा देना, धरती का चुकते जाना; कमोवेश आज का यह वैश्विक ट्रेंड हैं।
प्रकृति के छीजते जाने के क्रम में पूरी दुनिया पर आपदाओं का घेरा मजबूत होता जा रहा है। फर्क बस तीव्रता में है। आपदाएं कहीं ज्यादा कहर ढा रही हैं, कहीं कम। लेकिन चपेट में हम सभी हैं। खुद का वजूद खत्म हो जाने के संकट ने हमें चिंतित किया हुआ है। हम सब चिंतित हैं। कुछ करना चाहते हैं, लेकिन समाधान है नहीं। भारत जैसे उस देश में भी, जिस पर प्रकृति सबसे ज्यादा मेहरबान रही है।
यह इसलिए हुआ है कि जो कुछ हम सबकी अपनी रवायतें थीं, प्रकृति के साथ जीने की, उसे हमने बहुत पहले तोड़ डाला। यहां तक भी सही रहता, अगर हम प्रकृति के साथ रहने का कोई दूसरा विकल्प तलाश लेते। लेकिन यह संभव हो नहीं हुआ। और अब जब संकट सिर पर है, तब सुलह-समझौते की बात कर रहे हैं। यह वैसा ही है, जैसे टकराव की स्थिति को समझौते से, मध्य-मार्ग से निपटा लेने का हम सबका स्वभाव है। यही युक्ति अब हम प्रकृति के साथ भी लगा रहे हैं।
बातचीत करके, समझौता करके लोगों, समुदायों, राजनीतिक दलों तथा देशों के आपसी संघर्षों को सुलझाया जा सकता है, प्रकृति के साथ का नहीं। इसके साथ जो असरदार तरीका काम करता है, वह है मद त्याग कर, आदर भाव से यह जान लेना कि हम प्रकृति के हिस्सा भर हैं, उसके विजेता नहीं। सब कुछ व्यक्ति के लिए ही नहीं है। हमें इसके साथ सहयोग व सहचर्य के भाव में रहना है। यह सब हमने बहुत पहले किया भी है।
इसमें अकेले पर्यावरण मंत्रालय या सरकारी एजेंसियों के भरोसे नहीं रहा जा सकता। अकेले जितना कर सकते हैं वह तो जरूर करें। पेड़ लगाएं, पानी बचाएं, गाय पालें, जो भी संभव हो, करें। साथ ही समाज की परंपराओं साथ मिलकर भी जीने की कोशिश करें, जिसमें मनुष्य प्रकृति के अंगों की वंदना करे, आदर करे, सहजीवन में जिए। हम भारतीयों ने ऐसी जीवनशैली को हजारों साल जिया है। अब तो दुनिया के लोग भी मानने लगे हैं कि 200 साल पहले तक भारत दुनिया का सबसे धनी देश था।
खोने के बाद भी शेष बाकी
बहुत कुछ खत्म होने के बाद भी ताकत अभी बची है। बस, हम सब फिर से उठ खड़े होएं। अकेले नहीं, समाज के तौर पर, सरकार के साथ संवाद के आधार पर, आगे बढ़ें। इसलिए जमीन, जल, जंगल, जानवर के पक्ष में प्रेम से खड़े होना है। और यह समझना है कि उनके बिना मनुष्य का भी गुजारा नहीं है। प्रकृति आधारित समाधान हमारे पर्यावरण की रक्षा, संरक्षण करने के साथ इसका जीर्णोद्धार करने में कारगर साबित होगा। इस मार्ग को अपनाने से चीजें सामान्य होती जाएंगी। और यह मनुष्य की कीमत पर नहीं होगा, उसके साथ-साथ होगा। इसमें मनुष्य भी खुशहाल होगा, प्रकृति भी मनमोहक होगी। स्थायित्व के साथ शांति व समृद्धि आएगी।


