नई दिल्ली: चार नए श्रम कानून लागू होने के साथ ही मोदी सरकार ने 1930-1950 के बीच बने औपनिवेशिक दौर के 29 बिखरे, उलझे और पुराने कानूनों की जटिलता को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। वे कानून एक अलग भारत के लिए बने थे। उस समय के लिए, जब देश की अर्थव्यवस्था सीमित थी और श्रम संरचना भी बेहद भिन्न। आज का भारत तेजी से आगे बढ़ती वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में अग्रणी है, और 2047 तक विकसित भारत बनने का संकल्प लिए हुए है। ऐसे भारत को आधुनिक, एकीकृत, सरल और सम्मानजनक श्रम ढांचे की आवश्यकता थी। नई संहिताएँ उसी दिशा में उठाया गया निर्णायक और ऐतिहासिक कदम हैं। जैसा प्रधानमंत्री कहते हैं, “नए भारत का श्रमिक मज़बूर नहीं, मज़बूत है।”
वेतन की एक राष्ट्रीय परिभाषा पूरे देश पर लागू होती है
अब पहली बार भारत का श्रम तंत्र एक भाषा बोलता है। वेतन की एक राष्ट्रीय परिभाषा पूरे देश पर लागू होती है; इससे वर्षों तक चली आ रही विसंगतियाँ और मनमानी वेतन प्रणाली खत्म होती है। यह परिवर्तन मजदूरी संहिता, 2019 के तहत किया गया ऐतिहासिक सुधार है, जिसने चार पुराने वेतन-संबंधी कानूनों को एकीकृत कर दिया और पूरे देश के लिए एक स्पष्ट, एकरूप वेतन ढांचा स्थापित किया। न्यूनतम वेतन अब हर सेक्टर के हर श्रमिक पर लागू है, ओवरटाइम का भुगतान दो गुना वेतन दर पर अनिवार्य है, और लिंग आधारित भेदभाव पूर्णतः अवैध। यहां तक कि ट्रांसजेंडर श्रमिकों को भी स्पष्ट कानूनी सुरक्षा प्राप्त होती है। यह वह न्यायपूर्ण, पारदर्शी व्यवस्था है जिसकी भारतीय श्रमिकों को दशकों से ज़रूरत थी। यही वह शासन-नीति है जहाँ मोदी मॉडल साफ दिखता है: साधारण नियम, न्यायपूर्ण परिणाम, और हर श्रमिक का सम्मान।
इन सुधारों की गहराई शीर्षकों से कहीं अधिक है। औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 ने शिकायत निवारण को वास्तविक बना दिया है। अब समितियों में महिलाओं की अनिवार्य भागीदारी होगी। फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट को औपचारिक मान्यता मिलने से सामाजिक सुरक्षा और ग्रेच्युटी के लाभ निश्चित हुए हैं, जबकि नियोक्ता भी पुरानी बाधाओं में नहीं फंसते। “वर्क फ्रॉम होम” को पहली बार कानूनी स्थान मिला है। प्रक्रियाओं के पूर्ण डिजिटलीकरण से विवाद कम होंगे और न्याय तेज़ होगा। यही है असली ease of living और ease of doing business, दोनों एक साथ चलते हुए।
भारत का विकास मॉडलसबके लिए है
सबसे परिवर्तनकारी बदलाव सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 में दिखाई देता है। भारत उन गिने-चुने देशों में शामिल हो गया है जिसने गिग और प्लेटफ़ॉर्म वर्कर्स (डिलीवरी पार्टनर, कैब ड्राइवर, ऐप-आधारित फ्रीलांसर) को औपचारिक सुरक्षा जाल में शामिल किया है। एक विशेष कोष, एग्रीगेटर कंपनियों से अनिवार्य योगदान, देशभर में उपयोगी यूनिवर्सल सोशल सिक्योरिटी पोर्टेबिलिटी, और महिला कर्मचारियों के लिए परिवार की विस्तृत परिभाषा; ये सभी मिलकर 21वीं सदी की कार्यशक्ति के लिए तैयार कल्याण ढांचा बनाते हैं। जब रात के 12 बजे खाना पहुंचाने वाला गिग वर्कर कानूनी मान्यता और सुरक्षा पाता है, तो ये संदेश जाता है कि भारत का विकास मॉडल केवल चुनिंदा वर्गों के लिए नहीं, सबके लिए है।
जिन राज्यों ने पहले सुधार किए, वहाँ इसके लाभ ज़मीन पर दिखने लगे हैं। गुजरात ने 2022-23 से 2023-24 के बीच 13.36% की GSDP वृद्धि दर्ज की, जिसमें विनिर्माण का योगदान 28-30% राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक। आंध्र प्रदेश में सुधारों के बाद संगठित विनिर्माण में 5.7 लाख नए रोजगार जुड़े (देश में सबसे अधिक)। उत्तर प्रदेश ने पिछले पांच सालों में 7.4 लाख नए संगठित विनिर्माण कर्मियों को जोड़ा। राजस्थान में महिलाओं को नाइट शिफ्ट में काम की अनुमति के बाद महिला श्रमिकों में 13% की उल्लेखनीय वृद्धि हुई। हरियाणा में बेरोज़गारी 9.3% से घटकर 3.4% हो गई। वास्तव में ये आंकड़े सिर्फ आँकड़े नहीं,ये सबूत हैं कि जब सुधार अपनाए जाते हैं, तो रोज़गार बढ़ता है, निवेश आता है और बदलाव ज़मीन पर दिखता है।
चलो, जैसा चल रहा है वैसा ही चलने दो” वाली पुरानी सोच खत्म
सुरक्षा और गरिमा, जो दशकों तक भारतीय श्रम कानूनों में उपेक्षित रहे, अब पहली पंक्ति में खड़े हैं। व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य शर्तें संहिता, 2020 के तहत हर वह प्रतिष्ठान जिसमें दस या अधिक कर्मचारी हैं, आधुनिक सुरक्षा मानकों का पालन करेगा। प्रवासी श्रमिकों को औपचारिक सुरक्षा मिली है, महिलाएँ हर सेक्टर में, यहाँ तक कि नाइट शिफ्ट में भी, सुरक्षा प्रावधानों के साथ काम कर सकती हैं। अनिवार्य स्वास्थ्य जाँच और नियुक्ति पत्र अब सभी पर लागू होंगे। और अगर कोई एक भी श्रमिक जोखिमपूर्ण काम करता है, तो उसके लिए भी यह संहिता पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करती है। “चलो, जैसा चल रहा है वैसा ही चलने दो” वाली पुरानी सोच खत्म- अब कानून श्रम की गरिमा को केंद्र में रखता है।
राजनीतिक दृष्टि से यह सुधार स्पष्ट रूप से मोदी सरकार की निर्णायक, साहसी और श्रमिक-केंद्रित शासनशैली का परिचायक है। पिछली सरकारें श्रम सुधारों का वादा तो करती रहीं, लेकिन दबाव, जड़ता और जटिलताओं के कारण कुछ बदल नहीं पाया। मोदी सरकार ने वह किया है जिसे अन्य सरकारें दशकों तक केवल चर्चा में रखती रहीं। नए श्रम ढाँचे ने भारत को वैश्विक मानकों के अनुरूप खड़ा किया है और श्रमिक को व्यवस्था के केंद्र में रखा है। इससे भाजपा एक ऐसी पार्टी के रूप में उभरती है जो वास्तव में श्रमिक वर्ग की पक्षधर है: फैक्टरी के मज़दूर हों, गिग अर्थव्यवस्था के युवा, प्रवासी परिवार, नए क्षेत्रों में प्रवेश करती महिलाएँ, या एमएसएमई क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिक। जो काम दूसरों ने 70 साल में नहीं किया, वो काम मोदी सरकार ने एक फैसले से कर दिखाया।
ये भारत की राष्ट्रीय सोच में परिवर्तन का प्रतीक हैं
अंततः, ये चार श्रम संहिताएँ केवल प्रशासनिक सुधार नहीं हैं; ये भारत की राष्ट्रीय सोच में परिवर्तन का प्रतीक हैं। श्रमिक के लिए: अधिकार बिना बाधा। उद्योग के लिए: अनुपालन बिना उत्पीड़न। भारत के लिए: उत्पादकता, औपचारिकता और प्रगति, उन देशों की बराबरी में, जिनसे हम प्रतिस्पर्धा करना चाहते हैं, न कि जिन्हें पीछे छोड़ना है। यह सिर्फ आर्थिक सुधार नहीं है; ये नए भारत की ओर एक सभ्यतागत कदम है, जहाँ हर श्रमिक ऊँचा खड़ा होता है, हर उद्योग तेज़ी से बढ़ता है, और हर आकांक्षा को न्यायपूर्ण अवसर मिलता है।



