नई दिल्ली: भारत के उपराष्ट्रपति का पद संवैधानिक नजरिए से बेहद अहम है। राष्ट्रपति के बाद देश में नंबर-2 का संवैधानिक पद होने के साथ उपराष्ट्रपति बेहद अहम हैं। वह इसलिए भी कि यह राज्य सभा के अध्यक्षता करते हैं, उच्च सदन के पदेन अध्यक्ष हैं। और इस वक्त मानसून सत्र चल रहा है। उपराष्ट्रपति के इस्तीफे के बाद राज्य सभा कौन चलाएगा, संविधान का अनुच्छेद 89 इसकी व्यवस्था देता है। इस अनुच्छेद के दो हिस्से हैं;
89(1), यह बताता है कि भारत का उपराष्ट्रपति राज्य सभा का पदेन सदस्य होता है। जो भी उपराष्ट्रपति चुना जाएगा, वही राज्य सभा की अध्यक्षता करेगा। लोक सभा की तरह यहां इस पद के लिए चुनाव नहीं होता। हां, उपराष्ट्रपति अगर राष्ट्रपति बन जाता है, तो यह राज्य सभा के सभापति के रूप में काम नहीं करेगा।
सभापति के तौर पर उपराष्ट्रपति की जिम्मेदारी है कि वह राज्यसभा की कार्यवाही के संचालन और सदन में व्यवस्था बनाए रखने का जिम्मेदार है। सभापति दिन की कार्यवाही का एजेंडा तय करता है और सदस्यों को विभिन्न मसलों पर बोलने के लिए बुलाता है।
89(2), यह अनुच्छेद उपसभापति के चुनाव की व्यवस्था देता है। जब-जब उपसभापति का पद रिक्त होगा, तब-तब राज्यसभा अपने में किसी एक सदस्य को बतौर उपसभापति चुनेगी।
सदन के सभापति का पद खाली होने या सभापति की अनुपस्थिति में उपसभापति ही सभापति के तौर पर काम करेंगे। जब भी ऐसा होता है, तब सभापति की सारी शक्तियां उसके पास आ जाती है। यह बात गौर करने वाली है कि उपसभापति सभापति का अधीनस्थ नहीं होता, वह सीधे राज्यसभा के प्रति उत्तरदायी होता है।
कहने का मतलब यह कि उपराष्ट्रपति धनखड़ का इस्तीफा स्वीकार होने की सूरत में राज्य सभा चलाने की जिम्मेदारी उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह की होगी। वह भी उस वक्त तक, जब तक देश का नया उपराष्ट्रपति नहीं मिल जाता है। जैसे हालात दिखाई दे रहे हैं, उसमें मानसून सत्र तक नया उपराष्ट्रपति मिलने की उम्मीद बनती नहीं दिख रही है।



