नई दिल्ली: बिहार विधानसभा चुनाव-2015 में भाजपा पर एक साथ दो गाज गिरी थी। जदयू के पहली बार राजद से हाथ मिला लेने के कारण भाजपा सामाजिक न्याय के मुद्दे पर किनारे लग गई थी। इसी दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत की समय के अनुरूप आरक्षण की समीक्षा की वकालत ने विपक्ष को यह साबित करने का ब्रह्मास्त्र दे दिया था कि भाजपा सामाजिक न्याय और वंचित विरोधी पार्टी है। चुनाव परिणाम ने साबित किया कि विपक्ष का यह सियासी दाव फिट बैठा। विपक्षी महागठबंधन को इस चुनाव में बड़ी जीत हासिल हुई।
अब आगामी चुनाव से पहले संघ की दो हस्तियों से जुड़ी टिप्पणियां बिहार की सियासत में जेरे बहस हैं। पहली टिप्पणी संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले की है। उन्होंने आपातकाल की वर्षगांठ पर संविधान की प्रस्तावना में हुए बदलाव का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि जब देश में आपातकाल लागू था तब इंदिरा सरकार ने संविधान में संशोधन का रास्ता अपनाते हुए इसकी प्रस्तावना में समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़ा। इसकी समीक्षा होनी चाहिए।
कांग्रेस समेत अन्य विपक्ष होसबाले की इस टिप्पणी को भाजपा के तथाकथित संविधान बदलने के एजेंडे से जोड़ रहा है।दूसरी टिप्पणी संघ प्रमुख मोहन भागवत से जुड़ी है। उन्होंने हाल ही में संघ से जुड़े एक विचारक के विचार का हवाला देते हुए 75 साल की उम्र सेवा को राजनीति समेत अन्य सेवाओं से जोड़ते हुए कहा कि इस उम्र के लोगों को रिटायर हो कर दूसरों के लिए रास्ता साफ करना चाहिए। चूंकि प्रधानमंत्री मोदी इस साल 17 सितंबर को 75 साल के हो रहे हैं।
ऐसे में इस टिप्पणी को प्रधानमंत्री मोदी के लिए संघ की सलाह से जोड़ कर देखा जा रहा है। चूंकि बिहार में सीएम नीतीश कुमार और पीएम नरेंद्र मोदी ही राजग का चेहरा होंगे। ऐसे में विपक्ष यह प्रचारित करने में जुट गया है कि खुद संघ को पीएम मोदी पसंद नहीं हैं।
भागवत की टिप्पणी का क्या है संदेश?
संघ प्रमुख भागवत की टिप्पणी पर कई विचार सामने आए। खुद संघ ने सफाई दी कि उनकी टिप्पणी का पीएम मोदी से कोई लेना देना नहीं था। हालांकि सच्चाई यह है कि नागपुर के जिस कार्यक्रम में भागवत ने इस आशय की टिप्पणी की, उसका सारा भाषण मराठी में था। सिवाय इसके उम्र के पैमाने के। अपने पूरे भाषण में उन्होंने 75 साल में रिटायर होने की बात ही हिंदी में की, इसके इतर उनका सारा भाषण मराठी में था। इसलिए भागवत की इस टिप्पणी को मोदी के लिए संदेश माना जा रहा है। वैसे भी संयोगवश भागवत और मोदी दोनों इसी साल सितंबर में 75 साल के होने जा रहे हैं। पहले 11 सितंबर को भागवत और फिर 17 सितंबर को मोदी। ऐसे में अगर भागवत ने अपने जन्मदिन पर पद छोडऩे की घोषणा की तो यह बड़ा सियासी मुद्दा बनेगा। ऐसे में अगर इस पर विवाद हुआ तो विपक्ष इस विवाद को हाथों हाथ लेगा।
होसबाले की टिप्पणी क्यों है अहम?
यह सच्चाई है कि होसबाले ने संविधान की प्रस्तावना में संशोधन कर समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़े जाने की बात आपातकाल के संदर्भ में कही। हालांकि सच्चाई यह भी है कि बीते तीन-चार सालों से विपक्ष मोदी सरकार और भाजपा पर संविधान को बदलने, आरक्षण खत्म करने जैसे आरोप लगा रहा है। विपक्ष की बनाई इसी धारणा के कारण बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा अपने दम पर बहुमत का आंकड़ा छूने से दूर रह गई। अब विपक्ष होसबाले के बयान को फिर से भाजपा और मोदी सरकार की कथित संविधान में बदलाव की साजिश से जोड़ कर प्रचारित कर रहा है। हालांकि देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इस धारणा का सियासी पिच पर कैसे मुकाबला करती है।
अतीत से समझें उम्र का पैमाना
भाजपा और संघ में उम्र का पैमाना कोई नई बात नहीं है। साल 2004 में जब भाजपा ने केंद्र की सत्ता गंवाई थी तब इसके एक साल बाद तत्कालीन संघ प्रमुख के एस सुदर्शन ने 77 साल के लालकृष्ण आडवाणी और 80 साल के अटल बिहारी वाजपेयी को युवाओं को आगे बढ़ाने के लिए राजनीति से संन्यास लेने की सलाह दी थी। अब जबकि बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा ने औसत प्रदर्शन किया है, जब दूसरे संघ प्रमुख मोहन भागवत सुदर्शन की तर्ज पर वही बात दोहरा रहे हैं। इस पर बड़ा विवाद हुआ। वाजपेयी वक्त की नजाकत को समझते हुए धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से दूर हो गए। आडवाणी अड़े रहे। परिस्थितिवश जिन्ना विवाद के साये के बावजूद भाजपा उनके नेतृत्व में 2009 का लोकसभा चुनाव लड़ी। हालांकि जब सुदर्शन की नई टिप्पणी के बाद नई पीढ़ी मुखर हुई तो 75 के उम्र के पैमाने पर आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे कई दिग्गज नेताओं की छंटाई के विरोध में कोई सामने नहीं आया।
महज छलावा है उम्र का पैमाना
75 साल की उम्र का पैमाना भाजपा में छलावा ही साबित हुआ है। यह ठीक है कि इस बिनाह पर वाजपेयी, आडवाणी, विजयकुमार मल्होत्रा, नजमा हेपतुल्ला, कलराज मिश्रा, आनंदी बेन पटेल जैसे कई नेताओं के सियासी करियर पर विराम लगा। हालांकि इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि इस उम्र सीमा को पार करने वाली येदियुरप्पा को भाजपा ने सीएम पद का उम्मीदवार बनाया। हेमामालिनी को मथुरा का टिकट दिया। इससे यह संदेश गया कि यह पार्टी की स्थायी नीति नहीं बल्कि इसके जरिए यह विरोधियों को निपटाने का महज हथियार है।



