नेतृत्व, परंपरा व नैतिकता का संकेत संघ प्रमुख का वक्तव्य

संघ की परंपरा है कि 75 वर्ष की उम्र होने पर व्यक्ति बाजू में हो जाता है। मोरोपंत पिंगले जी जैसे लोग इसका उदाहरण हैं। अब मेरी भी उम्र 75 हो गई है। सर संघचालक मोहन भागवत का 9 जुलाई का बयान इसी संदर्भ में आया है।

Share This Article:

  • राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत का बयान न केवल संगठनात्मक दृष्टि से, बल्कि भारतीय राजनीति, भाजपा-संघ संबंधों और नेतृत्व संस्कृति पर गहरे संकेत छोड़ता है। 

आरएसएस एक अनुशासित, वैचारिक और परंपरागत संगठन रहा है, जिसमें निजी पद-लिप्सा के लिए बहुत कम स्थान है। मोहन भागवत का 75 वर्ष की उम्र में बाजू में हो जाने का संकेत, न केवल उनके आत्मविवेक का प्रतीक है, बल्कि संघ की आंतरिक संस्कृति और व्यापक राजनीतिक परिदृश्य के लिए भी एक महत्वपूर्ण संकेत बन गया है।
मोरोपंत पिंगले संघ के पहले सरकार्यवाह थे (1946-1973)। वे एक अनुशासित, निस्वार्थ कार्यकर्ता माने जाते थे। उन्होंने स्वयं संघ कार्य से पीछे हटकर युवाओं को अवसर दिया। उनका जीवन उदाहरण है कि पद एक साधन है, साध्य नहीं। संघ प्रमुख भागवत ने इसी परंपरा की ओर संकेत करते हुए खुद के लिए भी वही रास्ता चुनने की बात कही।
इस बयान की प्रासंगिकता संघ के आंतरिक अनुशासन के सन्दर्भ में यह है कि संघ व्यक्तिवाद के विरुद्ध है। संगठन का नेतृत्व कोई अधिकार नहीं, जिम्मेदारी है जो समय आने पर स्वेच्छा से छोड़ी जा सकती है।
राजनीतिक परिदृश्य में यदि इसकी प्रासंगिकता को देखें तो स्पष्ट होता है कि भारतीय राजनीति में नेता पद से चिपके रहते हैं, चाहे उम्र हो, स्वास्थ्य गिरे या जनसमर्थन घटे। ऐसे में यह बयान एक नैतिक आदर्श की तरह सामने आता है।
भाजपा के कई वरिष्ठ नेता (जैसे एलके आडवाणी, एमएम जोशी) को 75 पार करने पर मार्गदर्शक मंडल में भेजा गया, लेकिन वह कदम आलोचना और मजबूरी के तौर पर देखा गया। वहीं, संघ प्रमुख का बयान स्वैच्छिक, गरिमामय और वैचारिक है। जहां संघ संगठन के संदर्भ मे यह बयान भावी नेतृत्व के लिए स्थान खोलता है। युवाओं को आगे लाने की परंपरा को बल मिलता है। यह संदेश कार्यकर्ताओं को कुर्सी नहीं, कर्म की दिशा में प्रेरित करेगा।
वहीं, अप्रत्यक्ष रूप से यह भाजपा के नेतृत्व संस्कृति पर सवाल उठाता है , क्या वहां भी वैसी वैचारिक शुचिता है? भाजपा में भी नेतृत्व परिवर्तन की मांग या प्रेरणा को यह बयान बल दे सकता है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे नेताओं को नैतिक संदेश देता है कि सत्ता सीमित समय के लिए है।
मोहन भागवत का बयान राष्ट्रीय राजनीति में विरल नैतिकता का उदाहरण बन सकता है। यह बुज़ुर्ग नेताओं को कुर्सी से चिपके रहने की प्रवृत्ति से ऊपर उठने की प्रेरणा दे सकता है।
उपरोक्त बयान से कुछ प्रश्न मन में उठते हैं। 
क्या यह मात्र संकेत है या वास्तविक तैयारी? मोहन भागवत ने सीधे तौर पर पद छोड़ने की घोषणा नहीं की है। यह भी संभव है कि यह बयान केवल एक प्रतीकात्मक विनम्रता हो। संघ प्रमुख का यह बयान उत्तराधिकार को लेकर जिज्ञासा और अटकलों को जन्म दे सकता है।
क्या यह भाजपा-संघ संबंधों में किसी रणनीतिक मोड़ का संकेत है? उनका बाजू में हो जाना किसी संभावित विरोध या असहमति की परिपक्व परिणति भी हो सकती है।
मोहन भागवत का 75 की उम्र में बाजू में हो जाने का कथन एक साधारण आत्मवक्तव्य नहीं, बल्कि संघ की संस्कृति, भारतीय राजनीति और नेतृत्व के चरित्र पर गहरे नैतिक और वैचारिक प्रभाव डालने वाला कथन है।
यह बयान राजनीति को त्याग, उत्तरदायित्व और परंपरा के पुनः मूल्यांकन की प्रेरणा देता है। हालांकि, इसके वास्तविक परिणाम, नेतृत्व परिवर्तन, नीति में बदलाव या संगठनात्मक पुनर्संरचना आने वाले महीनों में स्पष्ट होंगे।

कीर्ति शर्मा,
जीवन पर्यन्त स्वयंसेवक 

(नोट: विचार लेखक के अपने हैं।)

Tags :

Navneet Sharan

navneetsharan@gmail.com https://newgindia.com/

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

न्यूज़लेटर के लिए सब्सक्राइब करें

कैटेगरीज़

हम वह खबरची हैं, जो खबरों के साथ खबरों की भी खबर रखते हैं। हम NewG हैं, जहां खबर बिना शोरगुल के है। यहां news, without noise लिखी-कही जाती है। विचार हममें भरपूर है, लेकिन विचारधारा से कोई खास इत्तेफाक नहीं। बात हम वही करते हैं, जो सही है। जो सत्य से परामुख है, वह हमें स्वीकार नहीं। यही हमारा अनुशासन है, साधन और साध्य भी। अंगद पांव इसी पर जमा रखे हैं। डिगना एकदम भी गवारा नहीं। ब्रीफ में यही हमारा about us है।

©2025 NewG India. All rights reserved.