बिहार में बस्ते को झाड़ू बना सकेंगे प्रशांत किशोर?

विकल्प की राजनीति के लिए तरस रहे बिहार के मतदाताओं में जनसुराज पार्टी के मुखिया और चुनावी रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर व उनकी पार्टी जनसुराज की बड़ी चर्चा है। परिवारवाद, शिक्षा, चिकित्सा, पलायन, रोजगार सरीखे मुद्दे को उठा कर उन्होंने गंदे नाले में तब्दील हो चुकी सूबे की सियासत के गाद को ऊपर ला दिया है। उनकी इस रणनीति से बेचैन सत्तारूढ़ राजग और विपक्षी महागठबंधन दोनों उन्हें एक दूसरे की बी टीम बता रहे हैं। सवाल है कि क्या बिहार विधानसभा चुनाव में जनसुराज का बस्ता दिल्ली के चुनाव की तरह आम आदमी पार्टी का झाड़ू बन सकता है?

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नई दिल्ली: नामचीन चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने जब सीधे चुनावी राजनीति में उतरने का ऐलान किया तो उनके इस फैसले ने सियासी पंडितों को चौंकाया था। तब से ले कर अब तक कभी अपनी पद यात्रा, कभी अपने मुद्दे और कभी उपचुनाव के परिणाम को ले कर प्रशांत किशोर लगातार बिहार की सियासत में चर्चा का विषय हैं।
हालांकि, अभी किसी को नहीं पता कि उनकी जनसुराज पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में क्या गुल खिलाएगी, मगर यह भी सच है कि प्रशांत की सियासी पारी से सत्तारूढ़ राजग और विपक्षी महागठबंधन दोनों में गहरी बेचैनी है। परिणाम चाहे जो भी आए, मगर राज्य में बीते ढाई दशक से चली आ रही जंगलराज बनाम सुशासन की सियासी जंग के बीच प्रशांत किशोर विकल्प की राजनीति को चर्चा के केंद्र में लाने में सफल जरूर रहे हैं।
हालांकि बिहार में विकल्प की राजनीति की राह आसान नहीं है। बीते चुनाव में लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स की पुष्पम प्रिया भी बिहार को यूरोप बनाने के वादे के कारण अचानक चर्चा में आईं। उनके मुद्दे भी प्रशांत किशोर की तरह ही झकझोडऩे वाले थे, मगर जमीनी स्तर पर संघर्ष की कमी के कारण वह जनता के भरोसे के तराजू पर खरा नहीं उतर पाई। चुनाव में न तो वह खुद अपना और न ही अपने एक भी उम्मीदवार की जमानत की रक्षा ही कर पाई।
प्रशांत क्यों हैं अलग?
पुष्पम प्रिया की तरह प्रशांत राजनीति में अचानक उतरे खिलाड़ी नहीं हैं। हालांकि प्रत्यक्ष राजनीति में उनकी भूमिका नई है, मगर बतौर चुनावी रणनीतिकार परोक्ष राजनीति से उनका एक दशक पुराना रिश्ता रहा है। साल 2014 में भाजपा की चुनाव प्रचार की रणनीति संभालने के साथ ही उन्होंने तृणमूल कांग्रेस, वाईएसआर कांग्रेस, जदयू के साथ ही कांग्रेस के लिए कई सूबे में चुनावी रणनीति की कमान संभाल चुके हैं। इसके इतर उन्होंने जदयू में उपाध्यक्ष की भूमिका निभाई है। फिर चुनावी राजनीति में उतरने से पहले बिहार की पदयात्रा भी की है।
क्यों बेचैन हैं राजग और महागठबंधन?
बीते साल नंवबर में राज्य में हुए विधानसभा उपचुनाव के नतीजे के बाद प्रशांत किशोर को बिहार की सियासत में गंभीरता से लिया जाने लगा। उपचुनाव में भले ही जनसुराज पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई, मगर उसने राजग और महागठबंधन दोनों का समीकरण गड़बड़ा दिया। बेलागंज में उनके उम्मीदवार मोहम्मद अमजद के प्रदर्शन के कारण महागठबंधन के सांसद भूपेंद्र यादव के पुत्र और रामगढ़ में राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह के पुत्र चुनाव हार गए। इस चुनाव में जनसुराज पार्टी को दस फीसदी वोट मिले। इस पार्टी ने महागठबंधन के एमवाई और राजग के अगड़ा वोट बैंक में सेंध लगाया। इसके बाद से ही राजग और महागठबंधन इन्हें एक दूसरे का बी टीम बताने में जुटा है।
प्रभावित कर रहे मुद्दे
जनसुराज पार्टी के मुद्दे पिछड़ा सूबा बिहार के जनमानस को प्रभावित कर रहे हैं। प्रशांत के उठाए गए परिवारवाद, शिक्षा की बदहाली, पलायन, चिकित्सा की दुरूह स्थिति और बेरोजगारी के मुद्दे पर दो टूक लोगों को रास आ रहे हैं। चूंकि बीते साढ़े तीन दशक से राज्य की सत्ता महागठबंधन और राजग में शामिल दलों के गठबंधन के पास रही है, ऐसे में इनके पास प्रशांत के उठाए गए मुद्दे का कोई जवाब नहीं है।
अभी बहुत कुछ साबित होना बाकी
प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी भले ही चर्चा में है, मगर उन्हें अभी बहुत कुछ साबित करना बाकी है। इसमें सबसे अहम सवाल जाति की सियासत की अबूझ पहली माने जाने वाले इस राज्य में प्रशांत किशोर की जाति है। वह अगड़ा वर्ग से आते हैं। उस अगड़ा वर्ग से जिनकी सियासत पर नब्बे के दशक में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद ग्रहण लग गया है। ऐसे में सवाल है कि क्या विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर जाति की बाधा पार कर पाएंगे?

Ashutosh Mishra

mishutosh@yahoo.co.in

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