The Epidemic of Loneliness: हर छठा व्यक्ति प्रभावित, हर घंटे 100 से अधिक मौतें

डब्ल्यूएचओ की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, अकेलापन न केवल मानसिक और भावनात्मक तकलीफ दे रहा है, बल्कि यह हर साल लाखों लोगों की जिंदगी छीन रहा है।

Share This Article:

नई दिल्ली: आज का युग तकनीकी जुड़ाव का युग है। सोशल मीडिया, वीडियो कॉल, मैसेजिंग ऐप्स और वर्चुअल दुनिया ने लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने के अनगिनत रास्ते खोले हैं। एक बटन दबाते ही दोस्तों से बात, दुनिया की खबरें, और अनगिनत मुस्कुराते चेहरों से मुलाकात संभव है। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक गहरा अंधेरा छिपा है, अकेलापन (The Epidemic of Loneliness)। यह विडंबना है कि इतने “जुड़े” होने के बावजूद दुनिया का हर छठा व्यक्ति खुद को अकेला और अलग-थलग महसूस कर रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, अकेलापन न केवल मानसिक और भावनात्मक तकलीफ दे रहा है, बल्कि यह हर साल लाखों लोगों की जिंदगी छीन रहा है। आंकड़े बताते हैं कि अकेलापन हर घंटे 100 से अधिक लोगों की मौत का कारण बन रहा है, यानी सालाना 8.7 लाख से ज्यादा लोग इसकी चपेट में आ रहे हैं। डब्ल्यूएचओ के कमिशन ऑन सोशल कनेक्शन की इस रिपोर्ट का उद्देश्य सामाजिक जुड़ाव को बढ़ावा देने और इस बढ़ती समस्या से निपटने के लिए एक रास्ता तैयार करना है।

अकेलापन: एक वैश्विक संकट
डब्ल्यूएचओ के अनुसार, सामाजिक जुड़ाव का मतलब है लोगों का एक-दूसरे के साथ रिश्ता बनाना, बातचीत करना और समुदाय का हिस्सा बनना। अकेलापन तब होता है, जब किसी व्यक्ति को वह भावनात्मक या सामाजिक जुड़ाव नहीं मिल पाता, जिसकी उसे जरूरत होती है। वहीं, सामाजिक अलगाव उस स्थिति को कहते हैं, जब किसी के पास पर्याप्त सामाजिक रिश्ते ही नहीं होते। 

डब्ल्यूएचओ के प्रमुख डॉ. टेड्रोस एडनॉम घेब्रेयेसस ने कहा, “आज के समय में, जब तकनीक ने जुड़ाव को इतना आसान बना दिया है, लोग पहले से कहीं ज्यादा अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं। यह न केवल व्यक्तियों, बल्कि परिवारों, समुदायों और समाज के लिए भी गंभीर खतरा है। अगर इसे गंभीरता से नहीं लिया गया, तो यह स्वास्थ्य, शिक्षा और अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।”

कौन सबसे ज्यादा प्रभावित?
रिपोर्ट के अनुसार, अकेलापन सभी उम्र के लोगों को प्रभावित कर रहा है, लेकिन युवा और निम्न व मध्यम आय वाले देशों के लोग इसका सबसे ज्यादा शिकार हैं। 13 से 29 साल के 17-21% युवा खुद को अकेला महसूस करते हैं, जिसमें किशोरों की संख्या सबसे अधिक है। निम्न आय वाले देशों में 24% लोग अकेलेपन का शिकार हैं, जो उच्च आय वाले देशों (11%) की तुलना में दोगुना है। बुजुर्गों में हर तीन में से एक और किशोरों में हर चार में से एक व्यक्ति सामाजिक अलगाव से जूझ रहा है। कुछ समूह, जैसे विकलांग, शरणार्थी, प्रवासी, समलैंगिक, ट्रांसजेंडर, और अल्पसंख्यक समुदाय, भेदभाव और सामाजिक बाधाओं के कारण और भी ज्यादा प्रभावित हैं।

अकेलेपन का कारण और प्रभाव
अकेलेपन और सामाजिक अलगाव के कई कारण हैं, जिनमें खराब स्वास्थ्य, कम आय, शिक्षा की कमी, अकेले रहना, कमजोर सामुदायिक ढांचा, और डिजिटल तकनीकों का अत्यधिक उपयोग शामिल हैं। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि ज्यादा स्क्रीन टाइम और नकारात्मक ऑनलाइन व्यवहार, खासकर युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रहा है।

अकेलापन न केवल मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, बल्कि यह शारीरिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डालता है। यह स्ट्रोक, हृदय रोग, मधुमेह और स्मृति हानि जैसे रोगों का खतरा बढ़ाता है। अकेलेपन से डिप्रेशन का खतरा दोगुना हो जाता है, और यह चिंता, अवसाद, आत्मघाती विचार और आत्म-नुकसान की भावनाओं को बढ़ावा देता है। इसके अलावा, अकेलापन शिक्षा और रोजगार पर भी असर डालता है। अकेलेपन से जूझ रहे किशोरों के खराब शैक्षणिक प्रदर्शन की संभावना 22% अधिक होती है और वयस्कों को नौकरी पाने या बनाए रखने में कठिनाई होती है।

सामाजिक जुड़ाव के फायदे
दूसरी ओर, मजबूत सामाजिक रिश्ते स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैं, गंभीर बीमारियों के जोखिम को कम करते हैं, और असमय मृत्यु की आशंका को घटाते हैं। यह सामाजिक एकता को बढ़ावा देता है, जिससे समुदाय सुरक्षित, स्वस्थ और अधिक लचीले बनते हैं। मजबूत सामाजिक रिश्तों वाले समुदाय आपदाओं से निपटने में भी अधिक सक्षम होते हैं।

समाधान की राह
रिपोर्ट में अकेलेपन और सामाजिक अलगाव से निपटने के लिए एक रोडमैप प्रस्तुत किया गया है, जिसमें पांच प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं:

  • नीतिगत बदलाव: सामाजिक जुड़ाव को बढ़ावा देने के लिए बेहतर सरकारी नीतियां।
  • शोध और आंकड़े: ग्लोबल सोशल कनेक्शन इंडेक्स जैसे उपकरणों के माध्यम से डेटा संग्रह।
  • हस्तक्षेप: सामुदायिक स्तर पर जागरूकता और हस्तक्षेप कार्यक्रम।
  • सामाजिक ढांचे को मजबूत करना: पार्क, पुस्तकालय, और सामुदायिक केंद्र जैसे स्थान विकसित करना।
  • जन भागीदारी: सामाजिक सोच में बदलाव लाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करना।

रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि अकेलेपन से निपटने के समाधान व्यक्तिगत, सामुदायिक और राष्ट्रीय स्तर पर मौजूद हैं। जागरूकता बढ़ाने, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाने, और सामाजिक ढांचे को मजबूत करने से इस महामारी को कम किया जा सकता है। यह शोध हमें याद दिलाता है कि अकेलापन केवल एक व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि एक सामाजिक संकट है। इसे हल करने के लिए हमें एक-दूसरे के करीब आने और मानवीय रिश्तों को फिर से मजबूत करने की जरूरत है।

NewG Network

contact@newgindia.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

न्यूज़लेटर के लिए सब्सक्राइब करें

कैटेगरीज़

हम वह खबरची हैं, जो खबरों के साथ खबरों की भी खबर रखते हैं। हम NewG हैं, जहां खबर बिना शोरगुल के है। यहां news, without noise लिखी-कही जाती है। विचार हममें भरपूर है, लेकिन विचारधारा से कोई खास इत्तेफाक नहीं। बात हम वही करते हैं, जो सही है। जो सत्य से परामुख है, वह हमें स्वीकार नहीं। यही हमारा अनुशासन है, साधन और साध्य भी। अंगद पांव इसी पर जमा रखे हैं। डिगना एकदम भी गवारा नहीं। ब्रीफ में यही हमारा about us है।

©2025 NewG India. All rights reserved.