Israel-Iran conflict: जंग में फंसे Trump, क्या टूट गया Nobel Prize जीतने का सपना?

डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के छह महीने पूरे हो चुके हैं, लेकिन यह अवधि उनके लिए चुनौतियों से भरी रही है। टैरिफ युद्ध के पहले दौर के कोई ठोस नतीजे नहीं निकले। वहीं, अब उन्होंने सीधे तौर पर ईरान-इजराइल युद्ध में एंट्री ली है। सवाल बड़ा है कि क्या ट्रंप का नोबेल पुरस्कार जीतने का सपना टूट गया है?

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नई दिल्ली: डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के छह महीने पूरे हो चुके हैं, लेकिन यह अवधि उनके लिए चुनौतियों से भरी रही है। टैरिफ युद्ध के पहले दौर के कोई ठोस नतीजे नहीं निकले। यूक्रेन-रूस युद्ध को रोकने के उनके दावे भी अधूर निकले। यूरोपीय संघ में भी उनकी साख कमजोर हुई, और भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम करवाने की कोशिशें उल्टी पड़ गईं। अब ईरान-इजरायल (Israel-Iran conflict) युद्ध अमेरिका की इंट्री ने ट्रंप को ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है, जहां उनके लिए हर कदम जोखिम भरा है।

नेतन्याहू का दांव और ट्रंप की मुश्किल

ट्रंप ओमान में ईरान के साथ परमाणु समझौते को आगे बढ़ाकर अपनी शांतिदूत की छवि मजबूत करना चाहते थे। टेबल पर बात नहीं बन रही थी। वहीं, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ईरान पर हमला कर दिया। इजरायल को यह मंजूर नहीं था कि ईरान परमाणु समझौते की आड़ में अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम को तेज करे। इस हमले ने ट्रंप को असमंजस में डाल दिया है। अमेरिका की नीति इजरायल का हर हाल में समर्थन करने की रही है, लेकिन ट्रंप युद्ध में सीधे कूदकर अपनी ‘शांति स्थापक’ की छवि को भी दांव पर नहीं लगाना चाहते थे। लेकिन संघर्ष इतना लंबा खिंचा कि अमेरिका का युद्ध से दूर रहना मुमकिन नहीं हो सका। और ईरान के तीन परमाणु ठिकानों पर बमबारी की।

पहले दो सप्ताह का दिया समय, अब दो दिन में किया हमला

इससे पहले ट्रंप ने इस स्थिति पर फैसला लेने के लिए दो सप्ताह का समय लिया है। इसका कारण यह बताया गया कि वह यह देखना चाहते थे कि युद्ध किस दिशा में बढ़ रहा है। अगर ईरान की मिसाइलों से इजरायल को भारी नुकसान होता है, तो ट्रंप के पास अमेरिकी जनता को यह बताने का आधार होगा कि ईरान पर हमला क्यों जरूरी है। दूसरी तरफ पर्दे के पीछे अमेरिका पहले से ही इजरायल की मदद करता रहा। पिछले तीन सालों से गाजा पर इजरायल के हमलों के लिए हथियार और ईंधन अमेरिका ही उपलब्ध करा रहा है।

ईरान-इजराइल युद्ध और ईरान की ताकत देखते हुए अमेरिकी रणनीतिकार जान गए थे कि इजराइल के हवाई हमले ईरान के परमाणु ठिकानों को नष्ट करने में सक्षम नहीं होंगे। जबकि मिसाइल हमले से इजराइल को भारी नुकसान भी उठाना पड़ रहा था। इससे अमेरिका के भीतर उन पर ठोस दखल देने का दबाव बढ़ रहा था। इसका नतीजा यह रहा कि अमेरिका के B-2 व GBU-57 ने तीन परमाणु संयंत्रों पर हमले कर दिए। बावजूद इसके, ट्रंप ने माना है कि अब ईरान शांति की दिशा में कदम बढ़ाएगा।

ईरान का जवाब और चुनौतियां

ईरान ने अभी तक अपेक्षाकृत कम क्षमता वाली मिसाइलों से इजरायल पर जवाबी हमले किए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान के परमाणु ठिकाने फोर्दो के पहाड़ों में गहरे छिपे हैं, जहां अमेरिकी बम भी पहुंच नहीं सकते। ईरान का पहाड़ी इलाका और उसकी सैन्य ताकत इसे बेहद खतरनाक बनाती है। अमेरिका ने जो हमले किए, उसमें फोर्दो भी शामिल था। इसके अलावा नतांज व इस्फहान को भी निशाना बनाया। बाद में ट्रंप ने इसकी घोषणा भी की।

इजरायल की कमजोरी और ईरान की ताकत

इजरायल की आबादी मुख्य रूप से चार-पांच बड़े शहरों में केंद्रित है, जिसके कारण वह ईरान की हाइपरसोनिक मिसाइलों के सामने अधिक असुरक्षित है। दूसरी ओर, ईरान का भौगोलिक विस्तार और संसाधन इजरायल से कहीं अधिक हैं। अगर ईरान इजरायल के डिमोना परमाणु संयंत्र पर हमला करता है, जहां परमाणु हथियार बनाने की सामग्री मौजूद है, तो इजराइल को भारी नुकसान हो सकता है।

अमेरिका के लिए खतरा

अगर ईरान इजराइल को भारी नुकसान पहुंचाता है; जैसा अभी तक के संघर्ष में दिख भी रहा है, तो यह अमेरिका के लिए शर्मिंदगी और खतरे का कारण बनेगा। मध्य पूर्व में इजरायल को अमेरिका का प्रमुख सहयोगी माना जाता है। अगर इजरायल तबाह होता है, तो दुनिया यह मानेगी कि अमेरिका अपने सहयोगी को बचा नहीं सका। इससे खाड़ी देशों-जैसे इराक, कुवैत और बहरीन-में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर खतरा बढ़ जाएगा, जो ईरान की मिसाइलों की जद में हैं। अगर यह युद्ध अनिर्णायक रहा या अमेरिका की भागीदारी बढ़ी, तो मध्य पूर्व में अमेरिका की साख और सैन्य सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।

ट्रंप की दुविधा

अमेरिका ने हमेशा युद्ध के समय और स्थान को अपने हिसाब से चुना है। ट्रंप न तो इजराइल को अकेला छोड़ सकते हैं और न ही ईरान के खिलाफ पूर्ण युद्ध में उतरना चाह रहे थे। वह इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष विराम करवाने की स्थिति में भी नहीं हैं, और अगर कोई दूसरी शक्ति ऐसा करती है, तो अमेरिका को यह स्वीकार्य नहीं होगा। दो सप्ताह की जब ट्रंप ने फैसला लेने की तारीख तय की थी, तभी विशेषज्ञों ने कहा था कि जिस कदम हालात हैं, उसमें अमेरिका जल्द ही इजरायल के पक्ष में फैसला ले सकते हैं, क्योंकि उनकी छवि और नीतियां इसे अनिवार्य बनाती हैं। और वह वक्त दो दिन में ही आ गया।

बहरहाल, इस कदम ने राष्ट्रपति ट्रंप के शांतिदूत की छवि को नुकसान पहुंचाया है। खासतौर पर इसलिए भी, कि जिस पाकिस्तान ने ट्रंप को नोबेल पुरस्कार देने की बात की थी, उसने भी ईरान हमले की निंदा की है। और यह जो युद्ध चल रहा है, वह न केवल मध्य पूर्व की भू-राजनीति को प्रभावित करेगा, बल्कि अमेरिका की वैश्विक साख पर भी गहरा असर डालेगा।

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