नई दिल्ली: भारत का खिलौना उद्योग आज केवल बच्चों के खेलने के सामान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था, मैन्युफैक्चरिंग (विनिर्माण), निर्यात और नए इनोवेशन (नवाचार) का एक चमकता हुआ चेहरा बन चुका है। हमारी युवा आबादी, लोगों की बढ़ती आमदनी और शिक्षाप्रद (Educational) खिलौनों की तरफ माता-पिता के बढ़ते झुकाव ने इस सेक्टर के लिए अवसरों के नए दरवाजे खोल दिए हैं। सरकार की योजनाओं जैसे वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP) और जीआई (GI) टैग के प्रोत्साहन ने भारतीय पारंपरिक खिलौनों को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचा दिया है। नतीजा यह है कि आज भारत खिलौनों का आयात (Import) करने वाले देश से बदलकर एक बड़ा निर्यातक (Net Exporter) बन चुका है।
खिलौनों का इतिहास: सिंधु घाटी सभ्यता से आज के आधुनिक युग तक
भारतीय खिलौनों का इतिहास केवल मनोरंजन का नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता के विकास का इतिहास है। यह सफर लगभग 5,000 साल पुराना है।
- प्राचीन शुरुआत (सिंधु घाटी सभ्यता): हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई में मिट्टी के बने बैलगाड़ी के मॉडल, सीटी बजाने वाले पक्षी और धागे से हिलने वाले बंदर मिले हैं। यह इस बात का सबूत है कि प्राचीन भारत के कारीगर विज्ञान और कला के तालमेल को कितनी अच्छी तरह समझते थे।
- सांस्कृतिक जुड़ाव: भारत के गांवों में लकड़ी, कपड़े और मिट्टी से मूर्तियां और खिलौने बनाने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। रामायण और महाभारत की कहानियों से प्रेरित रंग-बिरंगी गुड़िया और खिलौने बच्चों को खेल-खेल में हमारी संस्कृति और संस्कारों से जोड़ते थे।
- आज का स्वरूप: आज वही पारंपरिक कारीगरी कहीं खोई नहीं है, बल्कि उसने आधुनिक तकनीक, नए डिजाइनों और स्टार्टअप्स का हाथ थाम लिया है। अब हमारे पारंपरिक खिलौने सुरक्षित, ज्यादा आकर्षक और वैश्विक मानकों के अनुसार बन रहे हैं।
तुलनात्मक विश्लेषण: पारंपरिक कारीगरी बनाम आधुनिक ट्रेंड्स
समय के साथ बच्चों की पसंद और बाजार की जरूरतें बदली हैं। नीचे दी गई तालिका से समझिए कि भारत कैसे अपने पुराने हुनर को नए जमाने की मांग के साथ ढाल रहा है:
बाजार में उभरते नए अवसर: क्यों बढ़ रही है मांग?
भारत के खिलौना बाजार में आ रहे इस उछाल के पीछे कुछ बेहद ठोस कारण हैं, जिन्हें हम दो हिस्सों में समझ सकते हैं:
क) मांग के मोर्चे पर (Demand Side)
- विशाल युवा आबादी: भारत की 1.4 अरब से ज्यादा की आबादी में एक बहुत बड़ा हिस्सा 25 साल से कम उम्र के युवाओं और बच्चों का है। यह दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता आधार है।
- बढ़ती आमदनी और शहरीकरण: शहरों के तेजी से बसने और मध्यम वर्ग की कमाई बढ़ने से लोग अब बच्चों के खिलौनों पर ज्यादा खर्च करने लगे हैं।
- स्मार्ट पेरेंटिंग और STEM खिलौने: आज के माता-पिता सिर्फ बहलाने वाले खिलौने नहीं चाहते। वे ऐसे खिलौने पसंद कर रहे हैं जो बच्चों के दिमाग का विकास करें, जैसे साइंस किट्स, रोबोटिक्स और गणित से जुड़ी पहेलियां।
- डिजिटल खिलौनों का क्रेज: तकनीक के शौकीन परिवारों में अब एआई (AI) और वर्चुअल रियलिटी (VR) से लैस स्मार्ट खिलौनों की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है।
ख) सप्लाई के मोर्चे पर (Supply Side)
- ई-कॉमर्स का विस्तार: इंटरनेट और ऑनलाइन शॉपिंग ऐप्स की वजह से देश के किसी दूरदराज गांव के कारीगर द्वारा बनाया गया खिलौना भी सीधे बड़े शहरों और विदेशों में बैठे ग्राहकों तक पहुंच रहा है।
आंकड़ों की जुबानी: रिकॉर्ड तोड़ निर्यात और घटता आयात
पिछले कुछ सालों में भारत के खिलौना व्यापार की तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। भारत अब खिलौनों के मामले में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बहुत आगे निकल चुका है।
- कुल निर्यात में भारी उछाल: साल 2017-18 में भारत का कुल खिलौना निर्यात (HSN कोड 9503, 9504 और 9505) जहाँ महज 152.7 मिलियन अमेरिकी डॉलर था, वह साल 2025-26 में बढ़कर 384.7 मिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है। यह 151.9% की शानदार बढ़ोतरी है।
- इलेक्ट्रॉनिक और नॉन-इलेक्ट्रॉनिक खिलौने (HSN 9503): इसमें सबसे बड़ी ग्रोथ देखी गई। यह निर्यात 77.35 मिलियन डॉलर से बढ़कर 200.89 मिलियन डॉलर (लगभग 160% की वृद्धि) हो गया। इसमें अमेरिका (US) सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा, जहाँ हमारा निर्यात चार गुना बढ़कर 111.9 मिलियन डॉलर पर पहुंच गया। इसके अलावा यूके, पोलैंड, नीदरलैंड और जर्मनी भी प्रमुख बाजार हैं।
- वीडियो गेम और कंसोल (HSN 9504): भारतीय गेमिंग और मनोरंजन उत्पादों की मांग भी दुनिया में तेजी से बढ़ी है। इसका निर्यात 15.68 मिलियन डॉलर से लगभग तीन गुना होकर 46.75 मिलियन डॉलर पर पहुंच गया है, जिसमें यूएई, रूस, फ्रांस और यूके बड़े खरीदार हैं।
- त्योहारी और मनोरंजन का सामान (HSN 9505): त्योहारों और कार्निवल से जुड़े सामानों का निर्यात भी 130% बढ़कर 59.69 मिलियन डॉलर से 137.03 मिलियन डॉलर हो गया है। अमेरिका, जर्मनी और स्वीडन जैसे देश इसे खूब पसंद कर रहे हैं।
- आयात में भारी गिरावट: जहां एक तरफ हमारा निर्यात बढ़ा, वहीं पारंपरिक और एजुकेशनल खिलौनों के आयात में 66% की भारी कमी आई है।
- घाटे से मुनाफे का सफर: साल 2017-18 में भारत खिलौनों के व्यापार में 213.01 मिलियन डॉलर के घाटे (Trade Deficit) में था, लेकिन साल 2025-26 में भारत ने 152 मिलियन अमेरिकी डॉलर का व्यापार अधिशेष (Trade Surplus) हासिल कर लिया है। यानी अब हम बाहर से कम मंगाते हैं और दुनिया को ज्यादा बेचते हैं। इससे देश की विदेशी मुद्रा की बचत हो रही है और रोजगार बढ़ रहा है।
सरकारी नीतियां: जिन्होंने बदली खिलौना उद्योग की तकदीर
इस पूरी सफलता के पीछे सरकार की सोची-समझी नीतियां और जमीनी प्रयास रहे हैं। इन प्रमुख पहलों ने इस पूरे इकोसिस्टम को मजबूत किया है:
1. नेशनल एक्शन प्लान फॉर खिलौना (NAPT), 2020
इसे खास तौर पर इसलिए बनाया गया ताकि भारतीय मूल्यों, संस्कृति और इतिहास पर आधारित खिलौनों को बढ़ावा दिया जा सके। इसका मकसद खिलौनों को सिर्फ खेल नहीं, बल्कि पढ़ाई का जरिया बनाना है। इसके तहत घटिया और असुरक्षित विदेशी खिलौनों के आने पर रोक लगाई गई है।
2. क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर (QCO) और BIS लाइसेंस
साल 2020 में लागू किए गए QCO के तहत अब भारत में बिकने वाले हर खिलौने के लिए भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के कड़े सुरक्षा नियमों का पालन करना अनिवार्य है।
- मई 2026 तक, BIS ने घरेलू निर्माताओं को 1786 लाइसेंस और विदेशी निर्माताओं को 56 लाइसेंस जारी किए हैं (IS 9873/IS 15644 मानकों के तहत)।
- यह सुनिश्चित करता है कि खिलौने बच्चों के लिए शारीरिक, रासायनिक और विद्युतीय रूप से पूरी तरह सुरक्षित हों।
- कारीगरों को छूट: हमारे पारंपरिक हस्तशिल्प कारीगरों और जीआई (GI) टैग वाले उत्पादों को इस अनिवार्य लाइसेंस फीस और प्रक्रियाओं से छूट दी गई है ताकि उन पर कोई आर्थिक बोझ न पड़े।
3. कस्टम ड्यूटी (सीमा शुल्क) में बढ़ोतरी
घरेलू कंपनियों को विदेशी सस्ते और घटिया खिलौनों से बचाने के लिए सरकार ने मोस्ट-फेवर्ड नेशन (MFN) टैरिफ यानी कस्टम ड्यूटी को 2020 में 20% से बढ़ाकर 60% किया, और 2023 में इसे और बढ़ाकर 70% कर दिया। वहीं, बजट 2025-26 में इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों के पार्ट्स (पुर्जों) पर ड्यूटी को संतुलित कर 20% किया गया, ताकि भारत में ही इन्हें आसानी से असेंबल और मैन्युफैक्चर किया जा सके।
4. टॉय बिज इंटरनेशनल B2B एक्जीबिशन
4 से 7 जुलाई 2026 तक नई दिल्ली में आयोजित यह प्रदर्शनी देश के सबसे बड़े व्यापारिक मंचों में से एक है। यहाँ भारत के छोटे-बड़े निर्माताओं को सीधे दुनिया भर के डीलर्स और खरीदारों से मिलने और बड़े बिजनेस ऑर्डर हासिल करने का मौका मिलता है।
5. टॉयकाथॉन (Toycathon) और ई-टॉयकाथॉन
साल 2021 में शुरू हुए ‘टॉयकाथॉन’ के जरिए देश के छात्रों, शिक्षकों और स्टार्टअप्स को भारतीय संस्कृति, लोककथाओं और वीर नायकों पर आधारित नए खिलौने डिजाइन करने के लिए प्रेरित किया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर को मजबूत करने के लिए 2025 में पहली बार ई-टॉयकाथॉन (Electronic Toy Hackathon) भी कराया गया।
6. ई-टॉयज लैब (e-Toys Lab)
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) द्वारा सी-डैक (C-DAC), नोएडा में स्थापित यह लैब देश के युवा इंजीनियरों (विशेष रूप से एससी/एसटी और उत्तर-पूर्वी राज्यों के युवाओं) को एक साल की ट्रेनिंग देती है। इसमें 6 महीने रिसर्च और 6 महीने सीधे इंडस्ट्री में काम करना शामिल है, ताकि भारत हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक खिलौने खुद बना सके।
7. मानक मंथन (Manak Manthan)
अप्रैल 2026 में भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने खिलौनों की मैकेनिकल और फिजिकल सेफ्टी (भौतिक सुरक्षा) से जुड़े नियमों (IS 9873 Part 1:2025) पर एक जागरूकता कार्यक्रम चलाया। इसका मकसद निर्माताओं को यह समझाना था कि वे बच्चों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के सुरक्षित और भरोसेमंद खिलौने कैसे तैयार करें।
क्षेत्रीय विकास और बाजार का विस्तार
भारत सरकार ने देश के हर कोने की खासियत को पहचानकर उसे ग्लोबल ब्रांड बनाने के लिए रणनीतियां अपनाई हैं:
- वन डिस्ट्रिक्ट, वन प्रोडक्ट (ODOP): इस योजना के तहत हर जिले के खास खिलौनों की पहचान की गई है। उन्हें बेहतर पैकेजिंग, ब्रांडिंग, नई तकनीक और ऑनलाइन बाजारों (E-commerce) से जोड़ा जा रहा है ताकि स्थानीय कारीगरों की कमाई बढ़ सके।
- जीआई टैग वाले खिलौने (GI Tagged Toys): जीआई टैग मिलने से किसी उत्पाद की नकल नहीं की जा सकती और उसकी प्रामाणिकता बनी रहती है। हमारे प्रमुख जीआई टैग वाले खिलौनों में शामिल हैं:
- चन्नापटना खिलौने और गुड़िया (कर्नाटक) – जो अपनी खास चमकदार लकड़ी और प्राकृतिक रंगों के लिए जाने जाते हैं।
- इंदौर के चमड़े के खिलौने (मध्य प्रदेश) – जो बेहद सजीव और कलात्मक लगते हैं।
- तंजावुर गुड़िया (तमिलनाडु) – जो अपने अनूठे संतुलन और डांसिंग मूवमेंट के लिए प्रसिद्ध है।
- जीएसटी (GST) दरों में कटौती: सरकार ने खिलौनों पर लगने वाले टैक्स (GST) को 12% से घटाकर सीधे 5% कर दिया है। इससे खिलौने सस्ते हुए हैं और छोटे व मध्यम उद्योगों (MSMEs) को बड़ा सहारा मिला है।
- फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTA – मुक्त व्यापार समझौते): भारत ने यूएई (CEPA), ऑस्ट्रेलिया (ECTA), ईएफटीए (EFTA), ओमान, न्यूजीलैंड और यूके जैसी वैश्विक ताकतों के साथ व्यापार समझौते किए हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि भारतीय खिलौनों को इन देशों के बाजारों में जीरो-ड्यूटी (बिना किसी सीमा शुल्क के) एंट्री मिल रही है।
- डिस्ट्रिक्ट्स एज एक्सपोर्ट हब (DEH): इस योजना के तहत राज्यों और जिलों की कमेटियों को मिलाकर देश के 10 से ज्यादा ऐसे जिलों की पहचान की गई है, जिनमें खिलौने और गुड़िया निर्यात करने की भारी क्षमता है। इन्हें हर तरह की लॉजिस्टिक्स और एक्सपोर्ट सर्टिफिकेट की सुविधाएं दी जा रही हैं।
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव: रोजगार और महिला सशक्तिकरण
खिलौना उद्योग का यह बदलाव सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है, इसका एक बहुत बड़ा सामाजिक पहलू भी है:
- दोगुना हुआ रोजगार: नेशनल इंडस्ट्रियल क्लासिफिकेशन (NIC कोड 324) के आंकड़ों के मुताबिक, गेम्स और खिलौना उद्योग में काम करने वाले औपचारिक कर्मचारियों की संख्या साल 2018-19 में जहाँ 8,685 थी, वह साल 2023-24 में बढ़कर 17,693 हो गई। यानी महज कुछ सालों में रोजगार के अवसर दोगुने से भी ज्यादा हो गए।
- आर्थिक भागीदारी: यह सेक्टर ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में छोटे उद्यमियों को बढ़ावा देता है। सबसे खास बात यह है कि खिलौना बनाने, उसकी पैकेजिंग और फिनिशिंग के काम में महिलाओं और समाज के पिछड़े वर्गों की भागीदारी बहुत ज्यादा है, जिससे वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रहे हैं।
निष्कर्ष: आगे की राह
आज भारत का खिलौना उद्योग अपनी पुरानी सांस्कृतिक जड़ों को छोड़े बिना आधुनिकता की नई ऊंचाइयों को छू रहा है। कड़े सुरक्षा मानक, टैक्स में छूट, और दुनिया के बड़े देशों के साथ हुए समझौतों ने भारतीय कारीगरों के हुनर को ग्लोबल मार्केट का लीडर बना दिया है। वह दिन दूर नहीं जब दुनिया के हर घर में बच्चों के हाथों में ‘मेड इन इंडिया’ का सुरक्षित, टिकाऊ और ज्ञानवर्धक खिलौना होगा।



