नई दिल्ली। दिल्ली के उपराज्यपाल (एलजी) सरदार टी.एस. संधू ने इंडिया फाउंडेशन द्वारा इंडिया हैबिटेट सेंटर के स्टीन ऑडिटोरियम में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम की अध्यक्षता की। इस गरिमामयी समारोह में कांची कामकोटि पीठम के शंकराचार्य शंकर विजयेंद्र सरस्वती स्वामीगल और इंडिया फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. राम माधव सहित कई नीति-निर्माता, राजनयिक और प्रबुद्ध विद्वान उपस्थित रहे। कार्यक्रम में शंकराचार्य स्वामीगल का स्वागत करते हुए उपराज्यपाल ने कहा कि यह अवसर देश की राजधानी दिल्ली को भारत की प्राचीन, समृद्ध और जीवंत आध्यात्मिक परंपरा से जोड़ने वाला एक ऐतिहासिक क्षण है। उन्होंने इस महत्वपूर्ण विमर्श के आयोजन के लिए इंडिया फाउंडेशन की सराहना की।
कांची कामकोटि पीठम का इतिहास
अपने संबोधन के दौरान एलजी सरदार टी.एस. संधू ने कांची कामकोटि पीठम को भारत की एक महान सभ्यतागत संस्था बताया। उन्होंने रेखांकित किया कि कांचीपुरम में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित यह पीठम पिछले 2500 से अधिक वर्षों से 71 आचार्यों की अखंड परंपरा को आगे बढ़ा रहा है और देश की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में अहम भूमिका निभा रहा है। उपराज्यपाल ने कहा कि पीठम का संपूर्ण कार्य तीन मुख्य आधारों— वेद, विद्या और वैद्य पर केंद्रित है। जहां ‘वेद’ के माध्यम से वैदिक ज्ञान और परंपराओं को सुरक्षित रखा जा रहा है, वहीं ‘विद्या’ के क्षेत्र में इंटीग्रेटेड पाठशालाओं और श्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती विश्व महाविद्यालय जैसे संस्थानों द्वारा शिक्षा का प्रसार हो रहा है। इसके साथ ही, ‘वैद्य’ के अंतर्गत पीठम के धर्मार्थ स्वास्थ्य संस्थान नि:स्वार्थ भाव से समाज की सेवा कर रहे हैं।
‘विकसित भारत’ का विजन
उपराज्यपाल ने राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने और सुदूर क्षेत्रों में सामाजिक पहुंच बनाने के लिए भी पीठम के प्रयासों की खुले दिल से प्रशंसा की। उन्होंने विशेष रूप से पूर्वोत्तर भारत और जम्मू-कश्मीर में चलाए जा रहे आध्यात्मिक व सामाजिक कार्यक्रमों, प्राचीन पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण और पारंपरिक मंदिर वास्तुकला के संरक्षण में पीठम के उल्लेखनीय योगदान का जिक्र किया। एलजी ने कहा कि दिल्ली विभिन्न संस्कृतियों का संगम है और ऐसी सभ्यतागत संस्थाओं से प्रेरणा लेती है। कांची कामकोटि पीठम द्वारा संजोए गए मूल्य ‘विकसित भारत’ की हमारी यात्रा में ज्ञान, सद्भाव और मार्गदर्शन का मार्ग प्रशस्त करते रहेंगे। कार्यक्रम के अंत में एलजी संधू ने शंकराचार्य स्वामीगल को सादर नमन करते हुए उनसे सभा को अपने आशीर्वचनों से अनुगृहीत करने का अनुरोध किया।



