अंकारा — इस हफ्ते नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नाटो) के राष्ट्रप्रमुख और बड़े नेता तुर्किए की राजधानी अंकारा में जुटने जा रहे हैं। मंगलवार और बुधवार को होने वाली इस दो दिवसीय हाई-प्रोफाइल बैठक का मुख्य एजेंडा दुनिया के सामने गठबंधन की अटूट एकता प्रदर्शित करना है। लेकिन हकीकत इसके उलट है। रणनीतिक प्राथमिकताओं, रक्षा पर होने वाले अंधाधुंध खर्च और इस संगठन के भविष्य के बुनियादी मकसद को लेकर सदस्य देशों के बीच ऐसे गहरे मतभेद पैदा हो चुके हैं, जिन्हें अब कूटनीतिक बयानों के पीछे छिपाना मुमकिन नहीं रह गया है।
यह बैठक एक बेहद अशांत और संवेदनशील समय में हो रही है। हाल ही में ईरान के खिलाफ अमेरिकी और इजरायली सेना के संयुक्त ऑपरेशनों को लेकर सहयोगी देशों में आपसी खींचतान मची हुई है। साथ ही, पिछले साल हेग समझौते में तय किए गए विशाल रक्षा बजट को लागू करने के दबाव ने कई यूरोपीय देशों की आंतरिक राजनीति और अर्थव्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। केवल सरकारों के स्तर पर ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर भी यूरोप के कई हिस्सों और विशेष रूप से मेजबान देश तुर्किए में नाटो के खिलाफ आम जनता की नाराजगी खुलकर सड़कों पर दिखाई दे रही है।
ईरान पर अमेरिकी एक्शन और नाटो में पहला बड़ा बिखराव
मतभेद की सबसे ताजा और गंभीर चिंगारी फरवरी के आखिर में तब भड़की, जब अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के खिलाफ सीधे सैन्य हमले किए। वाशिंगटन ने इस हमले का मकसद ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना बताया था। हालांकि, राजनीतिक और कूटनीतिक तौर पर नाटो के अधिकांश सहयोगियों ने अमेरिका के इस तर्क का समर्थन जरूर किया, लेकिन जब बात सीधे तौर पर इस सैन्य ऑपरेशन में शामिल होने या अपनी सेनाएं भेजने की आई, तो लगभग सभी यूरोपीय देशों ने अपने हाथ पीछे खींच लिए।
न्यूज एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार, तनाव बढ़ने के बाद जब अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते ‘होर्मुज स्ट्रेट’ (Strait of Hormuz) को खुला रखने और सुरक्षा देने के नाम पर अपने सहयोगी देशों से युद्धपोत (Warships) भेजने की मांग की, तो यूरोपीय सहयोगियों ने इसमें भारी हिचकिचाहट दिखाई। यूरोपीय देशों के इस रुख से भड़के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से उनकी कड़ी आलोचना की। ट्रंप ने सीधे तौर पर यूरोपीय देशों पर आरोप लगाया कि:
“यूरोपीय सहयोगी देश किसी भी सैन्य कार्रवाई के खतरों और जोखिमों से खुद को बचाना चाहते हैं, लेकिन वे लगातार अमेरिका द्वारा मिलने वाली मुफ्त सुरक्षा गारंटी का पूरा फायदा उठा रहे हैं।”
विश्लेषकों का नजरिया: एकता बनाम क्षेत्रीय स्थिरता
अंकारा स्थित ‘सेंटर फॉर मिडिल ईस्टर्न स्टडीज’ के सीनियर रिसर्चर ओयतुन ओरहान के मुताबिक, यूरोपीय देशों और अमेरिका के सोचने के तरीके में बुनियादी अंतर है। उन्होंने स्पष्ट किया:
- यूरोपीय दृष्टिकोण: कई यूरोपीय देश ईरान पर अमेरिका के इन हमलों को वाशिंगटन के प्रति एकजुटता दिखाने के मौके के रूप में नहीं देखते। वे इसे मुख्य रूप से अपनी क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक हितों के चश्मे से देख रहे हैं।
- जोखिम की आशंका: इस सीधे सैन्य हस्तक्षेप में कूदने का मतलब था खुद को ईरान की जवाबी कार्रवाई के खतरे में डालना। इससे यूरोप की ऊर्जा (तेल और गैस) आपूर्ति पूरी तरह ठप हो सकती थी। इसके अलावा, युद्ध की स्थिति में प्रवासन (माइग्रेशन या शरणार्थियों) का जो नया संकट खड़ा होता, वह यूरोपीय देशों की घरेलू कानून-व्यवस्था और अर्थव्यवस्था को पूरी तरह तबाह कर देता, जो पहले से ही कई आंतरिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं।
विदेश नीति विश्लेषक और नाटो मामलों के विशेषज्ञ पत्रकार सेरकान डेमिरटास का मानना है कि यूरोप का यह कदम इतिहास की पुरानी गलतियों से सीखे गए सबक का नतीजा है। डेमिरटास ने कहा:
“इराक, अफगानिस्तान और लीबिया में अतीत में किए गए सैन्य ऑपरेशनों के कड़वे अनुभवों ने यूरोपीय सरकारों को बहुत सतर्क बना दिया है। अब वे किसी भी ऐसे सैन्य अभियान का हिस्सा बनने से साफ हिचकिचाती हैं जिसके पास न तो कोई ठोस अंतरराष्ट्रीय कानूनी वैधता हो और न ही कोई स्पष्ट रूप से तय किया गया अंतिम मकसद हो।”
“नाटो 3.0” और जीडीपी का 5% रक्षा बजट: एक नामुमकिन लक्ष्य?
अंकारा समिट के दौरान जिस सबसे विवादास्पद मुद्दे पर सबसे ज्यादा बहस होने की उम्मीद है, वह है पिछले साल हेग (The Hague) में हुए नाटो समिट का एक बड़ा फैसला। इस समझौते के तहत सभी सदस्य देशों ने संकल्प लिया था कि वे साल 2035 तक अपने रक्षा से जुड़े खर्च को बढ़ाकर अपनी कुल जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का 5 फीसदी तक ले जाएंगे।
| नाटो रक्षा खर्च का नया रोडमैप (हेग समझौता) |
| लक्ष्य वर्ष: 2035 |
| नया बजट मानक: कुल जीडीपी का 5% |
| रणनीतिक नाम: नाटो 3.0 (NATO 3.0) |
| मुख्य उद्देश्य: पारंपरिक सुरक्षा का बोझ अमेरिका से हटाकर यूरोप पर डालना |
इस भारी-भरकम टारगेट को ट्रंप प्रशासन की नई नीति “नाटो 3.0″ का सबसे मुख्य स्तंभ माना जा रहा है। अमेरिका का सीधा और साफ मकसद है कि यूरोप के पारंपरिक डिफेंस (कन्वेंशनल सुरक्षा) की जो वित्तीय और सैन्य जिम्मेदारी अब तक वाशिंगटन उठाता आया है, उसे पूरी तरह से यूरोपीय सदस्य देशों के कंधों पर शिफ्ट कर दिया जाए। राष्ट्रपति ट्रंप लंबे समय से यह अल्टीमेटम देते रहे हैं कि यदि नाटो सहयोगी अपना सैन्य बजट नहीं बढ़ाते हैं, तो अमेरिका उनके लिए अपनी परमाणु और पारंपरिक सुरक्षा गारंटी को वापस लेने या उस पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर होगा।
कागजी समझौते और जमीनी हकीकत का टकराव
हालांकि कूटनीतिक दबाव में सभी देशों ने इस 5 फीसदी के लक्ष्य पर हस्ताक्षर तो कर दिए हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्री और नीति विशेषज्ञ इस बात पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह व्यावहारिक रूप से संभव भी है?
तुर्किए के जाने-माने विश्लेषक हसन उनाल ने इस नीति की अंदरूनी हकीकत को उजागर करते हुए कहा कि कई यूरोपीय सरकारों ने इस टारगेट को केवल इसलिए स्वीकार किया ताकि उस समय वाशिंगटन के साथ होने वाले सीधे टकराव और कूटनीतिक अपमान से बचा जा सके। उनाल के शब्दों में:
“साल 2035 के लक्ष्य पर सहमत होना बेहद आसान था क्योंकि वह समय अभी भी एक दशक (10 साल) आगे है। अमेरिका का सीधे मुंह पर विरोध करने से जो तत्काल गंभीर तनाव पैदा होता, उससे बचने के लिए यह एक आसान राजनीतिक रास्ता था।”
प्रोफेसर उनाल ने उन तीन बड़ी आर्थिक और सामाजिक रुकावटों को भी रेखांकित किया जो यूरोपीय देशों के सामने दीवार बनकर खड़ी हैं:
- धीमी आर्थिक वृद्धि और मंदी: अधिकांश प्रमुख यूरोपीय देशों की जीडीपी विकास दर बेहद सुस्त है।
- भारी सार्वजनिक कर्ज (Public Debt): सरकारों पर पहले से ही कर्ज का भारी बोझ है।
- बूढ़ी होती आबादी (Aging Population): यूरोप की आबादी का एक बड़ा हिस्सा बुजुर्ग हो रहा है, जिसके कारण सरकारों को पेंशन और सामाजिक सुरक्षा पर ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है।
इसके अलावा, घरेलू राजनीति सबसे बड़ी बाधा है। लोकतांत्रिक यूरोपीय देशों के समाज और वहां के आम नागरिक आमतौर पर अपने टैक्स के पैसे को सेना, हथियारों या मिसाइलों पर खर्च करने के बजाय बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं (Healthcare), वर्ल्ड-क्लास शिक्षा (Education) और सोशल वेलफेयर (सामाजिक कल्याण) पर खर्च करना पसंद करते हैं। ऐसे में वहां की सरकारों के लिए अपने वोटर्स को यह समझाना नामुमकिन के बराबर होगा कि वे जनता की बुनियादी सुविधाओं में कटौती करके मिलिट्री बजट को इस कदर क्यों बढ़ा रहे हैं।
सड़कों पर फूटा गुस्सा: “नाटो को जंग चाहिए, श्रमिकों को शांति”
पॉलिसी और रणनीतियों के इस आंतरिक टकराव के बीच, खुद नाटो संगठन को आम जनता के बीच अपनी गिरती साख और भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। अंकारा समिट की शुरुआत से ठीक पहले तुर्किए के तीन सबसे बड़े शहरों — अंकारा, इस्तांबुल और इजमिर — की सड़कों पर नाटो के खिलाफ विशाल जन-प्रदर्शन देखने को मिले हैं।
प्रदर्शनकारियों ने नाटो को एक ‘साम्राज्यवादी युद्ध संगठन’ (Imperialist War Organization) करार दिया है जो दुनिया भर में शांति और स्थिरता स्थापित करने के बजाय उसे खतरे में डालता है। जनता का आरोप है कि नाटो के दबाव में आकर सरकारें शिक्षा, स्वास्थ्य और आम मजदूरों की सैलरी से रिसोर्स (बजट) छीनकर उसे हथियारों की अंधी दौड़ में झोंक रही हैं।
सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारियों के हाथों में जो बैनर थे, उन पर साफ तौर पर ये नारे लिखे हुए थे:
- “नाटो को जंग चाहिए, श्रमिकों को शांति चाहिए!”
- “बजट लोगों की भलाई के लिए हो, नाटो के हथियारों के लिए नहीं!”
- “नाटो को ना, युद्ध को ना!”
यह विरोध प्रदर्शन केवल तुर्किए तक सीमित नहीं है। पिछले दो सालों (2025 और 2026) के दौरान इसी तरह के उग्र और बड़े नाटो विरोधी प्रदर्शन नीदरलैंड्स और स्पेन जैसे यूरोपीय देशों में भी देखे जा चुके हैं। इस्तांबुल में वीकेंड के दौरान हुए प्रदर्शनों में ट्रेड यूनियनों के मजदूरों, छात्रों, आम नागरिकों और कई राजनीतिक पार्टियों के सदस्यों ने एक सुर में नाटो को पूरी तरह भंग (खत्म) करने की मांग की।
ऐतिहासिक तुलना और वर्तमान रुझान: किसे हो रहा है फायदा?
यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें, तो नाटो का गठन 1949 में सोवियत संघ (USSR) के साम्यवाद के प्रसार को रोकने के लिए एक रक्षात्मक गठबंधन के रूप में किया गया था। शीत युद्ध (Cold War) के दौरान इसका एक निश्चित दायरा और मकसद था। लेकिन सोवियत संघ के विघटन के बाद, नाटो ने खुद को समेटने के बजाय अपना विस्तार करना शुरू कर दिया।
तुलनात्मक विश्लेषण: पुराना नाटो बनाम वर्तमान नाटो
- शीत युद्ध का दौर (Old NATO): रक्षात्मक रुख, सामूहिक सुरक्षा की स्पष्ट परिभाषा (आर्टिकल 5), और मुख्य फोकस यूरोपीय महाद्वीप की सुरक्षा पर।
- 21वीं सदी का नाटो (Modern NATO): आक्रामक रुख, अपने भौगोलिक दायरे से बाहर निकलकर (Out of Area) इराक, अफगानिस्तान, लीबिया और अब ईरान के नजदीक मध्य-पूर्व में दखल देना। इसे अब रक्षात्मक के बजाय एक ‘आर्थिक-वैचारिक’ प्रहरी के रूप में देखा जाने लगा है।
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक बड़ा आर्थिक कोण भी छिपा हुआ है। अंकारा समिट में अरबों डॉलर के बड़े रक्षा खरीद समझौतों (Defense Procurement Deals) की घोषणा होने की पूरी उम्मीद है। मजे की बात यह है कि इन समझौतों के तहत जो भी हथियार, फाइटर जेट या डिफेंस सिस्टम खरीदे जाएंगे, उनमें से अधिकांश का टेंडर अमेरिकी रक्षा कंपनियों (जैसे लॉकहीड मार्टिन, रेथियॉन आदि) को मिलेगा।
प्रोफेसर हसन उनाल कहते हैं:
“जब भी कोई नाटो सदस्य देश संगठन के मानकों और इंटरऑपरेबिलिटी (Interoperability) के हिसाब से नए सैन्य उपकरण खरीदता है, तो अमेरिकी रक्षा कंपनियों को उसका स्वाभाविक और सबसे बड़ा फायदा मिलता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस पूरे अलायंस की रणनीतिक दिशा को तय करने के पीछे अमेरिका का अपना बड़ा व्यापारिक और भू-राजनीतिक स्वार्थ है।”
इस्तांबुल की मरमारा यूनिवर्सिटी के प्रसिद्ध स्कॉलर बारिस डोस्टर ने इस पूरे परिदृश्य को बेहद कड़े शब्दों में समेटते हुए कहा कि नाटो के खिलाफ हो रहे ये प्रदर्शन असल में दुनिया के बढ़ते सैन्यवाद (Militarization) के खिलाफ आम जनता की चीख हैं। उन्होंने निष्कर्ष निकाला:
“नाटो कोई साधारण या निष्पक्ष रक्षा और सुरक्षा संगठन नहीं है। यह एक ऐसा ढांचा है जिसकी अपनी गहरी आर्थिक, राजनीतिक और वैचारिक प्राथमिकताएं हैं। सीधे शब्दों में कहें तो, अमेरिका के नेतृत्व में यह संगठन वैश्विक स्तर पर पूंजीवाद, साम्राज्यवाद और उदारवाद के ‘जेंडार्म’ (यानी चौकीदार/प्रहरी) की तरह काम करता है।”
अंकारा में होने वाली यह बैठक केवल कुछ समझौतों पर दस्तखत करने का जरिया नहीं होगी, बल्कि यह नाटो के इतिहास का वह मोड़ साबित हो सकती है जहां यह तय होगा कि अंदरूनी कलह और बाहरी विरोध से घिरा यह गठबंधन आने वाले दशकों में एकजुट रह भी पाता है या नहीं।



