नई दिल्ली, 2 जुलाई: आज सुबह 11:00 बजे संसद भवन एनेक्सी में लोक लेखा समिति (पीएसी) की एक अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई है। इस बैठक की अध्यक्षता कांग्रेस सांसद के.सी. वेणुगोपाल कर रहे हैं। चर्चा का मुख्य केंद्र ‘केंद्र प्रायोजित कल्याणकारी योजनाओं’ का प्रभावी कार्यान्वयन है। यह बैठक ऐसे संवेदनशील समय पर हो रही है जब भारत का पूरा ग्रामीण रोजगार ढांचा एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। शिक्षा मंत्रालय, स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग तथा उच्च शिक्षा विभाग के शीर्ष अधिकारी इस समिति के समक्ष अपनी रिपोर्ट और साक्ष्य प्रस्तुत कर रहे हैं।
इतिहास के झरोखे से: मगनरेगा का उदय और प्रभाव
ग्रामीण भारत में रोजगार की समस्या हमेशा से ही नीति निर्धारकों के लिए चिंता का विषय रही है। 2005 में तत्कालीन सरकार ने ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ (मगनरेगा) को पेश किया था। यह कानून भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है। इसने ग्रामीण परिवारों को एक ‘कानूनी अधिकार’ दिया कि वे एक वित्तीय वर्ष में कम से कम 100 दिनों का अकुशल शारीरिक काम मांग सकते हैं।
पिछले 20 वर्षों में, मगनरेगा ने न केवल ग्रामीण गरीबी को कम करने में मदद की, बल्कि जल संरक्षण, ग्रामीण बुनियादी ढांचे और महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण में भी बड़ी भूमिका निभाई। यह मांग-आधारित कानून था, जहाँ राज्य सरकारें काम की मांग के अनुसार धन की मांग केंद्र से करती थीं। हालांकि, समय के साथ इसमें कई चुनौतियां भी आईं, जैसे वेतन में देरी, फर्जी मस्टर रोल और कार्यान्वयन में पारदर्शिता की कमी।
वीबी-जी राम जी : एक नए युग का आगाज
दिसंबर 2025 के शीतकालीन सत्र में संसद ने एक नया कानून पारित किया, जिसने 2005 के मगनरेगा को प्रतिस्थापित कर दिया। यह कानून ‘विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन-ग्रामीण’ या ‘वीबी-जी राम जी एक्ट ‘ के नाम से जाना जाता है और कल, यानी 1 जुलाई 2026 से पूरे देश में प्रभावी हो गया है।
नए कानून की मुख्य विशेषताएं:
- 125 दिनों की गारंटी: पुराने कानून में जहाँ 100 दिनों का काम सुनिश्चित था, वहीं अब इसे बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है। सरकार का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों की आय सुरक्षा को अधिक मजबूत बनाना है।
- सीधी लाभ हस्तांतरण (डीबीटी): वेतन सीधे श्रमिकों के बैंक या पोस्ट ऑफिस खातों में जमा किए जाएंगे।
- समयबद्ध भुगतान: मस्टर रोल बंद होने के 15 दिनों के भीतर वेतन का भुगतान करना अनिवार्य है। यदि इसमें देरी होती है, तो श्रमिकों को ‘विलंब मुआवजा’ पाने का कानूनी अधिकार होगा।
- कौशल और सक्षमता: यह कानून केवल ‘गड्ढे खोदने’ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण विकास के स्थायी कार्यों और टिकाऊ परिसंपत्तियों के निर्माण पर जोर देता है।
आलोचना और राजनीतिक विवाद
हर बड़े बदलाव की तरह, इस कानून पर भी तीखी बहस चल रही है। विपक्ष ने मुख्य रूप से दो बिंदुओं पर कड़ी नाराजगी जताई है:
- महात्मा गांधी के नाम का लोप: विपक्ष का आरोप है कि इस योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाना न केवल राजनीतिक है, बल्कि यह देश के उस गौरवशाली इतिहास को मिटाने जैसा है जिसने करोड़ों गरीबों को आत्मसम्मान दिया।
- फंडिंग मॉडल (60:40 का अनुपात): नया कानून केंद्र और राज्यों के बीच फंडिंग का एक निश्चित अनुपात तय करता है। आलोचकों का तर्क है कि इससे राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा, विशेषकर उन राज्यों पर जिनकी अपनी आय कम है। साथ ही, आलोचकों का यह भी मानना है कि पहले यह व्यवस्था पूरी तरह ‘मांग-आधारित’ थी, जबकि अब फंडिंग की सीमाएं इसे सीमित कर सकती हैं।
तुलनात्मक विश्लेषण: मगनरेगा बनाम वीबी-जी राम जी
वर्तमान और अतीत के बीच के इस सफर को हम इस तुलनात्मक तालिका से समझ सकते हैं:
| मानक | मनरेगा (2005-2025) | वीबी-जी राम जी एक्ट (2026-आगे) |
| रोजगार अवधि | 100 दिन | 125 दिन |
| दृष्टिकोण | पूर्ण रूप से मांग-आधारित | मांग-आधारित लेकिन बजट की शर्तों के साथ |
| भुगतान | मस्टर रोल के बाद (देरी आम थी) | कड़े नियम और देरी पर हर्जाना |
| फंडिंग | केंद्र-केंद्रित (ज्यादातर केंद्र का) | 60:40 अनुपात (केंद्र-राज्य) |
वर्तमान रुझान और भविष्य की चुनौतियां
आज का भारत 2005 के भारत से भिन्न है। हमारे पास अब डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की ताकत है। वीबी-जी राम जी एक्ट में तकनीक का उपयोग करके भ्रष्टाचार को कम करने की कोशिश की गई है, जैसे कि मोबाइल मॉनिटरिंग और जियो-टैगिंग।
वर्तमान में, ग्रामीण विकास की मांग केवल ‘काम’ की नहीं, बल्कि ‘गुणवत्तापूर्ण काम’ की है। पीएसी की बैठक में आज जिस तरह से शिक्षा और रोजगार की समीक्षा की जा रही है, उससे स्पष्ट है कि सरकार का ध्यान अब युवाओं के कौशल विकास और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को विकसित भारत के लक्ष्य (2047) के साथ जोड़ने पर है।
हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती यह है कि 125 दिनों का रोजगार वास्तव में अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक पहुंचता है या नहीं। क्या 60:40 का अनुपात राज्यों को काम देने से रोकेगा? यह आने वाले महीनों में स्पष्ट होगा।
निष्कर्ष
वीबी-जी राम जी कानून ग्रामीण भारत के लिए एक बड़ा ‘जुआ’ भी है और एक ‘अवसर’ भी। जहाँ 125 दिनों का काम परिवारों के लिए वरदान साबित हो सकता है, वहीं इसके कार्यान्वयन की प्रशासनिक जटिलताएं सरकार के लिए अग्निपरीक्षा होंगी। लोक लेखा समिति की आज की समीक्षा का उद्देश्य यही है कि इस संक्रमण काल में कमियों को कैसे सुधारा जाए और योजना को अधिक समावेशी कैसे बनाया जाए।



