प्रौद्योगिकी-संचालित युद्ध : राष्ट्रीय सुरक्षा का नया आयाम

हम एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़े हैं जहाँ राष्ट्रों द्वारा अपनी संप्रभुता की रक्षा करने और शक्ति प्रदर्शन करने के तरीके में एक स्मारकीय परिवर्तन हो रहा है। जैसे-जैसे पारंपरिक युद्धक्षेत्र के तरीके अत्यधिक परिष्कृत और हाई-टेक रणनीतिक संचालन के लिए रास्ता बना रहे हैं, राष्ट्रीय सुरक्षा अब स्पष्ट रूप से वैज्ञानिक और तकनीकी प्रभुत्व द्वारा परिभाषित हो रही है। पिछले एक दशक में रक्षा उत्पादन में 174% की आश्चर्यजनक वृद्धि से प्रेरित होकर, भारत आक्रामक और व्यापक रूप से अपने रक्षा ढांचे को नया आकार दे रहा है। राष्ट्र की सुरक्षा का भविष्य अब केवल शारीरिक बल, भौगोलिक लाभ या जनशक्ति पर निर्भर नहीं करेगा, बल्कि यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्वांटम तकनीक, जैव प्रौद्योगिकी और उन्नत अंतरिक्ष क्षमताओं के शक्तिशाली और परिवर्तनकारी अभिसरण (convergence) पर अटूट रूप से टिका होगा।

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नई दिल्ली: एक ऐसे युग में जहां किसी राष्ट्र के रणनीतिक वजन और भू-राजनीतिक प्रभाव को केवल उसकी पैदल सेना के आकार, नौसैनिक बेड़े के टन भार या युद्धक टैंकों की संख्या से नहीं मापा जाता है, वैश्विक सुरक्षा प्रतिमान एक गहरे, त्वरित और अपरिवर्तनीय परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। नागरिक तकनीकी सफलताओं और कठोर सैन्य अनुप्रयोगों को अलग करने वाली पारंपरिक सीमाएं अब पूरी तरह से धुंधली हो गई हैं। आज, वैज्ञानिक नवाचार राष्ट्रीय शक्ति की अंतिम मुद्रा बन गया है, जो एक भी गोली चलने से पहले ही युद्ध की शर्तें तय कर देता है।

इस महत्वपूर्ण और युगांतरकारी बदलाव को संबोधित करते हुए, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान के केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री, डॉ. जितेंद्र सिंह ने हाल ही में प्रतिष्ठित नेशनल डिफेंस कॉलेज (NDC) में वरिष्ठ अधिकारियों, रणनीतिक विचारकों और पाठ्यक्रम प्रतिभागियों को एक ऐतिहासिक और गहराई से ज्ञानवर्धक संबोधन दिया।

“विज्ञान और प्रौद्योगिकी का भविष्य का प्रक्षेपवक्र और राष्ट्रीय सुरक्षा पर इसका प्रभाव” के व्यापक विषय पर विस्तार से बोलते हुए, डॉ. सिंह ने एक भविष्योन्मुखी खाका पेश किया, जो यह दर्शाता है कि कैसे प्रौद्योगिकी-संचालित युद्ध पूरी तरह से राष्ट्रीय सुरक्षा के मूलभूत मापदंडों को फिर से परिभाषित कर रहा है। उन्होंने सैन्य और रणनीतिक नेतृत्व को स्पष्ट कर दिया: तेजी से उभरती, बहुआयामी सुरक्षा चुनौतियों का प्रभावी ढंग से जवाब देने और अत्यधिक अस्थिर, परस्पर जुड़े और जटिल वैश्विक वातावरण में रणनीतिक हितों को सुरक्षित करने के लिए, भारत के पास प्रौद्योगिकी वक्र (technology curve) में सबसे आगे रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

पारंपरिक सैन्य प्रतिष्ठानों की सीमाओं से परे जाना

ऐतिहासिक रूप से, राष्ट्रीय रक्षा और रणनीतिक तैयारियों के आसपास उच्च स्तरीय चर्चाएं अत्यधिक गोपनीय थीं, जिन्हें गुप्त सैन्य प्रतिष्ठानों तक ही सीमित रखा जाता था। इनका मुख्य ध्यान सैन्य तैनाती, सीमा गश्त, तोपखाने और पारंपरिक हथियारों के भंडार पर केंद्रित होता था। हालाँकि, डॉ. सिंह ने दृढ़तापूर्वक इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रीय रक्षा का विषय अब मौलिक रूप से सैन्य प्रतिष्ठानों की पारंपरिक सीमाओं से बहुत आगे निकल गया है।

आज, वैज्ञानिक नवाचार, प्रयोगशाला अनुसंधान और डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र राष्ट्रों की सुरक्षा, समृद्धि और दीर्घकालिक लचीलेपन का समर्थन करने वाले केंद्रीय, भार वहन करने वाले स्तंभ बन गए हैं। तकनीकी प्रगति राष्ट्रीय सुरक्षा के हर एक आयाम को आक्रामक रूप से बदल रही है—चाहे वह खुफिया जानकारी जुटाने और संसाधित करने का तरीका हो, सीमाओं की निगरानी कैसे की जाती है, या अदृश्य विरोधियों से महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को कैसे बचाया जाता है। यह अब कोई वैकल्पिक अपग्रेड या विलासिता नहीं है; वैज्ञानिक नवाचार अब रणनीतिक तैयारियों का एक अपरिहार्य, गैर-परक्राम्य घटक है।

मुख्य अंतर्दृष्टि (Key Insight)

आधुनिक संघर्ष तेजी से केवल शारीरिक बल के बजाय तकनीकी श्रेष्ठता द्वारा निर्धारित किए जा रहे हैं। वैश्विक स्तर पर हाल के सैन्य अभियानों ने स्पष्ट रूप से साबित कर दिया है कि निर्णायक बढ़त सैनिकों की संख्या में नहीं, बल्कि उन्नत तकनीकों में निहित है। विशेष रूप से अंतरिक्ष, तात्कालिक संचार, एआई-संचालित निगरानी, सटीक हमले प्रणाली और रणनीतिक डेटा-समर्थित निर्णय लेने के डोमेन में प्रभुत्व ही आधुनिक विवादों के विजेताओं को तय करता है।

युद्ध की इस बदलती प्रकृति के प्रति भारत की सक्रिय और बहुआयामी प्रतिक्रिया मजबूत और समझौता न करने वाली स्वदेशी तकनीकी क्षमताओं को विकसित करने की रही है। इस घरेलू ताकत ने न केवल देश की रक्षा तैयारियों को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाया है, बल्कि वैश्विक मंच पर इसकी स्थिति, लाभ और कूटनीतिक दबदबे को भी नाटकीय रूप से ऊंचा किया है।

युद्ध और राष्ट्रीय सुरक्षा का ऐतिहासिक संदर्भ

यह समझने के लिए कि आज की तकनीकी प्रगति कितनी महत्वपूर्ण है और हम इस मुकाम तक कैसे पहुंचे, हमें भारत के सैन्य इतिहास, युद्ध की बदलती प्रकृति और राष्ट्रीय सुरक्षा के क्रमिक विकास पर एक विस्तृत और गहरी नज़र डालनी होगी। इतिहास केवल अतीत का अध्ययन नहीं है, बल्कि यह भविष्य की रणनीतियों को आकार देने का सबसे प्रामाणिक माध्यम है।

प्राचीन और मध्यकालीन भारत: भौतिक बल और पारंपरिक युद्ध

प्राचीन और मध्यकालीन भारत में युद्ध मुख्य रूप से शारीरिक बल, पारंपरिक हथियारों, सैन्य व्यूह रचना और सेना के विशाल आकार पर निर्भर करते थे। मौर्य, गुप्त, चोल और बाद में मुगल साम्राज्यों के दौरान, युद्ध के मैदान में हाथियों, तेज़ दौड़ने वाले घोड़ों, रथों और पैदल सैनिकों की विशाल टुकड़ियों का उपयोग ही किसी साम्राज्य की अजेय शक्ति का पैमाना माना जाता था। उस दौर में सामरिक बढ़त मुख्य रूप से भौगोलिक स्थिति (जैसे पहाड़ी किले या नदियों के किनारे), सैनिकों की वीरता, और तलवारबाजी या तीरंदाजी के कौशल पर निर्भर करती थी।

मध्यकाल के अंत और मुगलों के आगमन के साथ, बारूद और तोपखाने का प्रवेश हुआ, जिसने युद्ध के परिदृश्य को बदलना शुरू किया। किलेबंदी और घेराबंदी की रणनीतियों में बदलाव आया, लेकिन फिर भी, युद्ध का मुख्य आधार मानव बल और आमने-सामने की लड़ाई ही रहा।

ब्रिटिश औपनिवेशिक काल: युद्ध का औद्योगिकीकरण

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और बाद में ब्रिटिश क्राउन के शासनकाल के दौरान, भारतीय उपमहाद्वीप ने युद्ध के औद्योगिकीकरण को देखा। अंग्रेजों ने व्यवस्थित, अनुशासित और आधुनिक हथियारों से लैस सेनाओं का निर्माण किया। उन्होंने रेलवे, टेलीग्राफ और बेहतर रसद (Logistics) नेटवर्क का उपयोग करके सैन्य नियंत्रण को सुदृढ़ किया। हालाँकि, इस काल में भारत को मुख्य रूप से एक ‘उपभोक्ता’ और सैनिकों के प्रदाता के रूप में रखा गया। रक्षा उत्पादन और तकनीकी अनुसंधान के मामले में भारत को जानबूझकर वंचित रखा गया ताकि वह पूरी तरह से ब्रिटिश साम्राज्य पर निर्भर रहे।

स्वतंत्रता के बाद का संघर्ष और आयात पर निर्भरता (1947 – 2014)

1947 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद, एक नवजात राष्ट्र के रूप में भारत के सामने अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने की एक बहुत बड़ी चुनौती थी। 1947-48, 1965, 1971 और 1999 (कारगिल) के युद्धों ने भारतीय सशस्त्र बलों के अदम्य साहस और रणनीतिक कौशल को साबित किया। लेकिन इन सभी संघर्षों में एक बड़ी कमजोरी स्पष्ट रूप से नज़र आई—हमारी विदेशी हथियारों पर अत्यधिक निर्भरता।

दशकों तक, हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा और सशस्त्र बलों का आधुनिकीकरण पूरी तरह से सोवियत संघ (अब रूस), पश्चिमी देशों और बाद में इज़राइल और अमेरिका से खरीदे गए सैन्य हार्डवेयर (विमान, टैंक, पनडुब्बियां और राइफलें) पर निर्भर था। रक्षा उत्पादन मुख्य रूप से सरकारी ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों और कुछ चुनिंदा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) तक ही सीमित रहता था। आयातित हथियारों के साथ सबसे बड़ा जोखिम यह था कि युद्ध या संकट के समय पुर्जों (Spare parts) की आपूर्ति रोकी जा सकती थी, या विक्रेता देश राजनीतिक दबाव डालकर हमारी विदेश नीति को प्रभावित कर सकते थे।

21वीं सदी का परिवर्तन: आत्मनिर्भरता और तकनीकी युद्ध की ओर कदम

21वीं सदी की शुरुआत के साथ ही वैश्विक सुरक्षा का परिदृश्य तेजी से, अप्रत्याशित रूप से और अत्यधिक जटिल रूप से बदलने लगा। यह स्पष्ट हो गया कि भविष्य के युद्ध केवल सीमाओं पर, जल, थल या वायु में नहीं लड़े जाएंगे। युद्ध का नया अखाड़ा अब अंतरिक्ष, साइबर स्पेस और सूचना नेटवर्क बन गया था।

केवल हथियारों का आयात करना अब एक सुरक्षित और स्थायी विकल्प नहीं रह गया था। आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी प्रकार की बाधा, या साइबर हमलों के माध्यम से संचार प्रणालियों को ठप्प कर देना, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक अस्तित्वगत खतरा बन सकता था। इन्ही अनुभवों से सीखते हुए, पिछले एक दशक (विशेषकर 2014 के बाद) में भारत ने अपनी रक्षा नीति में ‘आत्मनिर्भर भारत’ और स्वदेशी नवाचार को राष्ट्रीय सुरक्षा की सर्वोच्च नीतिगत प्राथमिकता बनाया।

एक दशक का स्मारकीय परिवर्तन: निर्भर आयातक से वैश्विक निर्यातक तक

शायद भारत की बदलती रक्षा स्थिति का सबसे स्पष्ट और निर्विवाद प्रमाण इसके विनिर्माण और अनुसंधान क्षेत्र के मात्रात्मक और गुणात्मक परिवर्तन में निहित है। दशकों तक, भारत दुनिया के सबसे बड़े रक्षा उपकरण आयातकों में से एक होने के रणनीतिक रूप से कमजोर गौरव को धारण करता था। पिछले दस वर्षों में, सावधानीपूर्वक नीतिगत बदलावों और रणनीतिक दृष्टि के माध्यम से, उस कथा को पूरी तरह से फिर से लिखा गया है।

भारत आयातित प्रणालियों पर भारी निर्भरता से अधिक आत्मनिर्भरता और घरेलू स्वदेशी नवाचार की ओर लगातार, उद्देश्यपूर्ण और आक्रामक रूप से आगे बढ़ा है। डॉ. सिंह ने अपने NDC संबोधन के दौरान कई आश्चर्यजनक मेट्रिक्स पर प्रकाश डाला जो भारतीय रक्षा के इस नए, सशक्त युग को स्पष्ट रूप से परिभाषित करते हैं:

  • अभूतपूर्व उत्पादन वृद्धि: 2014 के बाद से रक्षा उत्पादन में 174 प्रतिशत की आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है। जो कभी नौकरशाही लालफीताशाही से विवश एक सुस्त क्षेत्र था, वह अब आउटपुट का एक गतिशील इंजन बन गया है, जो लगभग ₹1.54 लाख करोड़ के प्रभावशाली कुल तक पहुंच गया है।
  • निर्यात बूम: हमेशा के लिए खरीदार होने की अपनी स्थिति को बदलते हुए, भारत एक आश्वस्त विक्रेता के रूप में उभरा है। रक्षा निर्यात में एक अभूतपूर्व विस्तार का अनुभव हुआ है, जो लगभग 34 गुना बढ़कर ₹23,000 करोड़ के चौंका देने वाले आंकड़े को पार कर गया है। भारत निर्मित रडार, मिसाइल प्रणाली (जैसे ब्रह्मोस), बख्तरबंद वाहन और एयरोस्पेस घटक अब दक्षिण पूर्व एशिया से लेकर मध्य पूर्व और अफ्रीका तक दुनिया भर में खरीदार ढूंढ रहे हैं।
  • निजी क्षेत्र के इंजन को खोलना: इस उल्लेखनीय परिवर्तन का एक प्रमुख, अपूरणीय चालक निजी उद्योग की मजबूत, उत्साही और बढ़ती भागीदारी रहा है। अब रक्षा निर्माण राज्य-संचालित उद्यमों का एकाधिकार नहीं है। निजी क्षेत्र अब भारत के कुल रक्षा निर्यात का एक अत्यधिक महत्वपूर्ण और तेजी से बढ़ता हुआ हिस्सा है।
  • MSME और डीप-टेक स्टार्टअप इकोसिस्टम: विस्तार कर रहा रक्षा निर्माण पारिस्थितिकी तंत्र जमीनी स्तर के नवाचार, निरंतर उद्यमशीलता और व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा उद्देश्यों के बीच शक्तिशाली और निर्बाध संरेखण का एक जीवंत प्रमाण है। वर्तमान में, 16,000 से अधिक MSMEs (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) और सैकड़ों अत्यधिक विशिष्ट, डीप-टेक स्टार्टअप रक्षा उत्पादन और अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी विकास में सक्रिय रूप से लगे हुए हैं।

भारत का रक्षा क्षेत्र इस बात का एक शक्तिशाली और निर्विवाद वास्तविक दुनिया का उदाहरण बनकर उभरा है कि कैसे रणनीतिक राष्ट्रीय आवश्यकताएं एक साथ औद्योगिक विकास, व्यापक स्तर पर तकनीकी उन्नति और मजबूत आर्थिक विस्तार के लिए बड़े और आकर्षक अवसर पैदा कर सकती हैं।

अभिसरण (Convergence): भविष्य के युद्ध के मैदान को परिभाषित करने वाली तकनीकें

आगे देखते हुए, संघर्ष की प्रकृति बदल रही है। डॉ. सिंह ने भविष्य के सुरक्षा परिदृश्य को तैयार करने वाली विशिष्ट और अत्यधिक उन्नत तकनीकों की सटीक पहचान की। आने वाले दशकों में केवल अलग-थलग प्रगति नहीं होगी; बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्वांटम तकनीक और जैव प्रौद्योगिकी का तेजी से और एकीकृत अभिसरण देखा जाएगा, जिसे उन्नत अंतरिक्ष-आधारित क्षमताओं द्वारा भारी समर्थन और प्रवर्धित किया जाएगा।

1. कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence): संज्ञानात्मक और एल्गोरिथम युद्धक्षेत्र

सैन्य बुनियादी ढांचे में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग का एकीकरण मौलिक और अपरिवर्तनीय रूप से बदल रहा है कि संघर्षों को कैसे प्रबंधित किया जाता है और जीता जाता है। भविष्य की सैन्य प्रणालियां तेजी से मानव-मात्र के संचालन से दूर होकर इन पर निर्भर होंगी:

  • स्वायत्त प्लेटफार्म: मानव रहित हवाई लड़ाकू ड्रोन (UAV), स्वायत्त पानी के नीचे के वाहन (UUV), और रोबोटिक ग्राउंड संतरी जो मानव जीवन को जोखिम में डाले बिना अत्यधिक जटिल और खतरनाक मिशन को अंजाम देने में सक्षम हैं।
  • बुद्धिमान निगरानी: ऐसी प्रणालियां जो केवल वीडियो स्ट्रीम रिकॉर्ड नहीं करती हैं, बल्कि व्यवहारिक पैटर्न का सक्रिय रूप से विश्लेषण करती हैं, विसंगतियों को ट्रैक करती हैं, और घटित होने से पहले ही दुश्मन की गतिविधियों की भविष्यवाणी करती हैं।
  • संज्ञानात्मक युद्ध क्षमताएं: बिग डेटा, डीप फेक और एल्गोरिथम हेरफेर का उपयोग करके विरोधी के निर्णय लेने को प्रभावित करना, दुश्मन के मनोबल को कम करना और घरेलू सूचना पारिस्थितिकी तंत्र को मनोवैज्ञानिक अभियानों से बचाना।
  • अति-तीव्र निर्णय लेना (Hyper-Fast Decision-Making): AI महत्वपूर्ण OODA लूप (ऑब्जर्व, ओरिएंट, डिसाइड, एक्ट) को काफी हद तक संकुचित कर देता है। AI सैन्य रसद और वास्तविक समय के खतरे के आकलन को पूरी तरह से बदल देगा।

2. क्वांटम प्रौद्योगिकी: अंतिम एन्क्रिप्शन और सेंसिंग फ्रंटियर

जैसे-जैसे शास्त्रीय कंप्यूटिंग शक्ति तेजी से बढ़ती है, पारंपरिक एन्क्रिप्शन विधियों को अप्रचलन का सामना करना पड़ता है। क्वांटम प्रौद्योगिकियां पूरी तरह से एक निश्चित प्रतिमान बदलाव का प्रतिनिधित्व करती हैं कि कैसे संवेदनशील, वर्गीकृत डेटा प्रसारित किया जाता है। डॉ. सिंह ने उल्लेख किया कि क्वांटम सेंसिंग, क्वांटम संचार और पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी में प्रगति दुनिया भर में रणनीतिक क्षमताओं को फिर से परिभाषित करने के लिए तैयार है।

  • राष्ट्रीय क्वांटम मिशन (2023): इस मिशन का भारत द्वारा सक्रिय और भारी वित्त पोषित लॉन्च एक दृढ़ संकल्प को दर्शाता है कि सुरक्षित संचार और उन्नत सुपरकंप्यूटिंग की अगली पीढ़ी को आकार देने वाले शीर्ष-स्तरीय देशों में बने रहना है।
  • अभेद्य बुनियादी ढांचे की सुरक्षा: क्वांटम-सुरक्षित नेटवर्क का तेजी से, देशव्यापी परिनियोजन महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संपत्तियों—पावर ग्रिड, बैंकिंग नेटवर्क और सैन्य कमान संरचनाओं—को परिष्कृत, राज्य-प्रायोजित साइबर-जासूसी से बचाने के लिए बिल्कुल आवश्यक होगा।

3. जैव प्रौद्योगिकी और सिंथेटिक बायोलॉजी: अदृश्य, सूक्ष्म खतरा

जबकि सुपरसोनिक गोलियां और हाइपरसोनिक मिसाइलें दृश्य और भयानक खतरे हैं, युद्ध के भविष्य में तेजी से सूक्ष्म और मूक खतरे शामिल हो रहे हैं। डॉ. सिंह ने दीर्घकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा योजना में जैव प्रौद्योगिकी और सिंथेटिक जीव विज्ञान के गंभीर रूप से बढ़ते महत्व पर प्रकाश डाला।

  • उभरती जैव सुरक्षा चुनौतियां: आनुवंशिक रूप से इंजीनियर रोगजनकों (engineered pathogens), हथियारबंद वायरस और अत्यधिक उन्नत जैविक खतरों की खतरनाक और अत्यधिक यथार्थवादी संभावना निरंतर वैज्ञानिक नवाचार और मजबूत चिकित्सा तैयारियों की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है।
  • जीनोमिक लचीलापन (Genomic Resilience): जैव प्रौद्योगिकी में निरंतर निवेश अप्रत्याशित भविष्य के स्वास्थ्य संकटों, गुप्त जैविक सुरक्षा जोखिमों के खिलाफ राष्ट्र के लचीलेपन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

4. उन्नत अंतरिक्ष क्षमताएं: अंतिम उच्च भूमि (Ultimate High Ground)

अंतरिक्ष अब केवल वैज्ञानिक अन्वेषण का एक सौम्य क्षेत्र नहीं है; यह सर्वोच्च सैन्य उच्च भूमि है। उन्नत अंतरिक्ष-आधारित क्षमताओं द्वारा समर्थित, भविष्य के युद्ध हाइपर-सटीक उपग्रह नेविगेशन (जैसे भारत का NavIC), वास्तविक समय उच्च-रिज़ॉल्यूशन कक्षीय निगरानी और सुरक्षित उपग्रह संचार पर निर्भर करेंगे जिन्हें विरोधियों द्वारा आसानी से जाम या इंटरसेप्ट नहीं किया जा सकता है।

भविष्य की सुरक्षा के लिए त्रि-आयामी (Three-Pronged) ढांचा

उभरते, अतिव्यापी खतरों के इस अविश्वसनीय रूप से जटिल मैट्रिक्स को सुरक्षित रूप से नेविगेट करने के लिए, भारत का भविष्य का सुरक्षा ढांचा केवल प्रतिक्रियाशील (reactive) होने का जोखिम नहीं उठा सकता है। डॉ. सिंह ने तीन व्यापक, महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया:

  1. भविष्य कहनेवाला और सक्रिय खतरा प्रबंधन (Predictive and Proactive Threat Management): प्रतिक्रिया देने के लिए हमले की प्रतीक्षा करने का युग समाप्त हो गया है। ध्यान आक्रामक रूप से AI, वैश्विक निगरानी नेटवर्क और क्वांटम सेंसिंग के उपयोग की ओर स्थानांतरित होना चाहिए ताकि भौतिक रूप से उत्पन्न होने से पहले ही खतरों को बेअसर किया जा सके।
  2. डिजिटल और साइबर सीमाओं की मजबूत सुरक्षा: एक परस्पर जुड़ी दुनिया में, डेटा केंद्र, पावर ग्रिड, वित्तीय नेटवर्क और संचार केंद्र भौतिक सीमाओं जितने ही महत्वपूर्ण हैं। इनकी रक्षा के लिए पूरी तरह से स्वायत्त प्रतिक्रिया प्रणाली और अत्यधिक उन्नत, लगातार विकसित होने वाले साइबर सुरक्षा तंत्र की आवश्यकता है।
  3. रणनीतिक प्रौद्योगिकियों और आपूर्ति श्रृंखलाओं में आत्मनिर्भरता: यह सुनिश्चित करना कि भारत की रक्षा प्रणालियों को शक्ति देने वाले महत्वपूर्ण घटक, दुर्लभ पृथ्वी खनिज (rare earth minerals), अर्धचालक (semiconductors) और सॉफ्टवेयर घरेलू स्तर पर निर्मित और नियंत्रित हों।

सार्वजनिक-निजी तालमेल (Public-Private Synergy) की शक्ति

डॉ. सिंह के संबोधन का एक केंद्रीय और भावुक विषय पारंपरिक नौकरशाही और संस्थागत बाधाओं को तोड़ने की पूर्ण और तत्काल आवश्यकता थी। उन्होंने सरकारी संस्थानों, चुस्त निजी उद्योग, शिक्षाविदों, विघटनकारी स्टार्टअप और विशेष अनुसंधान संगठनों के बीच गहरे, मजबूत और घर्षण रहित सहयोग का आह्वान किया।

सार्वजनिक-निजी भागीदारी (Public-Private Partnerships) अब केवल आर्थिक चर्चा के शब्द नहीं हैं; वे नवाचार को गति देने के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण जीवन रेखाएं हैं। वैज्ञानिक खोजों को विश्वविद्यालयों की प्रयोगशालाओं से युद्ध के मैदान के वास्तविक दुनिया के अनुप्रयोगों तक तेजी से और निर्बाध रूप से प्रवाहित होना चाहिए।

भारत की दीर्घकालिक भू-राजनीतिक ताकत और कूटनीतिक वजन एक मजबूत नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र (innovation ecosystem) के पोषण की इसकी क्षमता पर बहुत अधिक निर्भर करता है। इस पारिस्थितिकी तंत्र में, नागरिक वैज्ञानिक प्रगति और सैन्य आवश्यकताएं एक साथ, सहजीवी रूप से विकसित होनी चाहिए।

ऐतिहासिक पारंपरिक युद्ध बनाम वर्तमान तकनीकी रुझानों का तुलनात्मक विश्लेषण

डॉ. जितेंद्र सिंह द्वारा उल्लिखित प्रतिमान बदलाव के बड़े परिमाण को सही मायने में समझने के लिए, राष्ट्रीय सुरक्षा की ऐतिहासिक पद्धतियों की आधुनिक, बहुआयामी युद्धक्षेत्र को आकार देने वाले वर्तमान, धधकते तकनीकी रुझानों से कठोरता से तुलना करनी चाहिए।

डोमेन (Domain)ऐतिहासिक / पारंपरिक युद्ध (Historical Conventional)वर्तमान रुझान और भविष्य का प्रक्षेपवक्र (Current Trends)
संघर्ष का प्राथमिक क्षेत्रसख्ती से भौतिक डोमेन: भूमि, समुद्र और वायु। भू-राजनीति काफी हद तक पहाड़ों, नदियों और इलाके से तय होती थी।मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस जो भौतिक डोमेन के साथ-साथ एक साथ अंतरिक्ष, साइबर और संज्ञानात्मक/सूचना क्षेत्रों को शामिल करते हैं।
आपूर्ति श्रृंखला और रक्षा सोर्सिंगआयातित प्रणालियों पर भारी, कमजोर निर्भरता; अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों या आपूर्ति में व्यवधान के प्रति उच्च भेद्यता।‘आत्मनिर्भर भारत’ के लिए आक्रामक प्रयास; रक्षा उत्पादन में 174% की वृद्धि, निर्यात में 34 गुना वृद्धि; स्थानीय MSME और स्टार्टअप का बड़े पैमाने पर एकीकरण।
खुफिया और निगरानीमानव खुफिया (HUMINT), विलंबित फोटोग्राफिक टोही, और प्रतिक्रियाशील घटना-पश्चात सामरिक विश्लेषण।उन्नत उपग्रह नेटवर्क के माध्यम से वास्तविक समय, निरंतर निगरानी; AI-संचालित भविष्य कहनेवाला विश्लेषण (predictive analytics)।
निर्णय लेना (OODA लूप)पूरी तरह से मानव-केंद्रित; धीमी, खंडित संचार चैनल जिससे सामरिक प्रतिक्रियाओं में देरी होती है।अति-तीव्र, AI-सहायक निर्णय लेना; मिलीसेकंड में खतरों को कम करने वाली स्वायत्त प्रतिक्रिया प्रणाली।
क्रिप्टोग्राफी और सैन्य संचारमानक गणितीय एन्क्रिप्शन विधियाँ जो बढ़ती कंप्यूटिंग शक्ति के प्रति तेजी से कमजोर हो रही हैं।क्वांटम क्रिप्टोग्राफी और क्वांटम-सुरक्षित नेटवर्क में तेजी से संक्रमण, गणितीय और भौतिक रूप से अभेद्य संचार सुनिश्चित करना।
जैविक खतरे की स्थितिप्रतिक्रियाशील चिकित्सा प्रतिक्रियाएं ज्यादातर प्राकृतिक रूप से होने वाली बीमारियों, स्वच्छता और बुनियादी चिकित्सा पर केंद्रित थीं।सक्रिय जैव सुरक्षा; अत्यधिक इंजीनियर रोगजनकों का मुकाबला करने के लिए जैव प्रौद्योगिकी और सिंथेटिक बायोलॉजी का भारी लाभ उठाना।
सैनिक की भूमिकामुख्य रूप से शारीरिक शक्ति, सहनशक्ति और हथियारों के मैनुअल संचालन पर निर्भर।एक नेटवर्क सिस्टम में एक अत्यधिक एकीकृत नोड के रूप में संचालन; स्वायत्त प्लेटफार्मों का प्रबंधन और वास्तविक समय में डेटा फ़ीड की व्याख्या।

तुलनात्मक डेटा एक निर्विवाद वास्तविकता को प्रचुर मात्रा में स्पष्ट करता है: राष्ट्रीय सुरक्षा का भविष्य विशेष रूप से उन लोगों का है जो कल की तकनीक में महारत हासिल करते हैं, उसे नियंत्रित करते हैं और तैनात करते हैं। बड़े पैमाने पर स्वदेशी नवाचार की ओर भारत का रणनीतिक धुरी यह सुनिश्चित करता है कि राष्ट्र न केवल युद्ध के भविष्य के लिए निष्क्रिय रूप से तैयारी कर रहा है—यह सक्रिय रूप से इसे आकार दे रहा है।

सशस्त्र बलों के मौन बलिदान का सम्मान

जबकि रणनीतिक प्रवचन का गहन ध्यान जटिल एल्गोरिदम, अटूट क्वांटम कुंजी, स्वायत्त ड्रोन और सिंथेटिक जीव विज्ञान पर भारी बना रहा, रक्षा के गहरे मानवीय तत्व को सम्मानपूर्वक स्वीकार किया गया। भारत के सशस्त्र बलों के अथक योगदान के लिए गहरी, स्थायी प्रशंसा व्यक्त करते हुए, डॉ. सिंह ने कहा कि राष्ट्र हमेशा अपने सैनिकों का गहराई से ऋणी रहेगा।

उनकी स्मारकीय सेवा सक्रिय, हिंसक संघर्ष के समय देश की भौतिक क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने से कहीं आगे तक फैली हुई है। वे विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं, जटिल राष्ट्रीय आपात स्थितियों और बड़े पैमाने पर मानवीय संकटों के दौरान महत्वपूर्ण प्रथम प्रतिक्रियाकर्ता (first responders) हैं। सशस्त्र बलों के शांत, अथक और अक्सर पूरी तरह से अनदेखे योगदान राष्ट्रीय जीवन के ताने-बाने को बांधना, चंगा करना और मजबूत करना जारी रखते हैं, जो सेवा, बहादुरी और बलिदान की शुद्ध भावना के अंतिम, चमकते उदाहरण के रूप में कार्य करते हैं।

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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