गंगा बेसिन में शहरी कायाकल्प: नदियों के साथ जुड़ाव का नया संकल्प

कायाकल्प: अर्बन रिवर मैनेजमेंट प्लान (URMP) के जरिए बदलते गंगा किनारे के शहर

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नई दिल्ली: अयोध्या, कानपुर, ऋषिकेश, प्रयागराज और गया जैसे शहरों में नदियों को अब केवल ‘पानी के स्रोत’ के रूप में नहीं, बल्कि ‘शहर के हृदय’ के रूप में देखा जा रहा है। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (NMCG) और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स (NIUA) ने मिलकर 60 से अधिक गंगा बेसिन शहरों के लिए एक अनूठी योजना तैयार की है, जो पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और संस्कृति को जोड़कर भविष्य के शहरों की नींव रख रही है।

नदियों के प्रति एक नई सोच: कायाकल्प की शुरुआत

उत्तराखंड के गंगोत्री और ऋषिकेश से लेकर पश्चिम बंगाल के हावड़ा, आसनसोल और दुर्गापुर तक, भारत की नदियाँ हमेशा से हमारी सभ्यता की धुरी रही हैं। लेकिन बदलते समय और बढ़ते शहरीकरण के साथ, शहरों और नदियों के बीच की दूरी बढ़ गई थी। दिसंबर 2019 में कानपुर में आयोजित नेशनल गंगा काउंसिल की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक दूरदर्शी दृष्टिकोण साझा किया: “शहर-केंद्रित विकास से हटकर नदी-केंद्रित विकास की ओर बढ़ना।”

इसी विजन को धरातल पर उतारने के लिए ‘अर्बन रिवर मैनेजमेंट प्लान’ (URMP) की परिकल्पना की गई। यह केवल सफाई अभियान नहीं, बल्कि शहरों के नियोजन का एक नया तरीका है, जहाँ नदी शहर के विकास की योजना के केंद्र में होती है।

URMP क्या है और यह कैसे काम करता है?

URMP का ढांचा एक व्यापक 10-सूत्रीय एजेंडा पर आधारित है, जो तीन मुख्य स्तंभों — पर्यावरण, आर्थिक और सामाजिक — को साथ लेकर चलता है।

इस 10-सूत्रीय एजेंडा में शामिल हैं:

  • बाढ़ के मैदानों (Floodplains) का विनियमन।
  • प्रदूषण में कमी और अपशिष्ट जल का प्रबंधन।
  • वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) और जल निकायों का पुनरुद्धार।
  • किनारों पर बफर जोन का निर्माण।
  • उपचारित जल का पुन: उपयोग।
  • पारिस्थितिकी के अनुकूल रिवरफ्रंट विकास।
  • नदी संसाधनों का आर्थिक उपयोग।
  • नागरिक भागीदारी और सामुदायिक जुड़ाव।

पायलट प्रोजेक्ट्स से बड़े पैमाने पर विस्तार तक

शुरुआत में, NIUA और NMCG ने अयोध्या, कानपुर और छत्रपति संभाजी नगर जैसे शहरों में पायलट प्रोजेक्ट्स चलाए। इन परियोजनाओं ने साबित किया कि “एक ही तरीका सबके लिए” (one-size-fits-all) का मॉडल काम नहीं करता। हर शहर की अपनी सांस्कृतिक, पर्यावरणीय और आर्थिक पहचान होती है।

वर्तमान स्थिति (जून 2026):

नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत, हल्द्वानी-काठगोदाम, रामनगर, ऋषिकेश, गोरखपुर, शाहजहाँपुर, बिजनौर, प्रयागराज, मिर्जापुर, छपरा, बक्सर और गया जैसे 13 शहरों में URMP पूर्ण हो चुके हैं। चरण-I के तहत 27 शहरों और चरण-II के अंतर्गत 33 शहरों पर काम चल रहा है, जिससे गंगा बेसिन के कुल 60 शहर इस महत्वाकांक्षी पहल के दायरे में आ गए हैं। मार्च 2027 तक 12 और शहरों के लिए यह योजना पूरी होने की उम्मीद है।

तीन राज्यों की अनूठी कहानी: उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार

1. उत्तराखंड: हिमालयी शहरों की पारिस्थितिकी

ऋषिकेश, हल्द्वानी-काठगोदाम और रामनगर में योजनाएं नदी और शहर के बीच के पारिस्थितिक संबंधों को बहाल करने पर केंद्रित हैं। हल्द्वानी-काठगोदाम गौला नदी के साथ जुड़ाव बना रहा है, जबकि रामनगर में कोसी नदी को ‘कॉर्बेट इको-टूरिज्म कॉरिडोर’ के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहाँ एवियन पार्क और इको-स्पेस पर्यटन को बढ़ावा दे रहे हैं। ऋषिकेश में हिमालयी जैव-विविधता और आध्यात्मिक विरासत का संतुलन बनाया जा रहा है।

2. उत्तर प्रदेश: संस्कृति और बाढ़ से सुरक्षा

गोरखपुर में ‘स्पंज पार्क’ और बायो-स्वेल्स के जरिए बाढ़ नियंत्रण पर जोर है। शाहजहाँपुर में ‘मेरी नदी, मेरा शहर’ अभियान के तहत गर्रा और खनौत नदियों का कायाकल्प हो रहा है। बिजनौर में हैदरपुर वेटलैंड को केंद्र में रखकर काम हो रहा है। प्रयागराज में गंगा-यमुना के संगम को “लिविंग हेरिटेज कॉरिडोर” के रूप में विकसित किया जा रहा है।

3. बिहार: नदी-संस्कृति और लचीलापन

गया में फल्गु नदी की हाइड्रो-इकोलॉजी को पुनर्जीवित किया जा रहा है। बक्सर में गंगा किनारे इको-सेंसिटिव रिवरफ्रंट बन रहा है। छपरा में तेल नदी के कॉरिडोर और तालाबों के पुनरुद्धार से बाढ़ प्रबंधन और ‘ब्लू-ग्रीन’ नेटवर्क तैयार किया जा रहा है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और आधुनिक रुझान

ऐतिहासिक संदर्भ:

सदियों से, भारतीय शहर नदियों के किनारे ही बसे। वाराणसी, प्रयागराज और पटना जैसे शहरों के घाट, मंदिर और व्यापारिक केंद्र नदियों के इर्द-गिर्द पनपे। हालांकि, औद्योगिकीकरण के दौर में नदियों को केवल कचरा ढोने वाले माध्यम के रूप में देखा गया, जिससे हम अपनी ‘नदी संस्कृति’ से दूर हो गए।

तुलनात्मक विश्लेषण:

  • पुराना ट्रेंड: इंजीनियरिंग और कंक्रीट पर आधारित विकास, नदी को शहर से अलग करना।
  • नया ट्रेंड (URMP): प्रकृति-आधारित समाधान (जैसे- वेटलैंड्स, स्पंज सिटी), नागरिक स्वामित्व और आर्थिक मूल्यवर्धन (River-Centric Development)।

आज की शहरी नियोजन प्रणाली केवल नदी को ‘साफ’ नहीं कर रही, बल्कि उसे ‘जीवंत’ बना रही है। ‘रिवर सिटीज एलायंस’ (RCA) के जरिए कानपुर से लेकर हावड़ा तक के शहरों के बीच ज्ञान का आदान-प्रदान और विश्व बैंक के साथ मिलकर ‘परफॉर्मेंस बेस्ड इंसेंटिव ग्रांट’ का उपयोग करना इस नई कार्य-संस्कृति को मजबूती दे रहा है।

कायाकल्प: निष्कर्ष की ओर

कानपुर में COD ड्रेन का कायाकल्प और LAMAS तकनीक का उपयोग यह दिखाता है कि तकनीक और प्रकृति का साथ मिलकर काम करना संभव है। गंगा बेसिन से शुरू हुई यह पहल अब पूरे देश की अन्य नदियों के लिए एक राष्ट्रीय मॉडल बनने की राह पर है। नदियों को शहर के केंद्र में लाकर, हम न केवल पर्यावरण को बचा रहे हैं, बल्कि भविष्य के लचीले और टिकाऊ शहरों का निर्माण कर रहे हैं।

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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