नई दिल्ली: आर्थिक विकास और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाना 21वीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती है। अक्सर हम जीडीपी (GDP) के आंकड़ों में देश की तरक्की तो माप लेते हैं, लेकिन इस विकास की कीमत के रूप में हमने अपनी प्राकृतिक पूंजी (Natural Capital) का कितना क्षरण किया है, इसका लेखा-जोखा हमारे पास नहीं होता। इसी कमी को दूर करने के लिए भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने एक क्रांतिकारी कदम उठाया है। मंत्रालय ने “भारत में कोयले के मौद्रिक परिसंपत्ति खातों के संकलन के लिए कार्यप्रणालीगत दृष्टिकोण” पर एक विस्तृत चर्चा पत्र जारी किया है। यह दस्तावेज़ न केवल कोयले के आर्थिक मूल्य को समझने का प्रयास है, बल्कि यह देश की ‘ग्रीन अकाउंटिंग’ की दिशा में एक मील का पत्थर है।
इतिहास: जब से लेखांकन की नींव पड़ी
पर्यावरणीय लेखांकन का विचार कोई नया नहीं है, लेकिन इसकी गंभीरता हाल के वर्षों में वैश्विक स्तर पर बढ़ी है। वर्ष 2012 में संयुक्त राष्ट्र सांख्यिकी आयोग द्वारा ‘पर्यावरण-आर्थिक लेखांकन प्रणाली’ (SEEA – System of Environmental-Economic Accounting) को एक अंतरराष्ट्रीय सांख्यिकीय मानक के रूप में मान्यता दी गई थी।
भारत में, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय वर्ष 2018 से ही इस दिशा में सक्रिय है। मंत्रालय ‘एन्विस्टैट्स इंडिया’ (EnviStats India) और ‘एनर्जी स्टैटिस्टिक्स इंडिया’ के माध्यम से कोयले और अन्य खनिज संसाधनों के भौतिक परिसंपत्ति खातों का नियमित संकलन कर रहा है। हालांकि, भौतिक खातों में हमने मात्रा (टन या क्यूबिक मीटर) को तो दर्ज किया, लेकिन उनका मौद्रिक मूल्य (रुपये में) अभी भी एक अनछुआ पहलू था। अब, मंत्रालय ने इस भौतिक आंकड़े को वित्तीय भाषा में अनुवादित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
तुलनात्मक विश्लेषण: वैश्विक पद्धतियों का संगम
चर्चा पत्र का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह तीन अंतरराष्ट्रीय मॉडल हैं जिनका तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है। यह स्पष्ट करता है कि भारत केवल अपनी लकीर नहीं खींच रहा, बल्कि वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं से सीख रहा है:
- OECD पद्धति (2025): यह मॉडल SEEA केंद्रीय ढांचे और राष्ट्रीय लेखा प्रणाली के सबसे करीब है। इसमें भविष्य के ‘रिसोर्स रेंट’ (संसाधन किराया) का आकलन करने के लिए शुद्ध वर्तमान मूल्य (NPV – Net Present Value) का उपयोग किया जाता है।
- विश्व बैंक का ‘चेंजिंग वेल्थ ऑफ नेशंस’ (2024): यह पद्धति राष्ट्रों की कुल संपत्ति में प्राकृतिक संसाधनों के योगदान को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखती है।
- फिलीपींस पद्धति (2024): यह विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की विशिष्ट परिस्थितियों और डेटा की उपलब्धता को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।
वर्तमान रुझान और भारत का रुख: विश्लेषण के बाद, मंत्रालय ने ओईसीडी (2025) पद्धति को भारतीय संदर्भ के लिए सबसे उपयुक्त माना है। इसका मुख्य कारण यह है कि यह मॉडल भारत के वर्तमान सांख्यिकीय और डेटा ढांचे के साथ सहजता से एकीकृत हो सकता है। यह ‘सतत खनन’ की उस अनिवार्यता को पूरा करता है जिसे ‘राष्ट्रीय खनिज नीति 2019’ में रेखांकित किया गया था।
कोयला: क्यों चुना गया यह आधार?
भारत की ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़ कोयला है। 2024-25 के आंकड़ों पर नज़र डालें, तो 1,047.523 मिलियन टन कच्चे कोयले और 45.133 मिलियन टन लिग्नाइट का रिकॉर्ड उत्पादन यह बताने के लिए पर्याप्त है कि हमारी अर्थव्यवस्था इस पर कितनी निर्भर है। बिजली, इस्पात, सीमेंट और रसायन उद्योग—सब कोयले की धुरी पर घूमते हैं। जब हम कोयले के मौद्रिक मूल्य का आकलन करते हैं, तो हम वास्तव में देश की ऊर्जा सुरक्षा की वित्तीय कीमत को समझ रहे होते हैं। इससे हमें यह जानने में मदद मिलेगी कि संसाधन निष्कर्षण से सरकार को भविष्य में कितना राजस्व मिल सकता है और पर्यावरणीय क्षरण की लागत क्या है।
भविष्य की राह: सुझाव और नीति निर्माण
मंत्रालय ने इस चर्चा पत्र को अंतिम रूप देने से पहले विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और अंतरराष्ट्रीय संगठनों से सुझाव मांगे हैं। इस प्रक्रिया का उद्देश्य एक ऐसी मानकीकृत राष्ट्रीय पद्धति तैयार करना है जो पारदर्शी और सटीक हो।
जब हम प्राकृतिक संसाधनों को ‘परिसंपत्ति’ के रूप में देखना शुरू करते हैं, तो नीति निर्माण का नजरिया बदल जाता है। यह मात्र खनन की मात्रा बढ़ाने का विषय नहीं रह जाता, बल्कि यह सुनिश्चित करने का माध्यम बन जाता है कि हम अपनी प्राकृतिक पूंजी को संरक्षित करते हुए कैसे अधिकतम आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। यह भारत को वैश्विक प्राकृतिक पूंजी लेखांकन के मानचित्र पर एक अग्रणी शक्ति के रूप में स्थापित करेगा।



