अल नीनो की वापसी: प्रशांत महासागर की हलचल से बदल सकता है दुनिया का मौसम

एक शक्तिशाली मौसमी चक्र का आगमन: क्या 2026 में हम 1997 जैसे रिकॉर्ड-तोड़ प्रभाव की ओर बढ़ रहे हैं?

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प्रशांत महासागर: जून 2026 की शुरुआत के साथ ही, पृथ्वी के सबसे महत्वपूर्ण मौसमी घटनाक्रमों में से एक—’अल नीनो’ (El Niño)—ने आधिकारिक तौर पर वापसी कर दी है। नासा के ‘सेंटिनल-6 माइकल फ्रीलिच’ (Sentinel-6 Michael Freilich) उपग्रह से प्राप्त हालिया डेटा और एनओएए (NOAA) की पुष्टि से स्पष्ट है कि प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से कहीं अधिक बढ़ गया है। यह केवल समुद्र के गर्म होने का मामला नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी वैश्विक हलचल है जो आने वाले महीनों में दक्षिण-पश्चिम अमेरिका में भारी बारिश से लेकर इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में सूखे तक का कारण बन सकती है।

अल नीनो क्या है और क्यों मायने रखता है?

अल नीनो एक प्राकृतिक, चक्रीय मौसमी घटना है। सरल शब्दों में, जब मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से कम से कम 0.5 डिग्री सेल्सियस ऊपर चला जाता है और यह स्थिति कई महीनों तक बनी रहती है, तब हम इसे ‘अल नीनो’ घोषित करते हैं।

इस साल, 11 जून को एनओएए ने आधिकारिक रूप से इसके आगमन की घोषणा की। लेकिन वैज्ञानिक केवल सतही तापमान पर निर्भर नहीं हैं। नासा के जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी (JPL) के शोधकर्ताओं ने उपग्रह से प्राप्त ‘समुद्र की सतह की ऊंचाई’ (Sea Surface Height) के डेटा का उपयोग किया है, जो इस घटना की गंभीरता को समझने का सबसे सटीक पैमाना है।

ऊंचे समुद्र, गहरी गर्मी: उपग्रहों की नजर से

जब समुद्र का पानी गर्म होता है, तो वह भौतिक रूप से फैलता है (thermal expansion), जिससे समुद्र का स्तर ऊपर उठ जाता है। नासा का सेंटिनल-6 उपग्रह इसी ऊंचाइयों को मापता है। इस वर्ष जून के शुरुआती हफ्तों में ली गई तस्वीरों में प्रशांत महासागर के बड़े हिस्से ‘लाल’ दिखाई दिए, जो इस बात का संकेत है कि पानी की सतह सामान्य से काफी ऊंची है।

यह ऊँचाई केवल पानी का स्तर नहीं है; यह इस बात का प्रमाण है कि समुद्र की सतह के नीचे गर्मी का कितना विशाल भंडार जमा हो गया है। शोधकर्ता सेवराइन फर्नियर (Severine Fournier), जो इस मिशन की डिप्टी प्रोजेक्ट साइंटिस्ट हैं, बताती हैं कि यह उप-सतही गर्मी ही आने वाले मौसम को तय करती है। यदि गर्म पानी की केवल एक पतली परत हो, तो उसका प्रभाव कम होता है, लेकिन जब समुद्र के नीचे गर्मी का बड़ा ‘जलाशय’ जमा हो जाता है, तो यह वैश्विक जलवायु को हिला देने की क्षमता रखता है।

केल्विन तरंगें: अल नीनो का संदेशवाहक

इस साल वसंत ऋतु (Spring 2026) के दौरान, वैज्ञानिकों ने कुछ असामान्य देखा। पश्चिमी प्रशांत महासागर में चलने वाली व्यापारिक हवाएं (trade winds) कमजोर पड़ गईं और अस्थायी रूप से अपनी दिशा बदलकर पश्चिम की ओर बहने लगीं। इसके परिणामस्वरूप, गर्म पानी की विशाल लहरें—जिन्हें ‘केल्विन तरंगें’ (Kelvin waves) कहा जाता है—पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ने लगीं।

ये तरंगें समुद्र की सतह के नीचे की गर्मी को अपने साथ ले जाती हैं और प्रशांत महासागर के पूर्वी तटों (अमेरिका की ओर) तक पहुंचाती हैं। सामान्यतः, पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में ठंडे पानी का ‘अपवेलिंग’ (upwelling) होता है, जो वहां के पारिस्थितिकी तंत्र को ठंडा रखता है। लेकिन इन केल्विन तरंगों ने उस प्रक्रिया को दबा दिया है, जिससे पूर्वी प्रशांत का पानी गर्म होता जा रहा है।

क्या 2026 का अल नीनो 1997 जैसा होगा?

यह सवाल इस समय दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ी पहेली है। 1997 का साल एक ऐतिहासिक रूप से बहुत शक्तिशाली अल नीनो के लिए जाना जाता है, जिसने दुनिया भर के मौसम पर गहरा असर डाला था।

सेवराइन फर्नियर के अनुसार, जून 2026 में पश्चिमी प्रशांत महासागर की स्थितियां काफी हद तक 1997 के उन शुरुआती दिनों से मिलती-जुलती हैं। हालांकि, पूर्वी प्रशांत महासागर में अभी भी केल्विन तरंगों का जमाव 1997 की तुलना में थोड़ा कम है। वैज्ञानिक बारीकी से देख रहे हैं कि क्या अगले कुछ हफ्तों में और अधिक गर्म केल्विन तरंगें वहां पहुंचेंगी। यदि ऐसा होता है, तो यह अल नीनो साल के अंत तक एक ‘बड़ी मौसमी आपदा’ या बड़े बदलाव का रूप ले सकता है।

यह वैश्विक स्तर पर क्यों मायने रखता है?

अल नीनो केवल प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहता। इसके प्रभाव पूरी दुनिया में महसूस किए जाते हैं:

  1. दक्षिण-पश्चिम अमेरिका: यहाँ अक्सर सामान्य से अधिक वर्षा होती है, जिससे सूखे जैसी स्थितियों में सुधार तो आता है, लेकिन कभी-कभी बाढ़ का खतरा भी बढ़ जाता है।
  2. पश्चिमी प्रशांत (इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया): यहाँ अल नीनो का असर उल्टा होता है। आमतौर पर यहाँ सूखा पड़ता है, जिससे खेती और जल संसाधनों पर भारी संकट आ सकता है।
  3. वैश्विक तापमान: अल नीनो के दौरान अक्सर वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि दर्ज की जाती है, क्योंकि समुद्र की सतह से बहुत अधिक गर्मी वायुमंडल में उत्सर्जित होती है।

अल नीनो और भारतीय मानसून का रिश्ता

ऐतिहासिक रूप से, भारत और अल नीनो के बीच का संबंध अक्सर नकारात्मक रहा है। अल नीनो के दौरान, प्रशांत महासागर का गर्म होना वायुमंडलीय संचार (atmospheric circulation) को बदल देता है। इसके प्रभावस्वरूप:

  • वॉकर सर्कुलेशन में बदलाव: प्रशांत महासागर के गर्म होने से हवाओं का जो पैटर्न बनता है, वह अक्सर हिंद महासागर के ऊपर हवा के दबाव को प्रभावित करता है।
  • मानसून के ‘हॉटस्पॉट’ पर असर: अल नीनो भारतीय उपमहाद्वीप पर उच्च दबाव वाली स्थितियों को प्रेरित कर सकता है, जो भारत की ओर आने वाली नम हवाओं (मानसून की हवाओं) के प्रवाह को कमजोर कर देते हैं। इसी कारण से, अल नीनो के वर्षों में अक्सर भारत में ‘सूखे’ या ‘कम वर्षा’ का अनुभव किया गया है।

क्या 2026 में सूखे का खतरा है?

यद्यपि अल नीनो मानसून के लिए एक चुनौती है, लेकिन वैज्ञानिक इसे केवल ‘सूखे’ के समीकरण से नहीं देखते। इसका प्रभाव निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करता है:

  1. अल नीनो की तीव्रता: जैसा कि हमने पिछले भाग में देखा, 2026 का अल नीनो अभी ‘मजबूत’ हो रहा है। यदि यह 1997 जैसे स्तर पर पहुंचता है, तो भारतीय मानसून पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना काफी अधिक बढ़ जाती है।
  2. हिंद महासागर का द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole – IOD): यह सबसे महत्वपूर्ण ‘सेविंग ग्रेस’ (बचाव पक्ष) है। यदि हिंद महासागर में ‘सकारात्मक आईओडी’ (Positive IOD) की स्थिति बनती है—यानी पश्चिमी हिंद महासागर का तापमान पूर्वी हिस्से से अधिक गर्म होता है—तो यह अल नीनो के प्रतिकूल प्रभावों को काफी हद तक बेअसर कर सकता है। सकारात्मक आईओडी भारत की ओर मानसून की हवाओं को खींचने में मदद करता है।
  3. समय: जून में अल नीनो की सक्रियता मानसून के शुरुआती चरण को प्रभावित कर सकती है। यदि यह जुलाई-अगस्त तक अपनी चरम सीमा पर होता है, तो फसल चक्र (विशेषकर खरीफ की फसलें जैसे धान, सोयाबीन) पर दबाव बढ़ सकता है।

वर्तमान परिस्थितियों में, भारतीय मौसम विभाग (IMD) और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं स्थिति पर पैनी नजर रख रही हैं। भारत के लिए मानसून का गणित केवल प्रशांत महासागर के ‘अल नीनो’ पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह प्रशांत, हिंद महासागर और अटलांटिक महासागर की जटिल अंतःक्रियाओं का परिणाम है।

निष्कर्ष: निगरानी ही एकमात्र रास्ता

फिलहाल, नासा के वैज्ञानिक अपनी नजरें उपग्रहों पर टिकाए हुए हैं। 2026 का यह अल नीनो अभी भी ‘मजबूत’ हो रहा है। हम यह तो जानते हैं कि यह एक महत्वपूर्ण घटना है, लेकिन यह कितनी विनाशकारी या कितनी प्रभावशाली होगी, यह आने वाले हफ्तों में समुद्र की गतिविधियों पर निर्भर करेगा।

मौसम विज्ञान के नजरिए से, यह प्रकृति का एक ऐसा प्रदर्शन है जिसे हम रोक तो नहीं सकते, लेकिन उपग्रहों और डेटा की मदद से इसके लिए खुद को तैयार जरूर कर सकते हैं। जैसा कि फर्नियर कहती हैं, “यह अभी काफी बड़ा लग रहा है, लेकिन हमें आगे के आंकड़ों का इंतजार है।”

अगले कुछ महीने न केवल समुद्र के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी परीक्षा की घड़ी हैं, जहाँ समुद्र की गहराई में छिपी गर्मी आने वाले कल की जलवायु को परिभाषित करेगी।

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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