आधुनिक युद्धों के बदलते पैटर्न को देखते हुए भारतीय वायुसेना (IAF) ने लंबी दूरी के स्वदेशी ‘कामिकेज ड्रोन’ (वन-वे अटैक) विकसित करने के लिए एक मेगा प्रोजेक्ट शुरू किया है।
रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर ईरान-इजराइल के हालिया तनाव तक, आधुनिक संघर्षों ने पूरी दुनिया को एक बात साफ समझा दी है—भविष्य के युद्ध अब पारंपरिक हथियारों से ज्यादा ड्रोन और एंटी-ड्रोन तकनीक के दम पर लड़े और जीते जाएंगे। इसी रणनीतिक जरूरत को समझते हुए भारतीय वायुसेना (IAF) ने एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। भारत अब अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए किसी विदेशी तकनीक पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि देश में ही ‘कामिकेज ड्रोन’ का निर्माण करेगा।
क्या होते हैं कामिकेज ड्रोन ?
कामिकेज ड्रोन को तकनीकी भाषा में ‘लोइटरिंग म्यूनिशन’ (Loitering Munition) या आम भाषा में ‘आत्मघाती ड्रोन’ कहा जाता है।
- एकतरफा हमला (One-Way Attack): ये सामान्य ड्रोंस की तरह हमला करके वापस नहीं लौटते। ये एकतरफा (वन-वे) मानव रहित हवाई वाहन (UAV) होते हैं।
- ढूंढो और नष्ट करो: ये ड्रोन हवा में रहकर लक्ष्य क्षेत्र की रेकी करते हैं, दुश्मन के ठिकानों या वाहनों की पहचान करते हैं, और फिर खुद मिसाइल बनकर सीधे उनसे टकरा जाते हैं। टकराते ही इनमें लगा बारूद एक भीषण विस्फोट करता है, जिससे दुश्मन का बचना नामुमकिन हो जाता है।
सुलूर डिपो संभालेगा कमान, वायुसेना के पास रहेंगे अधिकार
इस महत्वपूर्ण परियोजना को जमीन पर उतारने के लिए भारतीय वायुसेना ने एक मजबूत ढांचा तैयार किया है:
- नोडल एजेंसी: तमिलनाडु के कोयंबटूर के पास स्थित 5 बेस रिपेयर डिपो (BRD), सुलूर को इस पूरी परियोजना के लिए नोडल एजेंसी बनाया गया है। यही डिपो भारतीय उद्योग और स्टार्टअप्स के साथ मिलकर इस प्रोजेक्ट को लीड करेगा।
- इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स (IPR): रक्षा मंत्रालय के फैसले के मुताबिक, इस ड्रोन प्लेटफॉर्म के बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) पूरी तरह भारतीय वायुसेना के पास सुरक्षित रहेंगे। इसका मतलब है कि भविष्य में किसी भी देश या बाहरी कंपनी पर निर्भर हुए बिना, वायुसेना अपनी जरूरत के हिसाब से इस तकनीक में तेज अपग्रेड, बदलाव और अनुकूलन (Customization) कर सकेगी।
- हर मौसम में मार: वायुसेना के अनुसार, ये लंबी दूरी के ड्रोन 16,000 फीट तक की ऊंचाई पर काम करने में सक्षम होंगे और दिन हो या रात, किसी भी समय दुश्मन पर काल बनकर टूट सकेंगे।
चीन पर निर्भरता होगी पूरी तरह खत्म: रक्षा मंत्री
पहले नेशनल डिफेंस इंडस्ट्रीज कॉन्क्लेव में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भारत को ड्रोन निर्माण में एक वैश्विक केंद्र (Global Hub) बनाने के लिए ‘मिशन मोड’ में काम करने की आवश्यकता पर जोर दिया था।
उन्होंने एक बेहद कड़वी और महत्वपूर्ण सच्चाई को सामने रखते हुए कहा था:
“आज भी दुनिया के कई बड़े देशों में ड्रोन के महत्वपूर्ण हिस्से (कंपोनेंट्स) चीन से आयात किए जाते हैं। लेकिन भारत को इस निर्भरता को तोड़ना होगा। हमारे देश में ड्रोन का निर्माण केवल अंतिम उत्पाद (Final Product) तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि ड्रोन के मोल्ड्स से लेकर उसके सॉफ्टवेयर, इंजन और बैटरी तक—सब कुछ भारत में ही बनना चाहिए।”
यह आसान काम नहीं है, लेकिन भारत अपने मजबूत इरादों के साथ इस दिशा में कदम बढ़ा चुका है।
‘रक्षा नवाचार’ का नया पावरहाउस: भारतीय स्टार्टअप्स और MSMEs
यह प्रोजेक्ट केवल वायुसेना को मजबूत नहीं कर रहा, बल्कि भारत के घरेलू रक्षा उद्योग को भी पंख दे रहा है। इनोवेशंस फॉर डिफेंस एक्सीलेंस (iDEX) पहल के तहत भारत के युवा इनोवेटर्स और एमएसएमई (MSMEs) देश को आत्मनिर्भर बना रहे हैं।
डिफेंस इकोसिस्टम के ये हालिया आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं:
| क्षेत्र | प्रगति के आंकड़े |
| जुड़े हुए स्टार्टअप्स और MSMEs | 676 से अधिक |
| हस्ताक्षरित कॉन्ट्रैक्ट्स | 548 अनुबंध |
| मंजूर किए गए प्रोटोटाइप | 58 (लागत लगभग ₹3,853 करोड़) |
| खरीद अनुबंध (Procurement Contracts) | 45 (लागत लगभग ₹2,326 करोड़) |
निष्कर्ष: रणनीतिक स्वतंत्रता की ओर बढ़ते कदम
यह कामिकेज ड्रोन परियोजना सिर्फ एक नया हथियार बनाने के बारे में नहीं है, बल्कि यह भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता (Strategic Autonomy) को सुनिश्चित करने के बारे में है। पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक, स्वदेशी सॉफ्टवेयर और स्थानीय सप्लाई चेन के दम पर तैयार होने वाला यह प्रोजेक्ट रक्षा के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर और अजेय बनाएगा।
अब दुश्मन को भारतीय सीमाओं की तरफ आंख उठाने से पहले सौ बार सोचना होगा, क्योंकि भारत के स्वदेशी ‘आत्मघाती शिकारी’ आसमान में चौबीसों घंटे पहरा देने के लिए तैयार हो रहे हैं।



