सुपर अल नीनो से प्रभावित होगी कृषि GDP, कम पानी वाली फसलों की खेती से किसानों की आय घटने की आशंका

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मजबूत अल नीनो और इनपुट लागत में बढ़ोतरी से ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दोहरी मार; विशेषज्ञों ने जताई सूखे और खुदरा महंगाई (CPI) के 6% तक पहुंचने की आशंका।

नई दिल्ली: देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र पर इस साल ‘सुपर अल नीनो’ का गंभीर संकट मंडरा रहा है। अर्थशास्त्रियों और कृषि विशेषज्ञों का अनुमान है कि अल नीनो को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच वित्त वर्ष 2026-27 में एग्रीकल्चर GDP या तो स्थिर (फ्लैट) रहेगी या फिर इसमें गिरावट दर्ज की जा सकती है। गिरते जलस्तर और सूखे के डर से देश भर के किसानों ने अपनी रणनीति बदलते हुए भारी नुकसान उठाने की कीमत पर कम पानी वाली फसलों का रुख करना शुरू कर दिया है।

किसानों के विकास दर शून्य या नेगेटिव होने की आशंका: अशोक गुलाटी

इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (ICRIER) के डिस्टिंग्विश्ड प्रोफेसर और कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) के पूर्व चेयरमैन अशोक गुलाटी ने इस स्थिति को लेकर कड़ी चेतावनी जारी की है।

किसानों

“बारिश कब, कहाँ और कितनी होती है, इस आधार पर इस साल एग्रीकल्चर-GDP ग्रोथ लगभग जीरो या नेगेटिव भी हो सकती है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने एक बेहद मजबूत अल नीनो का अनुमान लगाया है, जिससे मानसून की बारिश ‘लॉन्ग पीरियड एवरेज’ (LPA) का महज 90% रहने की संभावना है। खेती और उन किसानों के लिए जिनकी आजीविका पूरी तरह इस पर निर्भर है, यह साल काफी बुरा साबित होने वाला है।”— अशोक गुलाटी, पूर्व चेयरमैन, CACP

प्रो. गुलाटी ने चिंता जताई कि 2026 में देश को सूखे जैसे हालातों का सामना करना पड़ सकता है, जिससे न केवल किसानों की कमाई घटेगी, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ेगा। गौरतलब है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था देश में कंज्यूमर गुड्स (FMCG) की कुल बिक्री का 30-40% हिस्सा संभालती है।

कोर मानसून जोन किसानों पर में ‘मॉइस्चर स्ट्रेस’ का खतरा

  • फसलों पर संकट: किसानों की आय दोगुनी करने वाली समिति के पूर्व चेयरमैन और कर्नाटक एग्रीकल्चरल प्राइस कमीशन के मौजूदा अध्यक्ष अशोक दलवाई के मुताबिक, कोर मानसून जोन में केवल 94% बारिश का अनुमान है। इससे सोयाबीन, अरहर, उड़द और कपास जैसी मुख्य खरीफ फसलों में नमी की भारी कमी (मॉइस्चर स्ट्रेस) हो सकती है।
  • लंबा सूखा: उन्होंने कहा कि लंबे समय तक सूखा पड़ने से पैदावार और शुद्ध आय सीधे तौर पर प्रभावित होगी।
  • तिहरी मार (रबी और जायद पर असर): दलवाई ने आगाह किया कि यह सुपर अल नीनो जनवरी 2027 तक खिंच सकता है। इसका सीधा मतलब यह है कि मौजूदा खरीफ के साथ-साथ आगामी रबी (सर्दियों की फसल) और जायद (मार्च से जून के बीच होने वाली गर्मी की फसल) दोनों पर इसका बेहद बुरा असर पड़ेगा।

₹60000/टन के करीब डीजल और महंगी खाद: खेती की लागत हुई दोगुनी

एक तरफ आसमान से बारिश की उम्मीद कम है, वहीं दूसरी तरफ जमीन पर खेती की लागत रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है।

  1. ईंधन की महंगाई: ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल युद्ध के कारण वैश्विक सप्लाई चेन बाधित हुई है, जिससे ट्रैक्टरों और सिंचाई पंपों में इस्तेमाल होने वाले डीजल के दाम बढ़ गए हैं। जमीन तैयार करने से लेकर मशीनों के ऑपरेशनल खर्च में भारी इजाफा हुआ है।
  2. खाद का ‘ग्रे मार्केट’: देश के कई हिस्सों में बुवाई के ऐन वक्त पर खाद की किल्लत देखी जा रही है। किसान मजबूरी में ग्रे मार्केट (कालाबाजारी) से दोगुनी कीमतों पर खाद खरीदने को मजबूर हैं।

ग्राउंड रिपोर्ट : किसानों ने घटाया फसलों का रकबा

देश के विभिन्न राज्यों से आ रही खबरें बताती हैं कि किसान अब जोखिम लेने के मूड में नहीं हैं और उन्होंने अपनी बुवाई के पैटर्न में बड़ा बदलाव किया है:

महाराष्ट्र: गन्ने की खेती में 60% की कटौती

पश्चिमी महाराष्ट्र के भंडगांव के प्रगतिशील किसान राहुल पवार ने नहर का पानी न मिलने के डर से इस साल गन्ने की खेती का रकबा 60% तक कम कर दिया है। पवार ने बताया, “मेरी खेती सिंचाई के लिए पूरी तरह नहर पर निर्भर है। कम बारिश से जलाशय नहीं भरेंगे, इसलिए मैंने गन्ने की जगह कम समय और कम पानी में तैयार होने वाली बाजरा और सब्जियों को चुना है।” वहीं मराठवाड़ा (उस्मानाबाद) के किसान गणेश अदातराव को डर है कि खाद की कमी और कम बारिश से उनके सोयाबीन के उत्पादन में भारी गिरावट आएगी।

राजस्थान: धान और सोयाबीन से पीछे हटे किसान

किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट ने कहा कि राजस्थान में किसान धान और सोयाबीन जैसी ज्यादा कमाई और ज्यादा पानी वाली फसलों का रकबा घटाकर बाजरा, ज्वार और मूंग जैसी फसलों की योजना बना रहे हैं। उन्होंने कहा, “आज का किसान अल-नीनो को लेकर जागरूक है, इसलिए वह पहले की तरह घबराया हुआ नहीं है, लेकिन ग्रे मार्केट से महंगी खाद खरीदने और कम मुनाफे वाली फसलों की मजबूरी के कारण उसकी आमदनी का घटना तय है।”

खुदरा महंगाई (CPI) 6% छूने का अनुमान; सरकारी नीतियों से किसान असमंजस में

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि उत्पादन घटने से कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) आधारित महंगाई में बड़ा उछाल आएगा। दालों, तिलहन, कपास, मोटे अनाज और सब्जियों की कीमतें बढ़ने से खाद्य महंगाई बढ़ेगी, जिससे कुल CPI महंगाई अक्टूबर-नवंबर 2026 तक 6% के स्तर को छू सकती है।

फसल का नामसंभावित संकटबाजार पर असर
दालें (अरहर, उड़द)नमी की कमी से पैदावार प्रभावितकीमतों में भारी उछाल की आशंका
सोयाबीन व तिलहनकोर मानसून क्षेत्र में सूखे का खतराखाद्य तेलों की घरेलू उपलब्धता में कमी
कपास व मोटे अनाजरकबा और उत्पादकता दोनों में कमीग्रामीण आय और टेक्सटाइल इनपुट प्रभावित
गन्ना और धानपानी की कमी के कारण बुवाई क्षेत्र में कटौतीचीनी और चावल के उत्पादन पर दबाव

बाजार के नियमों पर सरकारी नियंत्रण: शेतकारी संगठन के प्रमुख नेता अनिल घनवट ने सरकार की मूल्य नियंत्रण नीतियों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा, “अब फसलों की कीमतें डिमांड और सप्लाई से तय नहीं हो रही हैं। उत्पादन घटने पर भी किसानों को ऊंची कीमतें मिलने की उम्मीद नहीं है, क्योंकि सरकार शहरी उपभोक्ताओं को राहत देने और खुदरा महंगाई को दबाने के लिए कीमतों को जबरन नियंत्रित करती है।”

आखिरी 20 दिन बेहद नाजुक:

खरीफ पैदावार पर नजर रखने वाली कंपनी AWL एग्री बिजनेस के एग्जीक्यूटिव वाइस चेयरमैन अंगशु मल्लिक ने कहा कि फसल कटाई से एक महीने पहले दाने बनने के आखिरी 20 दिन पैदावार के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। सितंबर के मानसून के दूसरे हिस्से में नमी की कमी से उत्पादन में बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।

संपादकीय टिप्पणी: विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि यदि सुपर अल नीनो के इस संकट से निपटना है और ग्रामीण मजदूरों की घटती मांग व कृषि आय को स्थिर रखना है, तो सरकार को समय रहते अग्रिम राहत पैकेज और वैकल्पिक सिंचाई योजनाओं की घोषणा करनी होगी।

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Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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