नई दिल्ली। कैराना से समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन ने लोकसभा में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ और परिसीमन को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला है। इस दौरान इकरा ने एक ऐसा ‘स्मार्ट मूव’ चला, जिससे वह अपनी ही पार्टी के दिग्गज नेताओं अखिलेश यादव और धर्मेंद्र यादव से एक कदम आगे निकलती दिखाई दीं।
मुस्लिम से ‘अल्पसंख्यक’ तक इकरा का बड़ा दांव
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और धर्मेंद्र यादव अब तक महिला आरक्षण के भीतर केवल मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग कोटा की मांग कर रहे थे, जिसे सरकार ने ‘असंवैधानिक’ बताकर खारिज कर दिया था। लेकिन इकरा हसन ने इस मांग को व्यापक रूप देते हुए सदन में कहा कि “देश की रिलिजियस माइनॉरिटीज (धार्मिक अल्पसंख्यकों) की महिलाओं को भी इसमें कोटा मिलना चाहिए।” इकरा का यह बयान राजनीतिक गलियारों में बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि उन्होंने केवल मुस्लिम ही नहीं बल्कि सभी अल्पसंख्यक समुदायों को इस दायरे में लाकर सरकार की घेराबंदी की है।
चुनावी खर्च और उप-आरक्षण पर सुझाव
इकरा हसन ने ओबीसी (OBC) और वंचित वर्ग की महिलाओं के लिए ‘सब-कोटा’ की वकालत की। उन्होंने एक अहम सुझाव देते हुए कहा कि गरीब और अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाओं की राजनीति में भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए सरकार को ‘स्टेट फंडिंग’ यानी चुनावी खर्च में सहयोग देना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि आरक्षण को परिसीमन और जनगणना की आड़ में छिपाना महिलाओं के साथ धोखा है।
समय सीमा पर सरकार को घेरा
सांसद ने सदन में कहा कि मुद्दा अब आरक्षण का नहीं बल्कि चुनावी फायदे का है। उन्होंने सरकार के विरोधाभासी बयानों पर तंज कसते हुए कहा कि पहले इसे 2034 के बाद लागू करने की बात कही गई थी और अब 2029 का दावा किया जा रहा है। इकरा के अनुसार जब यह विधेयक 2023 में ही सर्वसम्मति से पारित हो चुका था तो इसे तुरंत लागू करने के बजाय तकनीकी पेंचों में फंसाकर देरी की जा रही है।



