नई दिल्ली: आबकारी नीति मामले में सोमवार (13 अप्रैल 2026) को एक बेहद नाटकीय घटनाक्रम देखने को मिला। पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपने मामले की पैरवी खुद की और जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच के सामने तीखे सवाल उठाए। केजरीवाल ने मांग की कि जस्टिस शर्मा खुद को इस मामले से अलग कर लें, क्योंकि उन्हें इस बेंच से निष्पक्ष न्याय की उम्मीद नहीं है।
मुझे लगभग दोषी घोषित कर दिया गया
बहस के दौरान केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को संबोधित करते हुए कहा कि पिछली सुनवाई के दौरान कोर्ट की टिप्पणियां ऐसी थी, जैसे उन्हें भ्रष्ट और दोषी मान लिया गया हो, बस सजा सुनाना बाकी रह गया था।
केजरीवाल ने कहा, “9 मार्च को बिना दूसरे पक्ष को सुने सीबीआई की याचिका पर नोटिस जारी करना आपके पक्षपात को दिखाता है।”
उन्होंने दलील दी कि जब निचली अदालत ने 23 आरोपियों को बरी कर दिया है, तो हाई कोर्ट की पुरानी टिप्पणियां अब उनके मामले पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं।
ट्रायल कोर्ट बनाम हाई कोर्ट
अरविंद केजरीवाल ने 27 फरवरी 2026 के निचली अदालत के फैसले का हवाला देते हुए कहा:
ट्रायल कोर्ट ने तीन महीने की सुनवाई के बाद माना कि कोई रिश्वत नहीं ली गई और पूरी साजिश निराधार थी। केजरीवाल ने कहा कि जब निचली अदालत उनकी बेगुनाही पर मुहर लगा चुकी है, तो हाई कोर्ट की पिछली टिप्पणियां अब उनके लिए पूर्वाग्रह का कारण बन सकती हैं।
जब केजरीवाल ने कहा कि कोर्ट ने उन्हें लगभग भ्रष्ट घोषित कर दिया था, तो जस्टिस शर्मा ने टोकते हुए कहा, “यह बस आपकी सोच है, हम इस पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे।”
क्या है पूरा विवाद?
यह मामला सीबीआई की उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें केजरीवाल समेत 23 लोगों को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी गई है। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने इस पर नोटिस जारी किया था, जिसका केजरीवाल विरोध कर रहे हैं। केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अगर किसी पक्ष को जज की निष्पक्षता पर संदेह हो, तो जज को खुद को केस से अलग कर लेना चाहिए।
फिलहाल कोर्ट ने केजरीवाल की दलीलों को सुना है, लेकिन बेंच बदलने या सुनवाई से हटने पर अभी कोई अंतिम आदेश सार्वजनिक नहीं हुआ है।



