नई दिल्ली : अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के आर्टेमिस 2 मिशन से एक दिलचस्प खबर सामने आई है। मिशन की एस्ट्रोनॉट क्रिस्टीना हैमक कोच ने खुद को ‘स्पेस प्लंबर’ घोषित किया है।
नासा द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर साझा किए गए एक वीडियो में क्रिस्टीना ने गर्व से बताया कि उन्होंने स्पेसक्राफ्ट के टॉयलेट में आई तकनीकी खराबी को सफलतापूर्वक ठीक कर लिया है। उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा, “मैं ही स्पेस प्लंबर हूं और मुझे इस पर गर्व है।”
“I’m the space plumber, I’m proud to call myself the space plumber.”
— NASA (@NASA) April 3, 2026
Mission specialists like @Astro_Christina train for all roles so they can jump in wherever they’re needed. Sometimes that means fixing vital machinery, like the spacecraft toilet. pic.twitter.com/RGBWkwRgX7
‘प्राइमिंग’ की समस्या और सफल मरम्मत
चांद की यात्रा पर निकले चार एस्ट्रोनॉट्स वाले आर्टेमिस 2 मिशन के दौरान स्पेसक्राफ्ट के टॉयलेट ने अचानक काम करना बंद कर दिया था।
क्रिस्टीना कोच के अनुसार, शुरुआत में टीम को लगा कि मोटर में कुछ फंस गया है, लेकिन गहन जांच के बाद पता चला कि यह केवल ‘प्राइमिंग’ से जुड़ी एक छोटी सी तकनीकी दिक्कत थी। इस खराबी को दूर करने के बाद अब मिशन के सभी सदस्य राहत महसूस कर रहे हैं और अंतरिक्ष यान अपने निर्धारित मार्ग पर आगे बढ़ रहा है।
कैसे काम करता है अंतरिक्ष में टॉयलेट?
पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण की मदद से कचरा आसानी से नीचे गिर जाता है, लेकिन शून्य गुरुत्वाकर्षण वाले अंतरिक्ष में यह एक बड़ी चुनौती है।
नासा इसके लिए ‘यूनिवर्सल वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम’ का उपयोग करता है। यह सिस्टम हवा के तेज बहाव का उपयोग करता है। जैसे ही टॉयलेट का ढक्कन उठता है, हवा का सक्शन शुरू हो जाता है जो पेशाब और मल को शरीर से दूर खींचकर एक सुरक्षित कंटेनर में जमा कर देता है। इससे न केवल गंदगी फैलने से रुकती है, बल्कि केबिन में बदबू भी नहीं आती।
महिलाओं की जरूरतों के अनुसार खास डिजाइन
आर्टेमिस मिशन के लिए तैयार किया गया यह नया टॉयलेट सिस्टम पहले के मुकाबले 65 प्रतिशत छोटा और 40 प्रतिशत हल्का है। विशेष बात यह है कि इसका डिजाइन महिला एस्ट्रोनॉट्स के फीडबैक के आधार पर बनाया गया है। इसमें एक विशेष आकार का फनल और सीट का उपयोग किया गया है, जो कम गुरुत्वाकर्षण में शरीर से सटीक तरीके से सट जाता है।
नासा अंतरिक्ष में लगभग 90 प्रतिशत तरल पदार्थ (यूरिन और पसीना) को रीसायकल करके उसे फिर से इस्तेमाल योग्य बनाता है, जिससे लंबी दूरी के मिशनों में पानी की किल्लत नहीं होती।



