जंग में शायद ही कभी कोई साफ विजेता होता है। इसकी सबसे बड़ी कीमत अक्सर आम लोगों को चुकानी पड़ती है। लेकिन ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच बढ़ते संघर्ष ने दुनिया की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और वैश्विक सप्लाई चेन को हिला दिया है।
इस युद्ध का असर सिर्फ मध्यपूर्व तक सीमित नहीं है। तेल की कीमतों में तेज उछाल, समुद्री व्यापार में बाधा और वैश्विक महंगाई जैसे असर दुनिया के कई देशों में दिखाई दे रहे हैं। लेकिन इस संकट के बीच कुछ देशों को रणनीतिक और आर्थिक लाभ भी मिल सकता है।
रूस को कैसे मिल सकता है फायदा
इस संघर्ष से रूस को अप्रत्यक्ष रूप से कुछ फायदे मिल सकते हैं।
सबसे बड़ा फायदा तेल की बढ़ती कीमतों से हो सकता है। अगर होर्मुज स्ट्रेट में तनाव बढ़ता है और तेल सप्लाई प्रभावित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ जाती हैं।
रूस की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा तेल निर्यात पर निर्भर है। विशेषज्ञों के मुताबिक रूस का बजट लगभग 59 डॉलर प्रति बैरल तेल के हिसाब से बनाया गया था, लेकिन मौजूदा संकट के कारण कीमतें करीब 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।
इससे भारत और चीन जैसे बड़े खरीदारों को रूस से अधिक तेल खरीदने का मौका मिल सकता है।
इसके अलावा मध्यपूर्व में बढ़ते तनाव की वजह से अमेरिका के सैन्य संसाधन भी वहां ज्यादा तैनात हो सकते हैं, जिससे यूक्रेन युद्ध में रूस को कुछ रणनीतिक राहत मिल सकती है।
रूस को झटका भी
हालांकि रूस को पूरी तरह फायदा ही नहीं है।
ईरान रूस का एक अहम सैन्य और राजनीतिक सहयोगी रहा है। ऐसे में ईरान की आंतरिक अस्थिरता या उसके नेतृत्व को नुकसान रूस के लिए कूटनीतिक झटका हो सकता है।
चीन के लिए क्या असर
दूसरी तरफ चीन पर अभी तक इस युद्ध का बहुत बड़ा असर नहीं दिखा है।
चीन अपने कच्चे तेल का केवल लगभग 12 प्रतिशत ही ईरान से आयात करता है और उसने पहले से ही बड़े पैमाने पर तेल भंडार जमा कर रखे हैं। जरूरत पड़ने पर चीन रूस से भी तेल आयात बढ़ा सकता है।
लेकिन चीन की सबसे बड़ी चिंता उसकी निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था है। चीन की जीडीपी में निर्यात की हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत है।
अगर मध्यपूर्व और रेड सी क्षेत्र में समुद्री व्यापार बाधित होता है तो एशिया से यूरोप और अमेरिका तक सामान पहुंचाने में देरी और लागत दोनों बढ़ सकती हैं।
समुद्री व्यापार पर बड़ा खतरा
बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट और रेड सी जैसे अहम समुद्री मार्गों में भी खतरा बढ़ गया है।
अगर जहाजों को इन रास्तों से गुजरने में खतरा होता है तो उन्हें दक्षिण अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते लंबा चक्कर लगाना पड़ सकता है। इससे यात्रा में 10 से 14 दिन तक की अतिरिक्त देरी और लाखों डॉलर का अतिरिक्त खर्च हो सकता है।
चीन के लिए कूटनीतिक अवसर
हालांकि इस संकट के बीच चीन को एक कूटनीतिक अवसर भी मिल सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि शी जिनपिंग इस संकट के दौरान खुद को एक “जिम्मेदार वैश्विक नेता” के रूप में पेश करने की कोशिश कर सकते हैं और मध्यस्थ की भूमिका निभाने का प्रयास कर सकते हैं।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर ईरान युद्ध का असर केवल मध्यपूर्व तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव ऊर्जा बाजार, वैश्विक व्यापार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति तक फैल सकता है।
जहां रूस को तेल की ऊंची कीमतों से आर्थिक राहत मिल सकती है, वहीं चीन को कूटनीतिक अवसर मिल सकते हैं। लेकिन लंबे समय तक चलने वाला युद्ध पूरी दुनिया के लिए आर्थिक और मानवीय संकट भी बन सकता है।



