नई दिल्ली: एम्स दिल्ली चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक नया इतिहास रचने की दहलीज पर है। संस्थान ने Face Transplant की तकनीक में महारत हासिल करने के लिए हार्वर्ड के विशेषज्ञों के साथ हाथ मिलाया है। इस सर्जरी के सफल होने के बाद, उन मरीजों को नया जीवन मिल सकेगा जिनका चेहरा किसी दुर्घटना, एसिड हमले या जन्मजात विकृति के कारण गंभीर रूप से खराब हो गया है।
वर्कशॉप की मुख्य बातें: हार्वर्ड का साथ
एम्स के प्लास्टिक, रिकंस्ट्रक्टिव और बर्न्स सर्जरी विभाग ने एक विस्तृत वर्कशॉप आयोजित की, जिसमें:
प्रमुख विशेषज्ञ: हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के प्रोफेसर बोहदान पोमहाक ने एम्स के सर्जनों को प्रशिक्षित किया। डॉ. पोमहाक वही सर्जन हैं जिन्होंने अमेरिका में पहला पूर्ण फेस ट्रांसप्लांट किया था।

कैडेवरिक ट्रेनिंग: सर्जनों ने मानव शवों पर चेहरे की जटिल नसों, धमनियों और मांसपेशियों को जोड़ने का अभ्यास किया।
क्यों है यह सर्जरी इतनी जटिल?
चेहरा प्रत्यारोपण केवल त्वचा को बदलना नहीं है, बल्कि यह एक अत्यंत सूक्ष्म प्रक्रिया है जिसमें:
माइक्रोसर्जरी: चेहरे की अति-सूक्ष्म रक्त वाहिकाओं और तंत्रिकाओं को जोड़ना पड़ता है ताकि मरीज मुस्कुरा सके, पलकें झपका सके और संवेदनाएं महसूस कर सके।
इम्यूनो-सप्रेशन: मरीज का शरीर नए चेहरे को स्वीकार कर ले, इसके लिए जीवन भर दवाओं की आवश्यकता होती है।
मनोवैज्ञानिक प्रभाव: यह सर्जरी मरीज के मानसिक स्वास्थ्य और पहचान से भी जुड़ी होती है।
किन्हें मिलेगा इसका लाभ?
एसिड अटैक पीड़ित: जिनका चेहरा पूरी तरह झुलस चुका है।
गंभीर बर्न के मामले: जहां पारंपरिक प्लास्टिक सर्जरी सफल नहीं हो पाती।
ट्यूमर या दुर्घटना: चेहरे की हड्डियों और मांस के गंभीर नुकसान वाले मरीज।
भारत के लिए गर्व का विषय
वर्तमान में, दुनिया भर में बहुत कम केंद्रों पर फेस ट्रांसप्लांट की सुविधा उपलब्ध है। एम्स दिल्ली द्वारा इस क्षमता को विकसित करना भारत को वैश्विक चिकित्सा मानचित्र पर और भी ऊंचे स्थान पर ले जाएगा।



