नयी दिल्ली: गर्भावस्था के दौरान पोषण को अक्सर केवल “दो लोगों के लिए खाना” समझ लिया जाता है, लेकिन इसका असर कहीं अधिक गहरा और दीर्घकालिक होता है। फ्रांस की प्रसिद्ध बायोकेमिस्ट, न्यूयॉर्क टाइम्स बेस्टसेलिंग लेखिका और सोशल मीडिया पर ग्लूकोज़ गॉडेस के नाम से चर्चित जेसी इंशोस्पे ने गर्भावस्था में पोषण से जुड़े तीन आम मिथकों को खारिज करते हुए इसके बच्चे के आजीवन स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को रेखांकित किया है।
जेसी के अनुसार, गर्भवती महिला का खानपान न केवल शिशु के शारीरिक विकास बल्कि मस्तिष्क निर्माण, मेटाबॉलिज़्म और भविष्य में होने वाली बीमारियों के जोखिम तक को प्रभावित करता है। उनका कहना है कि गर्भावस्था के दौरान लिया गया आहार बच्चे के डीएनए प्रोग्रामिंग पर जीवनभर की छाप छोड़ता है।
पहला मिथक: मां का खानपान बच्चे के पोषण को प्रभावित नहीं करता
जेसी बताती हैं कि यह मानना गलत है कि बच्चा अपने आप सभी जरूरी पोषक तत्व मां से प्राप्त कर लेता है। कोलीन और डीएचए जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व, जो भ्रूण के मस्तिष्क विकास के लिए बेहद जरूरी हैं, यदि मां के आहार में पर्याप्त न हों तो शिशु को भी उनकी कमी हो सकती है। आंकड़ों के अनुसार, लगभग 90 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं पर्याप्त कोलीन और 70 प्रतिशत डीएचए नहीं ले पातीं।
दूसरा मिथक: प्लेसेंटा सभी हानिकारक तत्वों को रोक लेता है
उन्होंने स्पष्ट किया कि प्लेसेंटा कोई मजबूत ढाल नहीं है जो केवल अच्छे तत्वों को ही बच्चे तक पहुंचने दे। मां के रक्त में मौजूद अधिकांश तत्व, चाहे वे लाभकारी हों या हानिकारक, बच्चे तक पहुंचते हैं। इसलिए गर्भावस्था में खानपान और बाहरी तत्वों के प्रति सावधानी बेहद जरूरी है।
तीसरा मिथक: गर्भावस्था में जो मन करे खा सकते हैं
जेसी के अनुसार, वजन बढ़ना तय है, इसलिए कुछ भी खाने की छूट मान लेना एक गंभीर भूल है। अत्यधिक शर्करा और असंतुलित आहार बच्चे के डीएनए प्रोग्रामिंग को प्रभावित कर सकता है, जिससे भविष्य में टाइप-2 मधुमेह जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
उन्होंने जोर देते हुए कहा कि संतुलित और पोषक आहार न केवल गर्भावस्था को स्वस्थ बनाता है, बल्कि बच्चे को जीवनभर के लिए बेहतर स्वास्थ्य की मजबूत नींव भी देता है।



