नई दिल्ली: भारत की बदलती जलवायु न सिर्फ मौसमी उथल-पुथल ला रही है, बल्कि जंगलों और मैदानों में छिपे खतरों को भी नए रूप दे रही है। हालिया शोध से खुलासा हुआ है कि आने वाले सालों में गर्मी और बारिश के पैटर्न में बदलाव से जहरीले सांपों के रहने के इलाके पूरी तरह पलट सकते हैं। इससे न केवल पर्यावरण का संतुलन बिगड़ेगा, बल्कि लोगों और इन जीवों के बीच झड़पें भी ज्यादा होने की आशंका है। वैज्ञानिकों ने देशभर में फैली 30 तरह की विषैली सांप प्रजातियों का गहन अध्ययन किया, जो पहली बार इतने बड़े स्तर पर हुआ है।
हजारों रिकॉर्ड्स से निकला सच
शोधकर्ताओं ने सोशल मीडिया, रिसर्च पेपर्स और कम्युनिटी प्लेटफॉर्म्स से इकट्ठे किए गए हजारों डेटा पॉइंट्स का विश्लेषण किया। कुल 4,966 जानकारियों को छानकर 2,931 उपयोगी लोकेशन्स पर फोकस किया गया। इनके आधार पर हाई-टेक मॉडल्स तैयार हुए, जो बताते हैं कि 2050 से 2070 तक जलवायु के दो अलग-अलग सीनैरियो (आरसीपी 4.5 और 8.5) में सांपों के मुख्य इलाके कैसे शिफ्ट होंगे। इन मॉडल्स से पता चला कि सांपों के ‘हॉटस्पॉट’ यानी जहां वे सबसे ज्यादा पाए जाते हैं में भारी बदलाव आएगा।
कहां घटेंगे, कहां फैलेंगे सांप
नतीजे हैरान करने वाले हैं। 2070 तक देश के लगभग 3% हिस्से में ये हॉटस्पॉट पूरी तरह बदल सकते हैं। पश्चिमी घाट और पूर्वोत्तर के हरे-भरे इलाकों में सांपों की विविधता तेजी से कम हो सकती है। कर्नाटक, दक्षिणी महाराष्ट्र और पूर्वी हिस्सों में सबसे बड़ा नुकसान होगा। वहीं, मध्य भारत और उत्तरी पश्चिमी घाट में नए इलाके उभरेंगे, खासकर अगर जलवायु बदलाव की रफ्तार तेज रही। उत्तरी बंगाल और पूर्वोत्तर में सभी सीनैरियो में आवास घटेंगे, जो प्रजातियों के लिए बड़ा झटका है। लेकिन मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और विदर्भ जैसे क्षेत्रों में सांपों की संख्या बढ़ सकती है, जहां अभी वे कम हैं। ये निष्कर्ष ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ जर्नल में छपे हैं।
बिग फोर’ सांप: सबसे बड़ा जोखिम
खास ध्यान उन चार प्रजातियों पर है, जो भारत में सांप काटने की ज्यादातर घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं – कॉमन क्रेट, इंडियन कोबरा, रसेल्स वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर। शोध से साफ है कि जहां इनके रहने लायक जगहें बढ़ेंगी, वहां काटने की वारदातें भी ज्यादा होंगी। ये सांप इंसानी बस्तियों में आसानी से घुस जाते हैं, इसलिए ये सीधे स्वास्थ्य खतरा हैं। मॉडल्स में इनकी मौजूदगी और राज्य स्तर की घटनाओं के बीच मजबूत कनेक्शन मिला।
नए खतरे के इलाके: उत्तर से दक्षिण तक
उत्तर भारत, हिमालयी क्षेत्र, पूर्वोत्तर और दक्षिण के पहाड़ी इलाकों में इंसान-सांप टकराव सबसे ज्यादा बढ़ सकता है। ये वो जगहें हैं जहां तापमान और वर्षा में बदलाव तेज है, जो सांपों के लिए नई संभावनाएं खोल रहा है। सांप ठंडे खून वाले होते हैं, इसलिए गर्मी बढ़ने पर वे ठंडी जगहों की ओर जाएंगे। बारिश-सूखे के चक्र बदलने से वे अनजान इलाकों में फैल सकते हैं। कुछ प्रजातियां विलुप्त हो सकती हैं, तो कुछ की आबादी बढ़ेगी – दोनों ही मामलों में इंसानों पर असर पड़ेगा। भारत में सांप काटने से मौतों का आंकड़ा दुनिया में सबसे ऊंचा है, खासकर गांवों और गरीब इलाकों में।
हर साल 50 हजार मौतें, और बढ़ सकती हैं
आंकड़ों के मुताबिक, सालाना करीब 50 हजार लोग सांपों के जहर से मरते हैं, लेकिन असली संख्या इससे ज्यादा हो सकती है क्योंकि कई केस रिपोर्ट नहीं होते। शोधकर्ता चेताते हैं कि हमें दो तरफा तैयारी करनी होगी। एक, पर्यावरण संरक्षण की स्मार्ट प्लानिंग जो जलवायु को ध्यान में रखे। दो, स्वास्थ्य सिस्टम को मजबूत बनाना ताकि काटने की घटनाओं से मौतें कम हों। जंगलों की रक्षा, जागरूकता कैंपेन, बेहतर एंटी-वेनम सप्लाई और ग्रामीण इलाकों में मेडिकल सुविधाएं बढ़ाना जरूरी है। जलवायु बदलाव अब सिर्फ मौसम की बात नहीं, ये हमारे आसपास के जीवों और खुद हमारी सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है।



