नई दिल्ली: अब किसान को यह बताने के लिए सैटेलाइट ऊपर से देख रहा है कि उसकी फसल कितनी तैयार है, कितना उत्पादन होगा, सूखा पड़ने वाला है या नहीं। गेहूं, धान, बागवानी फसलों का पूरा नक्शा बनता है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में भी उपग्रह से ही उपज का अनुमान लगाया जाता है। महालनोबिस राष्ट्रीय फसल पूर्वानुमान केंद्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
बाढ़-चक्रवात आने से पहले अलर्ट
इनसैट-3डीआर और ईओएस-06 जैसे उपग्रह दिन-रात हिंद महासागर को देखते हैं। चक्रवात कहां बनेगा, कितना ताकतवर होगा, कब-कहां टकराएगा, यह सब पहले से पता चल जाता है। बाढ़ आने पर पानी कहां तक फैलेगा, उसका नक्शा तुरंत राज्य सरकारों को भेज दिया जाता है। हिमालय की खतरनाक ग्लेशियल झीलें फटने का खतरा भी इसरो लगातार जांचता रहता है।
जंगल की आग पर पैनी नजर
हर साल गर्मियों में जंगल की आग लगती है। इसरो दिन में 6-8 बार उपग्रह से तस्वीरें लेता है और जहां आग लगी है, उसकी सटीक लोकेशन वन विभाग और राज्य सरकारों को तुरंत भेज देता है। बड़े आग लगने पर प्रभावित इलाके का पूरा नक्शा भी तैयार होता है।
शहरों का मास्टर प्लान भी अंतरिक्ष से
अब नए शहरों या पुराने शहरों का नया मास्टर प्लान बनाने में भी अंतरिक्ष तस्वीरों का इस्तेमाल हो रहा है। अमरुत योजना के तहत ऊंची क्वालिटी की सैटेलाइट तस्वीरों से सड़क, पानी, बिजली, पार्क सबकी सही प्लानिंग हो रही है।
निजी कंपनियां भी मैदान में
सरकार ने इन-स्पेस बनाया है जो निजी कंपनियों को पैसा और तकनीक दे रही है। स्टार्टअप्स को 60% तक और बड़ी कंपनियों को 40% तक फंड मिल रहा है। स्काईरूट, अग्निकुल रॉकेट बना रही हैं तो अनंत टेक्नोलॉजीज अपना कम्युनिकेशन सैटेलाइट बना रही है। अब प्राइवेट सेक्टर भी खेती, मौसम, आपदा और शहरों के लिए अंतरिक्ष ऐप बना रहा है।
गांव-गांव तक जागरूकता पहुंचाई
इन-स्पेस ने पूरे देश में 9 बड़ी कार्यशालाएं की, जिसमें पूर्वोत्तर, कृषि, रक्षा, आपदा सब पर। राज्य सरकारों के अधिकारियों को ट्रेनिंग दी जा रही है कि अंतरिक्ष डेटा को अपने काम में कैसे इस्तेमाल करें। राष्ट्रीय अंतरिक्ष सम्मेलन 2.0 में भी मंत्रालयों और राज्यों को जोड़ा गया। अब अंतरिक्ष तकनीक सिर्फ वैज्ञानिकों की नहीं, किसान, शहर प्लानर, आपदा प्रबंधक और आम नागरिक की जरूरत बन गई है। 2033 तक भारत दुनिया की टॉप-3 अंतरिक्ष अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की राह पर तेजी से चल पड़ा है।



