‘एक विशेष वर्ग का वर्चस्व, मुसलमानों को अपमानित करने का कृत्य स्वीकार्य नहीं’

भोपाल में जमीअत उलमा-ए-हिंद प्रबंधन कमेटी की महत्वपूर्ण सभा में धर्मांतरण कानून, लव जिहाद, इस्लामोफोबिया, वक्फ अधिनियम, फिलिस्तीन और समान नागरिक संहिता पर महत्वपूर्ण प्रस्तावों को मंजूरी। जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि एक विशेष वर्ग का वर्चस्व और मुसलमानों को अपमानित करने का कृत्य स्वीकार्य नहीं।

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नई दिल्ली : जमीअत उलेमा-ए-हिंद की प्रबंधन कमेटी की सभा बरकतुल्लाह एजुकेशन कैंपस, भोपाल में जमीअत अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी की अध्यक्षता में शुरू हुई, जिसमें वक्फ संशोधन अधिनियम, इस्लामोफोबिया, कथित लव जिहाद, मदरसों की सुरक्षा, इस्लामी माहौल में आधुनिक शिक्षा, समान नागरिक संहिता और फिलिस्तीन में जारी नरसंहार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर स्पष्ट रुख प्रस्तुत किया गया। देश की वर्तमान परिस्थितियां काफी संवेदनशील और चिंताजनक हैं। यह कहना बेहद दुखद है कि एक वर्ग विशेष का वर्चस्व स्थापित करने और मुसलमानों को अपमानित करने का कृत्य स्वीकार्य नहीं। अल्पसंख्यकों को कानूनी रूप से मजबूर, सामाजिक रूप से अलग-थलग करने और आर्थिक रूप से अपमानित और वंचित करने के लिए आर्थिक बहिष्कार, बुलडोजर कार्रवाई, मॉब लिंचिंग, मुस्लिम वक्फ संपत्तियों में तोड़फोड़ और धार्मिक मदरसों और इस्लामी प्रतीकों के खिलाफ नकारात्मक अभियान चलाकर नियमित और संगठित प्रयास किए जा रहे हैं।

मौलाना मदनी ने धर्मांतरण कानून को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि हमारे देश का संविधान हमें अपने धर्म का पालन करने और उसका प्रचार करने की अनुमति देता है। लेकिन इस कानून में संशोधन करके इस मौलिक अधिकार को खत्म किया जा रहा है। इस कानून का इस्तेमाल इस तरह किया जा रहा है कि धर्म का प्रचार करना अपराध और सज़ा योग्य बन जाए। वहीं दूसरी ओर, ‘घर वापसी’ के नाम पर हिंदू धर्म अपनाने वालों को खुली छूट है। उनसे न तो कोई सवाल किया जाता है और न ही कोई कानूनी कार्रवाई की जाती है। ऐसा लगता है कि समाज को एक खास धार्मिक दिशा की ओर धकेला जा रहा है।

इस्लाम विरोधी तत्वों ने जिहाद को गाली और हिंसा का पर्याय बना दिया

मौलाना मदनी ने “लव जिहाद” जैसी मनगढ़ंत अवधारणा पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि इस्लाम विरोधी तत्वों ने जिहाद जैसे पवित्र धार्मिक शब्द को गाली और हिंसा का पर्याय बना दिया है और लव जिहाद, ज़मीन जिहाद, शिक्षा जिहाद, थूक जिहाद जैसे जुमलों से मुसलमानों को बदनाम किया जा रहा है और उनके धर्म का अपमान किया जा रहा है। दुर्भाग्य से, कुछ सरकारी और मीडिया कमी भी ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करने से बाज नहीं आते। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस्लाम में जिहाद एक पवित्र कर्तव्य है, जिसका उद्देश्य प्रताड़ना का अंत, मानवता की रक्षा और शांति स्थापित करना है, और यहां तक कि उत्पीड़न और अराजकता को रोकने के लिए युद्ध भी जायज़ है। लेकिन यह हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि जिहाद कोई व्यक्तिगत या निजी पहल नहीं है, बल्कि केवल एक सशक्त और संगठित राज्य ही शरीआ के सिद्धांतों के अनुसार इस पर निर्णय ले सकता है। भारत एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश है जहां इस्लामी राज्य की अवधारणा मौजूद नहीं है, इसलिए यहां जिहाद के नाम पर कोई बहस ही नहीं। मुसलमान संवैधानिक रूप से बाध्य हैं और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार ज़िम्मेदार है। मौलाना मदनी ने स्पष्ट किया कि इस्लाम के अनुसार, “जिहाद-ए-अकबर” मनुष्य के भीतर की बुराई, लालच, लोभ, क्रोध और आत्म-विद्रोह से लड़ने का नाम है, जो हर युग का सबसे बड़ा संघर्ष है।

मुगल काल में गुरु साहिब के युवा पुत्रों की हत्या क्रूरता और अन्याय पर आधारित थी

मौलाना मदनी ने गुरु तेग बहादुर के 350वें शहीदी दिवस के अवसर पर एकजुटता व्यक्त करते हुए कहा कि मुगल काल में गुरु साहिब के युवा पुत्रों की हत्या क्रूरता और अन्याय पर आधारित थी। यह त्रासदी किसी भी तरह से हमारे सामूहिक नैतिक मूल्यों और न्याय के सिद्धांतों से मेल नहीं खाती। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि मुगल सरकार को इस्लामी सरकार कहना ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत है। मुगल काल में जो युद्ध हुए, वह धार्मिक आधार पर नहीं, बल्कि अधिकतर राजनीतिक सत्ता से संबंधित थे। उन्होंने जहां गैर-मुस्लिमों, सिखों और विभिन्न स्थानीय शक्तियों के साथ युद्ध लड़े, वहीं मुस्लिम शासकों के साथ भी भीषण युद्ध लड़े और उन्हें दंडित किया। मौलाना मदनी ने इस अवसर पर न्यायपालिका की भूमिका पर भी सवाल उठाया और कहा कि सुप्रीम कोर्ट तभी तक सुप्रीम कोर्ट कहलाने का हकदार है, जब तक वह संविधान का पालन करता है और कानून के अधिकारों का ध्यान रखता है, अगर वह ऐसा नहीं करता, तो नैतिक रूप से सुप्रीम कहलाने का हकदार नहीं है।

मौलाना मदनी ने युवाओं के बारे में कहा कि युवा किसी भी राष्ट्र की रीढ़ होते हैं, इसलिए उनकी सोच और व्यवहार ही राष्ट्र के भविष्य की दिशा तय करते हैं। अगर हमें सचमुच अपने लिए एक मज़बूत भविष्य का निर्माण करना है, तो युवाओं को व्यक्तिवाद के दायरे से निकालकर सामूहिकता और टीम वर्क के दायरे में लाना होगा।

इस अवसर पर दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम और हदीस के शेख मौलाना मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी ने तजकिया नफ्स (आत्म शुद्धि) पर संबोधित करते हुए कहा कि हमारा मुख्य लक्ष्य धर्म है। हम अपनी पीढ़ियों की रक्षा और धर्म की रक्षा के लिए जमीअत से जुड़े हैं और किसी भी कार्य की सफलता ईमानदारी पर निर्भर करती है, जबकि ईमानदारी का आधार नीयत की शुद्धता पर है। इसीलिए कहा जाता है कि सूफीवाद की शुरुआत “इन्नामा अल-आमाल बिन्नियात” से होती है और इसकी परिणति यह है कि बंदा खुद को अल्लाह, सर्वशक्तिमान के सामने समर्पित कर दे, और उसकी इबादत में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जैसे वह अपने रब को देख रहा हो, या कम से कम यह एहसास बना रहे कि अल्लाह उसे देख रहा है।

ईमान सबसे बड़ी नेमत है, इसकी रक्षा के लिए त्याग दिया जा सकता है

जमीअत उलमा-ए-हिंद के उपाध्यक्ष और दारुल उलूम देवबंद के प्रोफेसर मौलाना मोहम्मद सलमान बिजनौरी ने कहा कि ईमान सबसे बड़ी नेमत है और इसकी रक्षा के लिए हर त्याग दिया जा सकता है। इसी उद्देश्य से इस्लामी माहौल वाले स्कूलों की स्थापना अपरिहार्य हो गई है, अन्यथा हमारी पीढ़ियां बौद्धिक और धार्मिक भटकाव का शिकार हो सकती हैं। उन्होंने मदरसों पर लग रहे आरोपों को निराधार बताया और विरोधियों को खुद मदरसों का दौरा करने का न्योता दिया, क्योंकि यह संस्थान खुली किताब की तरह पारदर्शी हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय मुसलमान कभी भी देश विरोधी तत्वों के साथ नहीं रहे हैं और न ही कभी रहेंगे। अंत में उन्होंने कहा कि हम अपने धर्म की शिक्षाओं के अनुसार इस देश से प्यार करते हैं और एक व्यक्ति जितना अच्छा मुसलमान होगा, उतना ही वह अपनी मातृभूमि से प्यार करेगा।

इनके अलावा दारुल उलूम देवबंद के प्रोफेसर मौलाना मुफ्ती मोहम्मद सलमान मंसूरपुरी ने धार्मिक शिक्षा के महत्व पर विस्तृत भाषण दिया। जमीअत उलमा कर्नाटक के अध्यक्ष मुफ्ती इफ्तिखार कासमी, दरारुल उलूम देवबंद के प्रोफेसर मौलाना अब्दुल्ला मारूफी, मौलाना अमीनुल हक महासचिव जमीअत उलमा यूपी, जमीअत उलमा तेलंगाना के उपाध्यक्ष मौलाना अब्दुलक़वी, मुफ्ती अशफाक काजी मुंबई, मौलाना नदीम सिद्दीकी महाराष्ट्र, मौलाना साजिद फलाही, मुफ्ती अब्दुल रज्जाक अमरोहवी, मौलाना याह्या करीमी, मौलाना जैनुल आबिदीन कर्नाटक, मौलाना मुफ्ती सलीम साकरस ने भी विभिन्न विषयों पर संबोधन दिया। मौलाना नियाज अहमद फारूकी ने सालाना बजट पेश किया।

पहले सत्र में जमीअत उलमा उत्तर प्रदेश के उपाध्यक्ष प्रोफेसर सैयद नोमान शाहजहांपुरी ने इस्लामी मदरसों के संरक्षण और इस्लामी वातावरण में आधुनिक स्कूलों की स्थापना, जमीअत उलमा पश्चिम उ.प्र. के अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद अकील कासमी ने देश में बढ़ती नफरत और इस्लामोफोबिया को रोकने, जमीअत उलमा कर्नाटक के महासचिव मौलाना मुफ्ती शम्सुद्दीन बिजली ने लव जिहाद की अवधारणा, जमीअत उलमा बिहार के अध्यक्ष मुफ्ती जावेद इकबाल कासमी ने फिलिस्तीन की चिंताजनक स्थिति, जमीअत उलमा केरल के अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद इब्राहिम ने समान नागरिक संहिता, मौलाना अब्दुल कादिर ने असम और एसआर की स्थिति और जमीअत उलमा मध्य प्रदेश के अध्यक्ष हाजी मोहम्मद हारून ने वक्फ अधिनियम से संबंधित प्रस्ताव पेश किए।

इससे पूर्व, मौलाना सिद्दीकुल्लाह चौधरी ने अध्यक्षीय प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जिसका समर्थन मुफ़्ती अहमद देवला (जमीअत उलेमा गुजरात के अध्यक्ष), मौलाना अली हसन मज़ाहरी (जमीअत उलमा संयुक्त पंजाब के अध्यक्ष) और काज़ी अब्दुल माजिद (जमीअत उलमा आंध्र प्रदेश के अध्यक्ष) ने किया। जमीअत उलेमा मध्य प्रदेश के अध्यक्ष हाजी मोहम्मद हारून ने स्वागत भाषण दिया। जमीअत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने सचिव रिपोर्ट और तीन वर्ष के क्रिय-कलापों का सारांश प्रस्तुत किया। उन्होंने एक शोक प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया।

आज की सभा में तीन राज्यों जमीअत उलमा पश्चिमी उत्तर प्रदेश जोन, जमीअत उलेमा असम और जमीअत उलमा नागालैंड को उनके अच्छे प्रदर्शन के आधार पर प्रोत्साहन स्वरूप शेख-उल-हिंद पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसी प्रकार सदस्यता अभियान, इकाई गठन, समाज सुधार और धार्मिक शिक्षाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन के आधार पर, ग्यारह जिलों, बिजनौर (उप्र), मुर्शिदाबाद (पश्चिम बंगाल), हरिद्वार (उत्तराखंड), हैलाकंदी (असम), किशनगंज (बिहार), सिपाही जाला (त्रिपुरा), बैंगलोर (कर्नाटक), होजाई, दीमापुर (असम), जहानाबाद (बिहार) और सीतापुर और मऊ (उप्र) को शेख-उल-इस्लाम पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

प्रबंधन कमेटी में मौलाना मोहम्मद सलमान बिजनौरी (दारुल उलूम देवबंद के शिक्षक) और कारी मुहम्मद अमीन पोकन को जमीअत उलेमा हिंद के दो उपाध्यक्ष के रूप में चुना गया, जबकि कारी मोहम्मद शौकत अली वेट को कोषाध्यक्ष चुना गया। बैठक में मौलाना मोहम्मद यासीन जहाजी द्वारा संकलित पुस्तक “जमीअत उलमा-ए-हिंद की तारीख: तजावीज और फैसले” के चौथे खंड का लोकार्पण जमीअत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष और अन्य सम्मानित सदस्यों द्वारा किया गया। इसी तरह, दीनी तालीमी बोर्ड के ऐप का भी जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष द्वारा उद्घाटन किया गया, जिसका संक्षिप्त परिचय मौलाना मोहम्मद उमर बैंगलोरी ने प्रस्तुत किया। सभा में शायर-ए-इस्लाम कारी एहसान मोहसिन ने नात-ए-पाक पेश की, जबकि जमीअत का तराना मौलाना अमीनुल हक अब्दुल्ला ने प्रस्तुत किया। इस सभा की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह रही कि इसमें एक विशेष प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित किया गया, जिसमें मौलाना महमूद असद मदनी, मौलाना मोहम्मद सलमान बिजनौरी और मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने प्रश्नों के उत्तर दिए। सभा के संचालन का दायित्व मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी और मौलाना मुफ्ती मोहम्मद अफ्फान मंसूरपुरी ने संयुक्त रूप से निभाया। दूसरा सत्र देर रात तक जारी रहेगा।

Sanjay Rai

sanjayrai.dj@gmail.com

संजय राय ने बीते 25 साल के प्रोफेशनल कैरियर में स्वास्थ्य, अपराध, शिक्षा, विकास समेत सभी बीट की कवरेज की है। दिल्ली सरकार, विधानसभा की कार्यवाही, भाजपा, कांग्रेस, आप सरीखे राजनीतिक दलों के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक व आंदोलनात्मक गतिविधियों को भी कवर किया है। कई सत्रों में संसद की कार्यवाही पर भी कलम चलाई है। फिलवक्त NewG India में बतौर सीनियर स्पेशल काॅरेस्पोंडेंट अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

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