नई दिल्ली: जलवायु संकट से जूझती दुनिया में संयुक्त राष्ट्र के COP सम्मेलन हर साल उम्मीद की किरण बनते हैं। लेकिन एक ताजा रिसर्च ने इन सम्मेलनों के चेहरे पर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या ये पर्यावरण के हितैषी सचमुच उतने ही ‘ग्रीन’ हैं जितना दिखते हैं? एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का एक अध्ययन, जो प्लोस क्लाइमेट जर्नल में छपा है, खुलासा करता है कि COP की वेबसाइटें खुद एक बड़ा डिजिटल प्रदूषक बन चुकी हैं। 1995 से 2024 तक इन साइट्स के कार्बन उत्सर्जन में 13,000 गुना से ज्यादा की छलांग लगी है। सोचिए, जहां ग्लोबल वार्मिंग रोकने की बहस होती है, वहां की डिजिटल दुनिया खुद ग्रीनहाउस गैसें उगल रही है!
रिसर्च की झलक: पुरानी वेबसाइटों से निकली सच्चाई
टीम ने वेब आर्काइव्स-जिन्हें इंटरनेट का ‘टाइम मशीन’ कह सकते हैं का सहारा लिया। इनमें पुरानी वेबसाइटों के स्नैपशॉट्स संभालकर रखे जाते हैं। 30 साल के डेटा का विश्लेषण करके उन्होंने पाया कि शुरुआती दौर में COP साइट्स सादा-सादी थीं। 1995 से 2008 (COP-14) तक एक पेज लोड करने पर महज 0.02 ग्राम CO2 निकलता था, जैसे एक छोटी चाय की चुस्की जितना। लेकिन 2009 (COP-15) के बाद कहानी बदल गई। फैंसी डिजाइन, वीडियो और ग्राफिक्स ने साइट्स को भारी-भरकम बना दिया। 2024 के COP-29 की साइट पर तो हर पेज से 2.4 ग्राम CO2 एक आम वेबपेज के सात गुना।
आंकड़ों की मार: छोटे से बड़ा संकट
1997 के COP-3 में वेबसाइट ट्रैफिक से कुल 0.14 किलो CO2 बिका था, जो दो दिन में एक पेड़ सोख ले। लेकिन COP-29 में यह संख्या 116.85 किलो तक पहुंच गई, यानी 10 पेड़ों को एक साल लगेगा इसे निगलने में। 27 सालों में 83,000% की ग्रोथ! यह सिर्फ नंबर्स नहीं, बल्कि एक विडंबना है, पर्यावरण बचाओ वाली चर्चा खुद जंगल काट रही है।
क्या है वजह? डिजिटल दुनिया के काले राज,रिसर्चर्स ने कई गिनाईं वजहें
मीडिया का बोलबाला: वीडियो, एनिमेशन, हाई-क्वालिटी फोटोज ने डेटा लोड को आसमान छू लिया।
टेक का जाल: मॉडर्न फ्रेमवर्क्स साइट्स को चमकदार बनाते हैं, लेकिन बैकएंड में एनर्जी की भूख बढ़ाते हैं।
सर्वर की भूख: ज्यादातर साइट्स को अभी भी कोयला-बेस्ड बिजली पर चलने वाले सर्वर्स पावर देते हैं।
ट्रैफिक का तूफान: लाखों विजिटर्स एक साथ—COP की पॉपुलैरिटी ने डेटा ट्रांसफर को एक्सप्लोड कर दिया।
इंटरनेट कुल ग्लोबल CO2 का 3% हिस्सा है, और COP साइट्स इसका मिसाल पेश कर रही हैं।
रास्ता निकालें: हल्की वेबसाइट, भारी बदलाव
वैज्ञानिकों ने प्रैक्टिकल टिप्स दिए हैं, जो हर वेबमास्टर अपना सकता है:
लाइट रखें: फालतू इमेज, वीडियो काटें, सिर्फ जरूरी रखें।
ऑप्टिमाइजेशन का जादू: कोड क्लीन रखें ताकि पेज फटाक से लोड हो।
ग्रीन होस्टिंग: सोलर या विंड एनर्जी वाले सर्वर्स चुनें।
ट्रैकिंग टूल्स: डिजिटल फुटप्रिंट चेक करने वाले ऐप्स यूज करें।
कॉप30 के एजेंडा में और क्या है
बेलेम सम्मेलन में देशों द्वारा पेश की जाने वाली राष्ट्रीय जलवायु कार्रवाई योजनाओं पर भी नजर रहेगी, जिनके जरिए बताया जाता है कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती के लिए क्या उपाय अपनाए जाएंगे। तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए, 2030 तक, वैश्विक उत्सर्जनों में 60 प्रतिशत की कमी आवश्यक है, मगर अब तक पेश की गई योजनाओं में केवल 10 फ़ीसदी कटौती होने का ही अनुमान है।
पेरिस जलवायु समझौते में 196 पक्ष हैं, लेकिन केवल 64 ने ही सितम्बर महीने के अन्त तक अपने जलवायु संकल्पों को पेश किया था. जून 2025 में, जर्मनी में कॉप सम्मेलन की तैयारियों के सिलसिले में होने वाली वार्ता के दौरान चेतावनी दी गई थी कि इस खाई को पाटने के लिए बेलेम सम्मेलन में ठोस प्रयास किए जाने होंगे।
कॉप30 सम्मेलन ऐसे 100 वैश्विक संकेतकों को स्वीकृति मिलने की सम्भावना है, जिनसे जलवायु अनुकूलन के मुद्दे पर प्रगति का आकलन किया जा सकेगा और देशों की तुलना की जा सकेगी। वैश्विक तापमान में हो रही वृद्दि की वजह से, जलवायु अनुकूलन अब कार्रवाई का एक अहम स्तम्भ है। बदलती जलवायु के दुष्प्रभावों से निपटने के लिए यह ज़रूरी है कि हालात के अनुरूप ढलने और सहनसक्षमता विकसित करने के प्रयास किए जाएं। यूएन पर्यावरण कार्यक्रम ने जोर देकर कहा है कि विकासशील देशों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अनुकूलन धनराशि में, 2035 तक, 12 गुना वृद्धि होने की आवश्यकता है।



