छत्तीसगढ़। तेलंगाना और छत्तीसगढ़ में आतंक का पर्याय बना हिडमा एक ऐसा नाम है, जिसकी दहशत पूरे दंडकारण्य वन समिति अर्थात बस्तर संभाग व तेलंगाना और महाराष्ट्र के बार्डर तक थी। कहा जाता है कि बस्तर में उसके नाम से पत्ते भी कांपते थे। वह अपने अंतिम दिनों में खुद पुलिस और केंद्रीय फोर्स से कांपता हुआ भग रहा था। वह कई बीमारियों से ग्रसित था। अपना इलाज करवाना चाहता था। उसकी मां भी अपील कर चुकी थी, “बेटा बाहर आ जा। सामान्य जिंदगी जी। सरकार तुम्हारी रक्षा करेगी।” लेकिन वह बाहर आता, अपना इलाज कराता, इससे पहले ही वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया और मंगलवार को गोलियों का शिकार हो गया।
इस बीच आंध्र प्रदेश की सिविल लिबर्टीज कमेटी ने इस मुठभेड़ को फर्जी करार दिया है। उसने दावा किया है कि पिछले महीने की 28 तारीख से हिड़मा और उसके साथी आंध्र प्रदेश के एक गुप्त ठिकाने में रह रहे थे। आंध्र प्रदेश पुलिस ने उन्हें वहां से हिरासत में लिया। इसके बाद पुलिस इन निहत्थे लोगों को मारेडुमिल्ली के जंगलों में ले गई और हत्या कर दी। सभी फन में माहिर हिड़मा के बारे में यह विश्वास किया जा सकता है कि उसकी अंतिम सांस चलने तक उसके पास जाने में बड़े-बड़े धुरंधरों की रूह कांप जाएगी।
हालांकि, वह चाहे जैसे मारा गया हो, यह तो तय हो गया कि अब बस्तर में लोग सुकून से सांस ले सकेंगे। माओवादियों के इस बयान की सत्यता चाहे जो हो, लेकिन इतना तो तय है कि हिड़मा कभी इतना कम संख्या के साथ नहीं रहा। वह जब भी चलता था, उसके साथ 150 से ज्यादा हार्डकोर माओवादी आधुनिक हथियारों से लैस रहते थे। इस समय बीमारी और छुपने के लिहाज से ही वह इतने कम माओवादियों के साथ रहा होगा।
कक्षा छह तक पढ़ाई फिर भी अंग्रेजी बोल व समझ लेता था हिड़मा
यह भी बता दें कि हिड़मा कक्षा छह तक पढ़ाई करने के बावजूद गोंडवी और हल्बी भाषा का अच्छा जानकार था। कक्षा छह के बाद उसकी पढ़ाई जनताना सरकार के स्कूल में ही हुई थी। इसके साथ ही संगठन में रहते हुए तेलगु कैडर्स से अंग्रेजी बोलना और समझना भी सीख लिया था। हर वक्त कुछ नया करने और सीखने में अपने दिमाग को खपाने वाले हिड़मा काफी तेज-तर्रार था। सुकमा जिले के पूवर्ती गांव के रहने वाले हिड़मा के बारे में कहा जाता है कि वह उसको माओवादी बनाने में उस समय की वर्तमान परिस्थितियां ज्यादा जिम्मेदार थीं।
तेज-तर्रार बच्चे देख जबरदस्ती उठा ले जाते थे माओवादी
1980 से 90 तक माओवादी आते, घरों में तेज-तर्रार बच्चे देखते और उसे माओवादी की ट्रेनिंग देने के लिए उठा ले जाते। परिवार का कोई सदस्य उनके खिलाफ मुंह खोलने की हिम्मत नहीं करता। यदि वह बच्चे को रोकने का प्रयास करते तो फिर उन्हें माओवादी गोलियों से भून देते। नन्हीं उम्र में ही बच्चों को जनताना सरकार के स्कूलों में ट्रेनिंग और पढ़ाई शुरु कर दी जाती थी। उसी तरह से हिड़मा को भी माओवादी उसके परिवार के न चाहते हुए भी उठा ले गये थे। इसके बाद फिर वह पीछे मुड़कर नहीं देखा। माओवादियों द्वारा उसे ले जाने के बाद नक्सल संगठन “बाल संघम” में शामिल किया गया।
बाल संघम
माओवादियों का मानना है कि बच्चों को छोटी उम्र में ही यदि माओवादी ट्रेनिंग दिया जाए, तो वे आजीवन माओवादी विचारधारा का त्याग नहीं कर सकते। इसी के साथ ही वे बाल संघम के माध्यम से माओवादी बनाये गये बच्चों को पुलिस व सुरक्षा जवानों के सामने अपनी ढाल के रूप में भी प्रयोग करते रहते थे। “बाल संघम” को “बाल दस्ता” या “बाल मंच” जैसे नाम से भी जाना जाता है। इसमें आमतौर पर 6 से 12 साल की उम्र के बच्चों को अक्सर जबरन या धमकियों के माध्यम से भर्ती किया जाता था, लेकिन एक दशक से यह भर्तियां नहीं हो पा रही हैं।
बाल संघम का उद्देश्य
इस संघम का उद्देश्य बच्चों को माओवादी विचारधारा की ट्रेनिंग देना, सूचना इकट्ठा करने (मुखबिर के रूप में), सामान ढोने, और पहरेदारी (संतरी) जैसे गैर-लड़ाकू कार्यों के लिए इस्तेमाल करना इसका मुख्य उद्देश्य होता रहा है। माओवादी यह मानते रहे हैं कि ये बच्चे ही आगे चलकर माओवादी विचारधारा को आगे बढ़ाएंगे। बच्चों को लाठियों से लड़ना सिखाया जाता है और बाद में, उनकी क्षमताओं के आधार पर, उन्हें जन मिलिशिया या सशस्त्र दस्तों में पदोन्नत किया जा सकता है, जहां उन्हें हथियारों और विस्फोटकों का प्रशिक्षण दिया जाता है।
बाल संघम से निकला हिड़मा पहुंचा केन्द्रीय कमेटी तक
उसी बाल संघम से निकला हिड़मा इसका एक उदाहरण है, जो नक्सली कमांडर के साथ ही माओवादी संगठन के केंद्रीय कमेटी तक पहुंचा। वह 1991 में सिर्फ 10 साल की उम्र में “बाल संघम” कैडर के रूप में ही संगठन में शामिल हुआ था। वह इतना खूंखार था कि एक बार वह दो दर्जन से ज्यादा लोगों को जिंदा जला दिया था। 300 से अधिक हत्याओं का आरोपी हिड़मा जिस भी अभियान पर निकला, कभी भी असफल नहीं रहा।
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2017 में 13 साल की बच्ची ने किया था खुलासा
नवम्बर 2017 में बस्तर रेंज के आईजी विवेकानंद सिन्हा ने माओवादियों के खिलाफ उस समय चलाए जा रहे ‘ऑपरेशन प्रहार-2’ के दौरान नारायणपुर जिले में माओवादी गतिविधियों में लिप्त एक 13 साल की बच्ची को पकड़ा था। वह बच्ची मुठभेड़ के दौरान माओवादियों के लिए संतरी की ड्यूटी कर रही थी, जिस समय पुलिस ने उसे पकड़ा, वह काफी डरी-सहमी हुई थी। मुठभेड़ खत्म होने के बाद बच्ची को बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) सेंटर में भेजा गया था। बच्ची ने बताया था गांव के स्कूल में पांचवीं तक पढ़ाई करने के बाद परिवार वालों के कहने पर ओरछा आश्रम में रहकर पढ़ाई कर रही थी। एक दिन जब पिता की तबीयत खराब हुई तो वह अपने गांव पिता को देखने पहुंची। उस दौरान गांव में पहुंचे माओवादी बच्ची को उसके पिता के सामने जबर्दस्ती अपने साथ ले गए।



