नई दिल्ली: सोमवार की शाम लाल किले के पास हुए कार धमाके ने 10 लोगों की जान ले ली। घायलों की संख्या 25 के आसपास बताई जा रही है। इस धमाके ने 14 साल बाद दिल्ली के अमन में खलल डाला है। इससे पहले 2008 में राजधानी बम धमाकों की गवाह बनी थी। भारत की राजधानी न केवल सत्ता का केंद्र है, बल्कि देश की सुरक्षा और शांति का प्रतीक भी मानी जाती है लेकिन पिछले चार दशकों में यह शहर कई बार आतंक की आग में झुलसा है। यहां हुए धमाके सिर्फ जान-माल का नुकसान नहीं थे, बल्कि देश की सुरक्षा व्यवस्था, खुफिया तंत्र और लोगों के भरोसे को झकझोर देने वाले साबित हुए।
सीएम रेखा गुप्ता ने घायलों शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की
इस बीच दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता देर रात एलएनजेपी अस्पताल जाकर हादसे में घायल नागरिकों से मुलाकात की, उनकी स्थिति की जानकारी ली और उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की। साथ ही अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि घायलों के उपचार में किसी भी प्रकार की कमी न रहे और सभी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं तुरंत और पूरी तत्परता के साथ उपलब्ध कराई जाएं। सीएम ने कहा लाल किले के पास हुई कार विस्फोट की घटना अत्यंत पीड़ादायक और चिंताजनक है। इस दुखद हादसे में जिन लोगों ने अपने प्रियजनों को खोया है, उनके प्रति मैं अपनी गहरी संवेदनाएँ व्यक्त करती हूँ। ईश्वर से प्रार्थना है कि घायल शीघ्र स्वस्थ हों। प्रभावित लोगों की हर संभव सहायता सुनिश्चित की जा रही है। दिल्ली पुलिस, एनएसजी, एनआईए और एफएसएल की टीमें मिलकर पूरे मामले की गहन जाँच में जुटी हैं। उन्होंने दिल्लीवासियों से निवेदन है कि अफवाहों से बचें और शांति बनाए रखें। कृपया केवल पुलिस एवं प्रशासन द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी पर ही विश्वास करें।
दिल्ली के ऐतिहासिक बाजार, स्मारक और सार्वजनिक स्थान आतंकियों के निशाने पर रहे हैं। 1996 की गर्मियाँ सबसे काले अध्यायों में से एक हैं, जब राजधानी के सबसे व्यस्त शॉपिंग केंद्रों में से एक, लाजपत नगर बाजार में एक शक्तिशाली बम विस्फोट हुआ, जिसमें 13 लोग मारे गए और दर्जनों घायल हुए। ठीक एक साल बाद, सदर बाजार और करोल बाग से लेकर रानी बाग, चांदनी चौक और पंजाबी बाग में एक चलती बस तक, शहर के कई हिस्सों में सिलसिलेवार विस्फोट हुए। ये विस्फोट शहर के हृदयस्थल बाजारों और सड़कों पर हुए, जहाँ रोजमर्रा की जिंदगी बढ़ती बेचैनी के बीच चल रही थी।
लाल किला, जो अब फिर से कार धमाके से सुर्खियों में है।
दिसंबर 2000 में, एक आतंकवादी समूह ने किला परिसर के अंदर गोलीबारी की, जिसमें दो लोग मारे गए। बमुश्किल एक साल बाद, दिसंबर 2001 में संसद पर हुए हमले ने दिल्ली को एक बार फिर आतंक के केंद्र में ला दिया, जिसमें नौ सुरक्षाकर्मियों और कर्मचारियों की जान चली गई। इसके बाद भी धमों ने और भी दर्द दिया। 2005 में, दिवाली से ठीक दो दिन पहले पहाड़गंज, सरोजिनी नगर और गोविंदपुरी में एक डीटीसी बस में सिलसिलेवार बम विस्फोट हुए, जिनमें 67 से ज्यादा लोग मारे गए और 200 से ज्याद घायल हुए।
राजधानी के बाजारों के बीचों-बीच हुए इन धमाकों से त्योहारी माहौल में डर का माहौल छा गया। तीन साल बाद, 2008 में, कनॉट प्लेस, करोल बाग और ग्रेटर कैलाश में लगभग एक साथ हुए पांच विस्फोटों में 20 से ज्यादा लोग मारे गए और दर्जनों घायल हुए। सोमवार की घटना से पहले आखिरी बड़ा आतंकी हमला 2011 में हुआ था, जब दिल्ली उच्च न्यायालय के बाहर एक ब्रीफकेस बम विस्फोट हुआ था, जिसमें 15 लोग मारे गए थे और 79 घायल हुए थे। लाल किले के पास हुए हालिया विस्फोट के साथ, दिल्ली की शांति एक बार फिर भंग हुई है। साथ ही उन वर्षों की यादें ताजा हो गई हैं जब आतंकवाद शहर की आत्मा को हिलाने की कोशिश करता था।




