नई दिल्ली: दुनिया के पर्यावरण विशेषज्ञों ने एक बार फिर खतरे की घंटी बजा दी है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की ताजा रिपोर्ट ‘एमिशन गैप 2025: टारगेट से चूक‘ में साफ कहा गया है कि देशों के ताजा जलवायु वादों से वैश्विक तापमान में बस थोड़ी-सी कमी ही संभव है। अगर सब कुछ वादों के हिसाब से रहा तो भी सदी के आखिर तक धरती का औसत तापमान 2.3 से 2.5 डिग्री सेल्सियस ऊपर चला जाएगा। याद रहे, पिछले साल यह आंकड़ा 2.6-2.8 डिग्री का था। यानी वादे निभाने पर भी राह में बस हल्की सी रोशनी दिख रही है; लेकिन असल चुनौतियां अभी भी कायम हैं।
यह रिपोर्ट, COP-30 जलवायु सम्मेलन से ठीक पहले आई है, जो ब्राजील में होगा। अगर देश अपनी मौजूदा नीतियों पर ही अड़े रहे, तो तापमान 2.8 डिग्री तक पहुंच सकता है। इससे मानव जीवन, जंगलों, समुद्रों और अर्थव्यवस्थाओं पर कहर टूट पड़ेगा। सोचिए, अभी भी हम वैसी राह पर हैं जो जलवायु आपदाओं को आम बता देगी बाढ़, सूखा, तूफान सब कुछ सामान्य हो जाएगा।
*COP का मतलब आमतौर पर Conference of the Parties (पार्टियों का सम्मेलन) होता है। यह शब्द मुख्य रूप से संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) के संदर्भ में उपयोग किया जाता है।
पेरिस का वादा: 1.5 डिग्री अब क्यों लग रहा दूर?
दस साल पहले पेरिस में हुए COP-21 में दुनिया के नेता एकजुट हुए थे। उन्होंने फैसला लिया कि औद्योगिक युग से पहले के मुकाबले तापमान को 2 डिग्री से नीचे रखना है, और 1.5 डिग्री तक सीमित करने की पूरी कोशिश करेंगे। लेकिन रिपोर्ट चेताती है कि 1.5 डिग्री की यह ‘लक्ष्मण रेखा’ पार होना लगभग तय है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा, “वैज्ञानिकों का मानना है कि अगले कुछ सालों में, शायद 2030 के दहलीज पर, हम इस सीमा को छू लेंगे। हर रोज गुजरता वक्त हमारे रहने लायक कल को और मुश्किल बना रहा है। लेकिन अब हार मानने का नहीं, दौड़ने का वक्त है। 1.5 डिग्री अभी भी हमारा उत्तरी तारा है, अगर महत्वाकांक्षा बढ़ाएं, तो इसे पकड़ सकते हैं। हालांकि, रिपोर्ट मानती है कि एक बार पार होने पर इसे वापस लाना बेहद जटिल होगा। इसके लिए उत्सर्जन में जबरदस्त कटौती जरूरी है, ताकि नुकसान कम हो और बाद में तापमान को फिर से नीचे खींचा जा सके।
वादे अधूरे, रफ्तार सुस्त
UNEP की कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन ने कड़ी चेतावनी दी: पेरिस वादों को निभाने के लिए देशों को तीन मौके मिले, लेकिन हर बार वे चूक गए। योजनाओं से कुछ सुधार हुआ है, लेकिन गति इतनी धीमी है कि अब चमत्कार जैसी कटौती करनी पड़ेगी। दुनिया के हालात तो और बिगड़ते जा रहे हैं। फिर भी, उन्होंने उम्मीद जगाई। समाधान हमारे पास हैं। सस्ती सोलर और विंड एनर्जी तेजी से फैल रही है, मीथेन जैसी गैसों पर काबू के तरीके तैयार हैं। बस, देशों को जोर लगाना होगा। ऐसी कार्रवाई जो नौकरियां पैदा करे, स्वास्थ्य सुधारे, ऊर्जा सुरक्षित करे और अर्थव्यवस्था को बूस्ट दे। रिपोर्ट बताती है कि 2035 के नए उत्सर्जन लक्ष्य (NDCs) सिर्फ 60 देशों ने तय किए हैं, जो वैश्विक उत्सर्जन का 63% कवर करते हैं। ज्यादातर देश पुराने 2030 लक्ष्यों से भी पीछे हैं। याद रखें, NDCs राष्ट्रीय जलवायु योजनाएं हैं, जो हर पांच साल अपडेट होती हैं। यह तीसरा राउंड है, 2035 पर फोकस के साथ। सितंबर तक सिर्फ इतने देशों ने ही सौंपा है।
उत्सर्जन कटौती: अब या कभी नहीं
पेरिस लक्ष्यों के लिए 2019 के मुकाबले 2030 तक उत्सर्जन में 25% कटौती जरूरी है (2 डिग्री के लिए), और 1.5 डिग्री के लिए अगले कुछ सालों में 40%। लेकिन 2024 में उत्सर्जन 2.3% बढ़कर 57.7 गीगाटन CO2 के बराबर हो गया। अगर वादे पूरे भी हुए, तो 2035 तक सिर्फ 15% कमी आएगी, जबकि 55% जरूरी है। ट्रंप प्रशासन के पेरिस से पीछे हटने जैसे कदमों ने तो मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। विशेषज्ञ कहते हैं, 2 डिग्री बचाने के लिए 2035 तक सालाना 35-55% कटौती करनी होगी। और हां, 0.1 डिग्री की छोटी सी बढ़ोतरी भी बड़ा फर्क डालती है, ज्यादा बाढ़, सूखा, बीमारियां, आर्थिक झटके। सबसे ज्यादा नुकसान गरीब देशों को। अगर अब न चेते, तो बाद में महंगी कार्बन कैप्चर तकनीकों पर निर्भरता पड़ेगी, जो अनिश्चित हैं।
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आखिरकार, उम्मीद की किरण
रिपोर्ट सकारात्मक नोट पर खत्म होती है कि पिछले दशक में अनुमान 3-3.5 डिग्री से घटकर 2.5 पर आ गया। स्वच्छ ऊर्जा सस्ती हो रही है। अगर देश एकजुट हों, तो संकट टल सकता है। साथ ही नौकरियां, सेहत और विकास का बूम। G20 की भूमिका अहम है; वे (अफ्रीकी संघ छोड़कर) 77% उत्सर्जन के जिम्मेदार हैं। लेकिन सिर्फ 7 ने 2035 लक्ष्य तय किए, 3 ने घोषित। वहीं, 2024 में उनका उत्सर्जन 0.7% बढ़ा है।



