पिछड़ों, दलितों-मुस्लिमों ने कांग्रेस को समेट दिया बिहार में

1980 से 1990 तक कांग्रेस ने बिहार में पांच मुख्यमंत्री बदले, उसमें सभी सवर्ण थे। इसको लेकर पिछड़े, दलित और मुस्लिम नाराज हो गये और यह नाराजगी बढ़ती गयी, कांग्रेस की सीटे कम होती गयी। आज राहुल गांधी इन्हें लाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब तक कामयाबी नहीं मिली। वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र नाथ राय की विश्लेषण करती यह रिपोर्ट।

Share This Article:

पटना: कभी दलित और ब्राह्मण और मुस्लिम का गठजोड़ ही कांग्रेस को सत्ता में बैठाती थी। अब उन्हीं के बिछड़ने से कांग्रेस प्रदेश में हासिए पर आ गयी। वर्तमान में राहुल गांधी पिछड़ों, दलितों और मुस्लिमों का गठजोड़ कर राजनीति में अपना पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन कामयाब नहीं हो पा रहे हैं। बिहार की राजनीति पर गौर करें तो पिछड़ा, दलित और मुस्लिमों ने ही कांग्रेस को राज्य की राजनीति में समेट कर रख दिया है। इस बार की स्थिति क्या होगी, यह तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा, लेकिन कर्पूरी ठाकुर के उदय से उपजी दलित राजनीति ने कांग्रेस को पीछे धकेलना शुरु किया और अब वह राजनीतिक रूप से बीमार बना दिया।
इस बार राहुल गांधी ने चुनावी अधिसूचना से पूर्व ही बिहार में ज्यादा सक्रियता दिखायी। उन्होंने एसआईआर के विरोध के बहाने भ्रमण किया, लेकिन चुनाव की अधिसूचना जारी होते ही महागठबंधन की अंदरूनी कलह धरातल पर आ गयी, जिससे महागठबंधन के कार्यकर्ताओं में मायूसी छा गयी। इसी अंदरूनी कलह की देन थी कि राहुल गांधी अधिसूचना जारी होने बाद पहली बार 30 अक्टूबर को ही बिहार के दौरे पर निकले। यह कांग्रेस की निष्क्रियता को दर्शाता है।

कांग्रेसी पतन का इतिहास शुरु होता है 1967 से

बिहार में कांग्रेस के पतन का इतिहास 1967 से शुरु होता है। उस समय कांग्रेस के ही बागी नेता महामाया प्रसाद ने पार्टी को सत्ता से दूर कर दिया। उस समय पहली बनी गैर-कांग्रेसी सरकार में अति पिछ़ड़ा वर्ग के नाई समुदाय से कर्पूरी ठाकुर उपमुख्यमंत्री बने। वे पिछड़ों में अति प्रिय थे। यहीं से पिछड़ों के राजनीतिक उत्थान का पहला स्पष्ट संकेत शुरु हो गया। इसको कांग्रेस पढ़ने में असफल रही। यही कारण था कि कांग्रेस ने 1980-90 के दशक में पांच सवर्ण मुख्यमंत्री दिया, जिसका खामियाजा वह आज तक भुगत रही है।

जब आपात काल थोप दिया देश पर

1977 में कांग्रेस ने आपातकाल का बोझ पूरे देश पर थोप दिया। केंद्र में कांग्रेस की सत्ता चली गयी। इसका असर बिहार में भी हुआ। राज्य में जनता पार्टी की सरकार बनी। इस बार कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री बने। उन्होंने सैकड़ों उपजातियों में बंटी पिछड़ी जातियों को एकजुट करने का काम शुरु किया और नवंबर 1978 में बिहार की सरकारी किसेवाओं में उनके लिए 26 फीसदी आरक्षण का प्रावधान कर दिया। यह बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा विस्फोटक क्षण था,जिसे आज ‘कर्पूरी फॉर्मूला’के नाम से जाना जाता है।

अगड़ी जातियों ने आरक्षण का किया था विरोध

अगड़ी जातियों ने इस फैसले का खुलकर विरोध किया। जनता सरकार गठबंधन से बनी थी, जिसके चलते, करीब 1 साल 10 महीने बाद ही कर्पूरी ठाकुर को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हाथ धोना पड़ा। उनकी जगह रामसुंदर दास (दलित) मुख्यमंत्री बनाए गए, लेकिन वह भी एक साल नहीं टिक पाए और फिर राष्ट्रपति शासन लगा। 1980 के मध्यावधि चुनाव में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस फिर सत्ता में लौटी और जगन्नाथ मिश्र दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। 80 के दशक में बिहार की सियासत की नब्ज पर दो नेताओं कर्पूरी ठाकुर और जगन्नाथ मिश्र की जबरदस्त पकड़ थी। कर्पूरी ठाकुर के आरक्षण वाले दाँव के बाद,कांग्रेस ने अगड़ी जातियों द्वारा किए गए विरोध को भांपते हुए,अपनी सत्ता के शीर्ष पर फिर से अगड़ी जातियों खासकर ब्राह्मण और क्षत्रिय का वर्चस्व स्थापित कर दिया।

राजीव गांधी से हो गयी अनबन, कांग्रेस की गुटबाजी चरम पर

जगन्नाथ मिश्र की 1983 में राजीव गांधी से अनबन हो गयी। आंतरिक गुटबाजी चरम पर पहुंच गयी, जिसमें भूमिहार नेता ललितेश्वर प्रसाद शाही का विरोध प्रमुख था। उसके चलते उन्हें हटना पड़ा। इसके बाद, क्षत्रिय चंद्रशेखर सिंह और फिर बिंदेश्वरी दुबे, भागवत झा आजाद, और सत्येंद्र नारायण सिन्हा जैसे अगड़ी जाति के नेता एक के बाद एक सीएम बने। 1980 से 1990 के बीच कांग्रेस ने जिन पाँच नेताओं को सीएम बनाया, उनमें कोई भी पिछड़ी, दलित या मुस्लिम नहीं था।

पिछड़ों को सत्ता से दूर करना कांग्रेस के लिए पड़ा भारी

कांग्रेस की पिछड़ों को सत्ता के शीर्ष से दूर रखने की यह रणनीति ही बिहार में उसकी सियासी जमीन उखाड़ फेंकने का कारण बनी। कर्पूरी ठाकुर के सामाजिक न्याय और आरक्षण के दांव ने बिहार में पिछड़ी राजनीति की ऐसी मजबूत नींव रखी, जिस पर आने वाले 35 वर्षों से अधिक समय तक लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के रूप में सत्ता की बुलंद इमारत खड़ी हुई है।

Sanjay Rai

sanjayrai.dj@gmail.com

संजय राय ने बीते 25 साल के प्रोफेशनल कैरियर में स्वास्थ्य, अपराध, शिक्षा, विकास समेत सभी बीट की कवरेज की है। दिल्ली सरकार, विधानसभा की कार्यवाही, भाजपा, कांग्रेस, आप सरीखे राजनीतिक दलों के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक व आंदोलनात्मक गतिविधियों को भी कवर किया है। कई सत्रों में संसद की कार्यवाही पर भी कलम चलाई है। फिलवक्त NewG India में बतौर सीनियर स्पेशल काॅरेस्पोंडेंट अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

https://x.com/DjSanjayrai

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

न्यूज़लेटर के लिए सब्सक्राइब करें

कैटेगरीज़

हम वह खबरची हैं, जो खबरों के साथ खबरों की भी खबर रखते हैं। हम NewG हैं, जहां खबर बिना शोरगुल के है। यहां news, without noise लिखी-कही जाती है। विचार हममें भरपूर है, लेकिन विचारधारा से कोई खास इत्तेफाक नहीं। बात हम वही करते हैं, जो सही है। जो सत्य से परामुख है, वह हमें स्वीकार नहीं। यही हमारा अनुशासन है, साधन और साध्य भी। अंगद पांव इसी पर जमा रखे हैं। डिगना एकदम भी गवारा नहीं। ब्रीफ में यही हमारा about us है।

©2025 NewG India. All rights reserved.