जलवायु परिवर्तन: उत्सर्जन कटौती से थमेगा समुद्र स्तर का उछाल

IIASA संस्थान के नेतृत्व में ब्रिटेन, बेल्जियम, नीदरलैंड्स और जर्मनी के वैज्ञानिकों की टीम ने मिलकर यह विश्लेषण तैयार किया, जो बताता है कि निकट दशकों की नीतियां 2300 तक समुद्री जलस्तर की ऊंचाई निर्धारित कर देंगी।

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नई दिल्ली: जलवायु संकट के बढ़ते संकेतों के बीच समुद्र तल की चढ़ती सतह सबसे लंबे समय तक असर डालने वाली चुनौती बनकर उभरी है। विशेषज्ञों की राय है कि एक बार यह प्रक्रिया गति पकड़ ले तो इंसानी जीवनकाल में इसे उलटना नामुमकिन हो जाता है। हर उत्सर्जित कार्बन का प्रभाव सदियों तक पीढ़ियों पर पड़ता रहेगा। ‘नेचर क्लाइमेट चेंज’ जर्नल में हालिया प्रकाशित वैश्विक अध्ययन ने इस खतरे की गहराई को नई रोशनी दी है। आईआईएएसए संस्थान के नेतृत्व में ब्रिटेन, बेल्जियम, नीदरलैंड्स और जर्मनी के वैज्ञानिकों की टीम ने मिलकर यह विश्लेषण तैयार किया, जो बताता है कि निकट दशकों की नीतियां 2300 तक समुद्री जलस्तर की ऊंचाई निर्धारित कर देंगी।

अध्ययन की मुख्य दिशा

पारंपरिक अनुमान ज्यादातर 2100 तक सीमित रहते हैं, मगर यह रिसर्च सदियों आगे की तस्वीर पेश करती है। फोकस इस पर है कि 2020 से 2090 के बीच होने वाले उत्सर्जन से समुद्र तल में कितनी ‘अटल’ वृद्धि लॉक हो जाएगी। यानी वर्तमान फैसलों से आने वाली शताब्दियों के लिए कितना स्थायी नुकसान तय हो रहा है।

प्रमुख खुलासे

शोधकर्ताओं का कहना है कि महासागर और ग्लेशियर हजारों सालों की समयसीमा में प्रतिक्रिया देते हैं, इसलिए 2100 के परे सोचना अनिवार्य है। यदि वर्तमान नीतियां बरकरार रहीं तो 2020-2050 के उत्सर्जन अकेले 2300 तक 30 सेमी अतिरिक्त उछाल पैदा करेंगे। 2090 तक जारी रहने पर यह 80 सेमी तक पहुंच सकता है। वहीं पेरिस accord के लक्ष्यों पर तत्काल अमल से करीब 60 सेमी की वृद्धि को अवरुद्ध किया जा सकता है।

वैश्विक व स्थानीय प्रभाव

यह आंकड़े छोटे लगते हैं, लेकिन परिणाम विनाशकारी। तटीय इलाकों में बाढ़ का खतरा, मिट्टी का क्षरण, मीठे जल स्रोतों में नमकीन घुसपैठ और निचले द्वीपों का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा। प्रशांत महासागर के छोटे राष्ट्रों में वैश्विक औसत से ज्यादा उछाल देखा जाएगा, जिसके लिए क्षेत्रीय रणनीतियां जरूरी हैं।

अपरिवर्तनीयता का कारण

वृद्धि के दो स्रोत बर्फीली चादरों का पिघलना और समुद्री जल का थर्मल विस्तार बेहद सुस्त गति से काम करते हैं। उत्सर्जन शून्य करने पर भी ये प्रक्रियाएं सदियों चलती रहेंगी, इसलिए इसे मानव स्केल पर वापस लाना असंभव है।

अनुकूलन की अनिवार्यता

भविष्य की तटीय ढालें, डाइक्स और फ्लड कंट्रोल सिस्टम को 2300 के परिदृश्य को ध्यान में रखकर बनाना होगा। आज के निवेश तय करेंगे कि कितने क्षेत्र बचेंगे या सीमाएं लांघी जाएंगी।

Sakshi Pal

sakshipal8700@gmail.com

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