नई दिल्ली: दुनिया जहां महिलाओं को शिखर पदों पर देख रही है, वहीं एशिया के कुछ कोने आज भी पुरानी जंजीरों में बंधे हैं। यहां प्रधानमंत्री या सर्वोच्च कार्यकारी पद पर कोई महिला कभी नहीं पहुंची। वजहें गहरी हैं, जिनमें कानूनी बाधाएं, सांस्कृतिक रूढ़ियां और धार्मिक दबाव शामिल है। ये देश दिखाते हैं कि प्रगति की रफ्तार कितनी असमान है।
राजशाही वाले देश: सत्ता पुरुषों का गढ़
सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी राष्ट्रों में राजतंत्र की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि सत्ता केवल पुरुष वारिसों को मिलती है। संविधान स्पष्ट रूप से महिलाओं को राजा या प्रधानमंत्री बनने से रोकता है। महिलाएं मंत्रालयों में जगह बना रही हैं, लेकिन शीर्ष कुर्सी सपना ही बनी रहती है। ब्रुनेई में भी सुल्तान की सत्ता अटल है, जहां कोई लोकतांत्रिक चुनाव ही नहीं है।
पूर्वी एशिया के तानाशाही तख्त: परिवार का राज
उत्तर कोरिया का किम वंश सदियों से चला आ रहा है, जहां सत्ता पिता से पुत्र को हस्तांतरित होती है। महिलाओं का राजनीति में प्रभाव नगण्य है। चीन में कम्युनिस्ट पार्टी का वर्चस्व है, लेकिन शी जिनपिंग जैसे पुरुष नेताओं के अलावा कोई महिला प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नहीं बनी। पार्टी की आंतरिक संरचना महिलाओं को ऊपरी स्तर पर कम ही जगह देती है। मंगोलिया और तुर्कमेनिस्तान भी इसी श्रेणी में हैं, जहां सत्ता केंद्रीकृत और पुरुष-प्रधान है।
मध्य एशिया का मेला: संस्कृति और कानून की दीवार
ईरान में इस्लामी कानून महिलाओं को सर्वोच्च पदों से वंचित रखते हैं, सर्वोच्च नेता का पद धार्मिक विद्वानों के लिए आरक्षित है। अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी ने महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को लगभग खत्म कर दिया, न शिक्षा, न नौकरी, न सत्ता। ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे पूर्व सोवियत देशों में भी सांस्कृतिक पूर्वाग्रह महिलाओं को पीछे धकेलते हैं।
दक्षिण-पूर्व एशिया की चुनौतियां: प्रगति धीमी
लाओस और वियतनाम में कम्युनिस्ट शासन के बावजूद कोई महिला शीर्ष नेता नहीं बनी। म्यांमार में आंग सान सू की जैसी नेता भी सैन्य तख्तापलट से हटीं। ये देश दिखाते हैं कि भले ही महिलाएं सक्रिय हों, लेकिन सत्ता का केंद्र पुरुषों के हाथ में रहता है।
क्या बदलेगा भविष्य?
ये देश बताते हैं कि एशिया में लिंग समानता का रास्ता कठिन है। लेकिन बदलाव की हवा चल रही है। शिक्षा और जागरूकता से शायद कल ये दीवारें ढहें। तब तक, ये सवाल खड़े रहेंगे: सत्ता क्यों सिर्फ आधी आबादी की?



