नई दिल्ली: यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सांता बारबरा के वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगले 25 वर्षों में समुद्रों पर मानव गतिविधियों का प्रभाव दोगुना हो जाएगा। जलवायु परिवर्तन, मछलियों की घटती संख्या और प्रदूषण के कारण समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। यह स्थिति तटीय समुदायों की आजीविका, मछली पकड़ने और पर्यटन को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है। शोधकर्ता बेन हैल्पर्न के अनुसार, समुद्र पहले ही भारी दबाव झेल रहे हैं, और 2050 तक यह और तेजी से बढ़ेगा।
समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर खतरा
समुद्रों पर बढ़ता तापमान, समुद्र स्तर में वृद्धि, अम्लीकरण और पोषक तत्वों से होने वाला प्रदूषण पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर रहा है। उष्णकटिबंधीय और ध्रुवीय क्षेत्रों में यह असर सबसे अधिक होगा। अध्ययन बताता है कि समुद्री तापमान में वृद्धि और मछलियों की कमी इसके प्रमुख कारण हैं। हल्पर्न ने बताया कि पहले समुद्र को इतना विशाल माना जाता था कि मानव प्रभाव को नजरअंदाज कर दिया गया, लेकिन अब यह स्पष्ट है कि कोई भी समुद्री क्षेत्र इस संकट से अछूता नहीं है।
तटीय क्षेत्रों पर सबसे ज्यादा मार
तटीय इलाके, जहां मानव समुद्र से सबसे अधिक लाभ लेते हैं, इस दबाव से सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। मछली पकड़ने वाले समुदाय, तटीय पर्यटन और जल संसाधनों पर निर्भर अर्थव्यवस्थाएं खतरे में हैं। 1960 से 2018 तक, वैश्विक मत्स्य उद्योग ने 400 करोड़ टन समुद्री जीवों को पकड़ा, जिससे 56 करोड़ टन पोषक तत्व समुद्र से गायब हो गए। यह पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बड़ा नुकसान है। हिन्द, अटलांटिक और प्रशांत महासागरों के 20-55% हिस्से पहले ही जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हैं, और 2080 तक यह 55-80% तक पहुंच सकता है।
समाधान की राह
शोधकर्ताओं ने जलवायु परिवर्तन को कम करने, मछली प्रबंधन को बेहतर करने और मैंग्रोव जैसे संवेदनशील समुद्री आवासों की रक्षा करने की सलाह दी है। सख्त नीतियों और वैश्विक सहयोग से इस खतरे को रोका जा सकता है। समुद्रों की रक्षा के लिए तत्काल कदम उठाना जरूरी है, वरना मानव जीवन और आजीविका पर इसका असर अपरिवर्तनीय होगा।



