पटना: चुनावी बिगुल बज चुका है। अब तक चुनावों में दूसरों के लिए रणनीति बनाने वाले प्रशांत किशोर भी पहली बार चुनावी मैदान में स्वयं उतर चुके हैं। इस बार ताल ठोकने वाले प्रशांत किशोर बिहार में सुशासन, शिक्षा और रोजगार के अवसरों को बढ़ावा देने के लिए उतर रहे हैं। अब आने वाला समय ही बताएगा कि सुशासन का नाम लेकर राजनीति में उतरने वाले प्रशांत की नैया पार होगी या जाति की हवा उड़ जाएगी।
उन्होंने जन सुराज पार्टी का गठन 2 अक्टूबर 2024 को पटना के वेटरनरी कालेज ग्राउंड में आयोजित सभा में किया था। अब 30 साल से स्थापित सत्ता समीकरणों को चुनौती देने में प्रशांत कितना सफल होंगे, यह तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा, लेकिन इतना जरूर है कि बिना किसी आंधी के स्थापित इस पार्टी को पीके चर्चा में ला दिया है। बिहार में इस पार्टी के बारे में काफी बातें हो रही हैं। गठबंधनों के बनने-बिगड़ने के खेल में मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग उपेक्षित भी महसूस करता रहा है। इन उपेक्षित लोगों से पीके को बहुत अपेक्षा है। उन्हें उम्मीद है कि अब वे किंगमेकर से सीधे किंग बनने की राह पर चल पड़े हैं।
रोहतास में जन्में प्रशांत की बक्सर में प्रारंभिक शिक्षा
बिहार के रोहतास जिले के कोनार गांव में 1977 में जन्मे प्रशांत किशोर की प्रारंभिक शिक्षा बक्सर में हुई। इसके बाद उन्होंने हैदराबाद से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। प्रशांत किशोर ने पब्लिक हेल्थ में पोस्ट ग्रेजुएशन भी किया। इनके पिता बिहार सरकार में चिकित्सक थे। उनके ट्रैक रिकॉर्ड के अनुसार, वे 2014 में भाजपा द्वारा प्रोफेशनल राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में हायर किए गए और भाजपा सफल रही।
फिर सफल रणनीतिकार के रूप में हुए स्थापित
इसके बाद 2015 में उन्होंने बिहार में नीतीश कुमार के गठबंधन को एक मुश्किल लड़ाई में जीत दिलाई। इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, तमिलनाडु में एमके स्टालिन, आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी के लिए रणनीति बनाई। इससे वे एक सफल रणनीतिकार के रूप में स्थापित हो गए।
रणनीतिकार के रूप में कमाए 241 करोड़
रणनीतिकार के रूप में ख्याति पा चुके प्रशांत किशोर ने इससे धन भी बहुत कमाया। उन्होंने बताया कि 2021 से 2023 के बीच रणनीति बनाने के एवज में उन्होंने 241 करोड़ रुपये फीस ली, जिस पर 18 प्रतिशत जीएसटी और करीब 20 करोड़ रुपये इनकम टैक्स दिया। इसके बाद वे खुद चुनाव में उतरने की रणनीति पर काम करने लगे और पिछले साल राजनीतिक पार्टी जन सुराज की घोषणा कर दी।
जब नीतीश ने पार्टी से निकाल दिया
जब वे जनता दल यू में गए और नीतीश के काफी नजदीक हो गए, तो पार्टी में ही उनके कई विरोधी उभर आए। इसके बाद पीके धीरे-धीरे राजनीतिक बनने लगे। नीतीश ने उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया। इसके बाद नागरिकता संशोधन कानून जैसे कई मुद्दों पर पीके का नीतीश से मनमुटाव हो गया और जनवरी 2020 में अनुशासनहीनता का आरोप लगाकर जदयू से बाहर कर दिया गया। यहीं से प्रशांत किशोर के सीधे राजनीतिक मैदान में उतरने की नींव पड़ी।
दो मई 2021 को राजनीतिक पार्टी बनाने का दिया था संकेत
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस और डीएमके की जीत के बाद 2021 में पीके ने चुनावी रणनीतिकार के रूप में कार्य से संन्यास लेने की घोषणा की। उस समय उन्होंने एक टीवी चैनल को 2 मई, 2021 को साक्षात्कार में कहा था कि अब मैं रणनीतिकार के रूप में नहीं रहना चाहता। बहुत कुछ कर लिया, अब विदा लेने का समय आ गया है।
मोतिहारी से शुरू की पदयात्रा, समझा लोगों का भाव
इसके बाद 2 अक्टूबर, 2022 को उन्होंने मोतिहारी के भितिरहवां स्थित महात्मा गांधी आश्रम से पटना तक 3000 किलोमीटर की पदयात्रा शुरू की। उन्होंने ट्वीट कर संकेत दिया कि अब वे ‘वास्तविक मालिकों – जनता’ के पास लौटना चाहते हैं और ‘जन सुराज – जनता का सुशासन’ की ओर कदम बढ़ाएंगे। यह अलग-अलग इलाकों में जाकर आम जनता के भावों को समझने का समय था।
गांधी जयंती पर पार्टी की घोषणा
गांधी जयंती 2024 को उन्होंने राजनीतिक दल स्थापित करने की घोषणा की। प्रशांत किशोर कहते हैं, ’30 साल के लालू-नीतीश के राज ने बिहार को देश का सबसे गरीब राज्य बना दिया। अब अपने बच्चों के भविष्य के लिए वोट देने का समय है।’
रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़े सवाल पूछते हैं
प्रशांत किशोर अपनी जनसभाओं में आम आदमी की रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़े सवाल पूछते हैं। वे राजनीतिक बहस को मोड़ने की ताकत रखते हैं। यही उनकी सबसे बड़ी क्षमता है। जिस बिहार में पहले राजनीति सिर्फ जातियों तक केंद्रित थी, वहां उन्होंने भ्रष्टाचार और विकास को केंद्रीय मुद्दा बनाया।
बड़े नेताओं को घेरने से नहीं करते परहेज
चुनाव आयोग ने बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है। यह चुनाव दो चरणों में 6 और 11 नवंबर को कराया जाएगा। अब सभी पार्टियां चुनावी एलर्ट मोड में हैं। प्रशांत भी इसी मोड में पहले से सक्रिय हैं। उन्होंने सबूतों के साथ बड़े नेताओं को घेरकर जनता को दिखा दिया कि वे हेराफेरी उजागर करने में कोई कोताही नहीं करते।
पीके के सामने समस्या है जातिगत राजनीति
बिहार में जाति को राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता। यही पीके की सबसे बड़ी चुनौती है। दशकों से राजद का ‘एम-वाई’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण और एनडीए का सवर्ण-अति पिछड़ा-महादलित गठबंधन चुनावी नतीजों को तय करता आया है। ऐसे में पीके को किसका वोट मिलेगा और उन्हें कितनी सफलता मिलेगी, यह 14 नवंबर तक पता चलेगा।
रणनीतिकार तो हैं लेकिन राजनेता नहीं
पीके अब तक रणनीतिकार रहे हैं, उन्होंने खुद के भरोसे राजनीति नहीं की। इससे उन्हें टिकट बंटवारे और चुनावी अभियान में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें दशकों पुराने संगठनात्मक ढांचे वाले दलों से मुकाबला करना है।
कहीं अरविंद केजरीवाल की तरह तो नहीं बन जाएंगे पीके
अरविंद केजरीवाल भी दिल्ली में प्रशांत की तरह ही आए थे। केजरीवाल भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन खड़ा कर सत्ता में आए, लेकिन सत्ता मिलने के बाद वे भी दलदल में फंस गए। इसी तरह के आरोप प्रशांत पर भी लगते हैं कि वे सत्ता में आने के बाद लोकलुभावन वादे कर सकते हैं।
नीतीश को भ्रष्ट सरकार का ईमानदार मुखौटा कहते हैं
प्रशांत नीतीश को भ्रष्ट सरकार का ईमानदार मुखौटा कहते हैं। उनका कहना है कि नीतीश की आड़ में पूरी सरकार भ्रष्टाचार में लिप्त है। वे नीतीश को शारीरिक रूप से थका हुआ और मानसिक रूप से अस्वस्थ बताते हैं। बार-बार गठबंधन बदलने की प्रवृत्ति पर हमला करते हुए पीके उन्हें ‘पलटूराम’ कहकर उनकी विश्वसनीयता पर चोट पहुंचाते हैं।
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तेजस्वी को दिलाते जंगलराज की याद
प्रशांत तेजस्वी यादव को उनकी सबसे कमजोर नस, यानी ‘जंगलराज’ की विरासत पर घेरते हैं। वे लोगों को लालू-राबड़ी के 15 साल के शासन की याद दिलाते हैं और कहते हैं कि तेजस्वी की वापसी उसी दौर की वापसी होगी। पीके बार-बार तेजस्वी को ‘9वीं फेल’ कहकर उनकी शैक्षिक योग्यता पर सवाल उठाते हैं और पूछते हैं कि जो खुद दसवीं पास नहीं कर सका, वह 13 करोड़ लोगों का भविष्य क्या संवारेगा?



