जहानाबाद: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से ठीक पहले महागठबंधन ने जहानाबाद जिले के अति पिछड़ा समाज (ईबीसी) वोटरों को साधने के मकसद से 10-सूत्रीय अति पिछड़ा न्याय संकल्प जारी किया है। यह कदम लोकसभा चुनाव 2024 में एनडीए के ईबीसी उम्मीदवार चंदेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी की हार के बाद उत्पन्न असंतोष को भुनाने का प्रयास है। महागठबंधन का दावा है कि यह घोषणा न केवल ईबीसी समुदाय को सशक्त बनाएगी, बल्कि भूमिहार-ईबीसी के बीच की खाई को और गहरा कर एनडीए की रणनीति को विफल कर देगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम जिले की पांच विधानसभा सीटों पर महागठबंधन की स्थिति मजबूत कर सकता है।
लोकसभा चुनाव में हुए नुकसान को पाटना आसान नहीं
एनडीए के कोर वोट बैंक में लोकसभा चुनाव में जो बिखराब यहां हुआ था। उसे पाटना इतना आसान नहीं है। लोकसभा चुनाव में यहां एनडीय से अति पिछड़ा समाज के चंदेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी उम्मीदवार थे, लेकिन एनडीए के कोर वोट बैंक रहे भूमिहार समाज के लोगों ने उनके बजाय बसपा से अपने स्वजातीय पूर्व सांसद डॉ अरुण कुमार के पक्ष में मतदान किया था। जिसके कारण एनडीय उम्मीदवार चंदेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी को करारी हार का सामना करना पड़ा थी। इस करारी हार को अति पिछड़ा समाज के लोग पचा नहीं पा रहे हैं। उन लोगों का स्पष्ट कहना है कि भूमिहार समाज ने वोट नहीं देकर यहां एनडीए की हार सुनिश्चित की थी। ऐसे में यदि उनकी जाति के उम्मीदवार एनडीए से भी आते हैं तो हम लोग भी उन्हे वोट नहीं देंगे।
जहानाबाद, और अरवल पड़ सकता है असर
जहानाबाद के तीन और अरवल के दो विधानसभा में इसका सीधा असर पड़ सकता है। मखदुमपुर सुरक्षित को छोड़कर जहानाबाद घोसी और अरवल से हमेशा भूमिहार उम्मीदवार एनडीए की ओर से मैदान में रहे हैं। वही कुर्था विधानसभा से
कुशवाहा जाति के उम्मीदवार को मैदान में उतर जाता रहा है। यदि अति पिछड़ा और भूमिहार समाज के बीच की दूरी को पाटा नहीं गया तो इन विधानसभा क्षेत्र में कोर वोटर में बड़ा बिखराव देखने को फिर मिलेगा, जो महागठबंधन के उम्मीदवार के लिए वॉक ओवर साबित हो सकता है। ऐसे में एनडीए उम्मीदवार के चयन में फूंक फूंक कर कदम रख रही है।
उसकी कोशिश है कि घोसी और जहानाबाद में से किसी एक सीट पर भूमिहार तो दूसरे पर अति पिछड़ा समाज के उम्मीदवार को मैदान पर उतारा जाय और दोनों ही जीत के लिए एक दूसरे की जरूरत को जनमानस तक पहुंचाया जाए। जिससे वोट का बिखराव रुके और एनडीए की मजबूत स्थिति इस क्षेत्र में कायम हो सके। फिलहाल इन सभी विधानसभा क्षेत्र में महागठबंधन के विधायक हैं। अब देखने वाली बात होगी की इलाके के दो बड़े वोट बैंक अति पिछड़ा और भूमिहार समाज के बीच उत्पन्न हुई राजनीतिक दूरियों को नेतृत्व द्वारा कैसे पाटा जाता है। यदि एनडीय नेतृत्व इस दूरी को पाटने में सफलता प्राप्त कर ली तो फिर महागठबंधन के लिए जीत पाना मुश्किल हो जाएगा, अन्यथा फिर से यहां एनडीए खाली हाथ रह सकती है।



