RSS@100: सेवा व संघर्ष के सौ साल

अपनी स्थापना के शताब्दी वर्ष पर RSS के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने रेशमबाग मैदान में संबोधित किया। इसी संदर्भ में वरिष्ठ पत्रकार बृजनन्दन राजू ने संघ के 100 साल के सफर पर अपने विचार जाहिर किए हैं।

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष मना रहा है। संघ की स्थापना डा. हेडगेवार ने सन 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में की थी। आम जनमानस आरएसएस नाम से इस संगठन से परिचित है। आरएसएस देश का ही नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है।

विश्व के 65 देशों में इस संगठन का काम है। ढ़ाई लाख से अधिक सेवा कार्यों का संचालन संघ व इससे जुड़े संगठन मिलकर करते हैं। यही नहीं, देश में आने वाली हर आपदा विपदा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक सेवा कार्य करते हुए सबसे अग्रिम पंक्ति में दिखते हैं। इसके पीछे स्वयंसेवकों का कोई स्वार्थ नहीं होता। वह नि:स्वार्थ भाव से सेवा कार्य करते हैं। संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार कहते थे कि हिन्दू समाज का सुख मेरा सुख और हिन्दू समाज का दुख मेरा दुख, हिन्दू समाज पर संकट मेरा संकट हिन्दू समाज का अपमान मेरा अपमान ऐसी भावना प्रत्येक हिन्दू के मन में जाग्रत करना ही संगठन का मूलमंत्र है। इसी भाव को मन में धारण कर जब भी देशवासियों की सेवा का अवसर आया संघ के स्वयंसेवक कभी पीछे नहीं रहे।

संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार क्रान्तिकारी थे। उनके जीवन में राष्ट्रभक्ति व सेवा की भावना बचपन से ही देखने को मिलती है। क्रान्तिकारियों से सम्पर्क के उद्देश्य से वह मेडिकल की पढ़ाई के लिए कलकत्ता गए थे। क्योंकि उस समय देश में क्रान्तिकारियों का गढ़ कोलकाता हुआ करता था। उस समय 1913 में बंगाल की दामोदर नदी में आयी भयंकर बाढ़ के समय मेडिकल के छात्र केशव हेडगेवार ने अपने साथियों को लेकर सेवा कार्य किया था। संघ स्थापना के बाद 1926 में नागपुर के पास रामकोट स्थित श्रीराम मंदिर में रामनवमी के दिन बड़ा मेला लगता है। वहां आने वाले हजारों श्रद्धालुों की सब प्रकार से सेवा करने के लिए डा. हेडगेवार ने स्वयंसेवकों को प्रेरित किया था।

वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन राव भागवत अपने बौद्धिक वर्गों में कहते हैं कि ह्रदय की व्यथा संघ बन फूट निकली। देश की तत्कालीन परिस्थितियों की देखकर डॉ. हेडगेवार ने देशभक्ति से ओतप्रोत,अनुशासित व सेवाभावी संगठन के निर्माण की योजना को मूर्तरूप दिया। हर देश व समाज के उत्थान व पतन का कारण वहां के नागरिक होते हैं। इसलिए डॉ. हेडगेवार ने कहा कि हम व्यक्ति निर्माण करेंगे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्थापना काल से शाखा के माध्यम से व्यक्ति निर्माण के काम में लगा है। व्यक्ति निर्माण यानि जिसके अंदर सेवाभाव हो, त्याग व समर्पण की सिद्धता रखता हो।

देश व समाज पर संकट के समय वह खड़ा हो। संघ के स्वयंसेवकों का जीवन सेवामय होता है। स्वयंसेवक समाज के कष्ट देखते ही दौड़ पड़ते हैं। केवल आपदा के समय ही नहीं तो समाज के अभाव, पीड़ा व उपेक्षा को दूर करने के लिए अपनी शक्ति व सामार्थ्य से काम करते हैं। देश हमें देता है सब कुछ हम भी तो कछ देना सीखें। इन पंक्तियों को हृदयंगम कर संघ के स्वयंसेवक हर अवसर पर अपना सर्वस्व समर्पित करने को तत्पर रहते हैं।

प्राणों की बाजी लगाकर हिन्दुओं की रक्षा

अपने जीवन को जोखिम में डालकर भी साहस और तत्परता से सेवा करने का जो संस्कार स्वयंसेवकों के मन में रोपा जाता है उसकी कठोर परीक्षा 1947 में विभाजन से ठीक पूर्व और विभाजन के बाद हुई। विभाजन के समय सर्वाधिक संकटपूर्ण और विकराल चुनौती थी। जब समूचा पंजाब जल रहा था और कांग्रेसी नेता असहाय होकर दिल्ली में पड़े हुए थे ऐसे समय में संकट मोल लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पंजाब के लोगों की रक्षा की। विभाजन के दौरान विनाश के काल में स्वयंसेवकों ने जो भूमिका निभाई वह सदा सर्वदा के लिए आत्म बलिदान, त्याग और शौर्य की गौरवपूर्ण गाथा के रूप में अमर रहेगी।

मार्च 1947 में रावलपिंडी में जो मुस्लिम दंगे भड़क उठे थे, भीषण नरसंहार हो रहा था, लाखों हिंदू बेघर हो गए थे। अनगिनत हिन्दुओं की हत्या की गई। चारों ओर विवशता और नैराश्य का घोर अंधकार था। ऐसे समय में स्वयंसेवकों ने पंजाब सहायता समिति का गठन कर प्रांत की हर तहसील में शिविर खोला। उस शिविर में हिन्दुओं को आश्रय दिया। हिन्दुओं की रक्षा करते हुए उन्हें शिविर तक ले जाने में संघ के सर्वोत्तम कार्यकर्ताओं में से 87 को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी। लाहौर के कुख्यात शाही किले में 120 स्वयंसेवकों को घोर अमानवीय शारीरिक यातनाएं भी दी गईं।

आपातकाल विरोधी संघर्ष में आगे रहा संघ

आपातकाल विरोधी संघर्ष में 1 लाख से भी ज्यादा स्वयंसेवक सत्याग्रह कर जेल गये। आपातकाल के दौरान सत्याग्रह करने वाले कुल 1,30,000 सत्याग्रहियों में से एक लाख से अधिक सत्याग्रही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के थे। मीसा के अधीन जो 30,000 लोग बंदी बनाए गए, उनमें से 25000 से अधिक संघ के स्वयंसेवक थे। जबकि सत्याग्रह और जेल भरने का अनुभव का दावा करने वाली संस्था कांग्रेस ‘ओ’ और समाजवादी दल के ज्यादा लोग नहीं जा पाये।

संघ के बाद अकाली दल की संख्या थी करीब 13 हजार थी। बाबा जयगुरूदेव भी मात्र तीन से चार हजार लोग को ही जेल भेज सके। सोशलिस्ट पार्टी के नेताओं की संख्या बहुत सीमित थी, फिर भी अक्सर आपस में झगड़ते रहते थे। आपातकाल विरोधी संघर्ष में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 कार्यकर्ता अधिकांशतः बंदीग्रहों और कुछ बाहर आपातकाल के दौरान बलिदान भी हुए।

वनवासी क्षेत्रों की शिक्षा की ज्योति जला रहा एकल अभियान

भारत के सुदूर गांवों और वनवासी क्षेत्रों में एकल अभियान के माध्यम से 85,551 स्कूल संचालित किये जा रहे हैं। एकल विद्यालयों के माध्यम से वनवासी क्षेत्रों शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव आया है। एकल के माध्यम से भारत के 1,00,000 गाँवों और आदिवासी क्षेत्रों में 1 करोड़ से ज़्यादा छात्रों को साक्षर किया जा चुका है। वर्तमान में एकल संस्था के 85,551 स्कूल हैं। इन विद्यालयों में 2.25 बच्चे नामांकित हैं। करीब एक लाख युवाओं को कौशल का प्रशिक्षण दिया जा चुका है।

दिव्यांगों की सेवा में तत्पर भारत विकास परिषद

भारत विकास परिषद डेढ़ लाख परिवारों के माध्यम से अहर्निश सेवा कर रहा है। यह संगठन विशेषरूप से दिव्यांग मुक्त भारत के लिए काम कर रही है। भारत विकास परिषद की ओर से अब तक तीन लाख से अधिक दिव्यांगों को कृत्रिम अंग प्रदान किये गये हैं। परिषद सेवा व स्वास्थ्य के करीब दो हजार स्थायी प्रकल्पों का संचालन कर रही है। इन प्रकल्पों में दिव्यांग सहायता, विद्यालय, फिजियोथेरेपी सेन्टर, चल चिकित्सालय है। कोटा शहर में 200 बेड का अस्पताल भी भारत विकास परिषद संचालित कर रहा है।

राष्ट्रीय सेवा भारती की सराहनीय पहल

स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि ‘त्याग और सेवा भारत के सर्वश्रेष्ठ आदर्श हैं’। संघ के स्वयंसेवक इसी भाव काम करते हैं। चक्रवात,सुनामी,बाढ़,भूकम्प,अकाल जैसी प्राकृतिक  यहीं नहीं समय—समय पर रेल दुर्घटनाओं,विमान हादसों सहित अन्य प्रकार के संकटों के समय में भी स्वयंसेवकों ने पीड़ितों की सभी प्रकार की सेवा करके अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया है। नर सेवा नारायण सेवा के ध्येय को लेकर समाज में वंचित,अभावग्रस्त,उपेक्षित एवं पीड़ित लोगों के सर्वांगीण विकास हेतु जीवन रक्षण के लिए सेवा क्षेत्र में कार्यरत एक अखिल भारतीय स्तर का संगठन राष्ट्रीय सेवा भारती है। सेवा भारती सम्पूर्ण भारत में शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन और सामाजिक आयामों के अन्तर्गत 44,121 सेवा कार्य संचालित कर रही है। सेवा स्वावलंबन एवं विकास का कार्य करने वाली हजारों स्वयंसेवी संस्थाओं को सेवा कार्यों के लिए समय—समय पर प्रोत्साहित कर समन्वय एवं सहयोग देने का काम सेवा भारती करती है।

बिहार में अकाल के समय 971 कुएं खुदवाए

1966 में बिहार के अधिकांश भागों में भयंकर अकाल पड़ा। संकट की इस घड़ी में हजारों स्वयंसेवकों ने 971 कुएं खोदे और लगभग 21000 अकाल पीड़ित परिवारों में भोजन और वस्त्र बांटे। 1977 में तमिलनाडु के चक्रवात के समय भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ही सर्वप्रथम सहायता कार्य का श्रीगणेश कर 3125 क्विंटल अनाज तथा 250000 के वस्त्र और औषधियों का वितरण किया। संघ कार्यकर्ताओं ने 10 गांव में सहायता कार्य किया और 5773 परिवारों की सेवा की। कई गांव में 360 नए घर बनाकर प्रभावितों को दिए गए। 1987-88 में जब गुजरात में भयंकर सूखा पड़ा, फसलें पूर्णताः चौपट हो गई थी। लाखों लोग बेकारी-अनुदान पर जी रहे थे। पशुधन भी चौपट हो गया था। प्रसिद्ध गिर वन के सिंहों के लिए भी सरकार को पेयजल की व्यवस्था करनी पड़ी। ऐसे संकट के समय स्वयंसेवकों द्वारा 1,45,310 पशुओं को रखने के लिए 123 शिविर खोले गए।

उत्तराखण्ड की त्रासदी व भूकंप के समय सेवा

1991 में उत्तराखण्ड के गढ़वाल क्षेत्र में उत्तरकाशी और टिहरी जिलों में भयंकर भूकंप आया। भूकंप में 768 व्यक्तियों की मृत्यु हो गई तथा 20,700 घर धराशाई हो गए। इसके फलस्वरूप लाखों लोग बेघर हो गए तथा रोटी कपड़ा और भवन की मौलिक आवश्यकताओं से भी वंचित हो गए। एक करोड रुपए से भी अधिक के तंबू, तिरपाल, कंबल, ऊनी कपड़े और खाद्य पदार्थ सहायता सामग्री के रूप में 60 ट्रकों में भरकर अभावग्रस्त क्षेत्रों में अभिलंब पहुंचाए गए। प्रथम चरण में ही 500 गांव निश्चित कर सहायता कार्य चलाये गए। भूकंप से सर्वाधिक पीड़ित क्षेत्रों में 21 केंद्रों पर पहले 3 सप्ताह तक 60000 से भी अधिक भूकंप पीड़ितों को खाना खिलाया गया। अपने कार्य के दूसरे चरण में समिति ने 10 जिलों के 400 घरों के पुनर्निर्माण का कार्य पूरा किया। वहीं, वर्ष 2013 में केदारनाथ की भयानक त्रासदी के बाद भी सेवा भारती ने अभूतपूर्व सेवा की।  

गुजरात में 400 पक्के मकान बनवाये

1997 में उड़ीसा राज्य में वर्षा न होने से सूखा और अकाल पड़ा। उड़ीसा के आठ जिलों के 47 प्रखण्ड सूखे से अत्यधिक प्रभावित हो गए। वनवासी कल्याण आश्रम ने निराश्रितों को चावल, बच्चों के लिए दूध और पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था की। वनवासी कल्याण आश्रम ने 3771 गांवों के 30138 व्यक्तियों को कुल 11,221 कुंतल चावल का वितरण किया। इसी तरह 2043 गांवों में रहने वाले 148074 गरीब किसानों 3580 कुंतल प्रदान किये गये। इसके अलावा बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए 1556 गांवों के 33022 बच्चों को 180 कुंतल दुग्ध का चूर्ण वितरित किया गया। पशुओं के लिए 170 गांवों की 2000 गायों के लिए 1035 कुंतल दाना चारा की व्यवस्था की गयी। संघ के स्वयंसेवकों ने 508 गांवों में जलाशयों के भीतर अस्थाई कुएं खुदवाए। गुजरात में कच्छ व भुज के विनाशकारी भूकम्प को कौन भूल सकता है। यहां पर सेवा भारती ने 400 पक्के मकान, 23 गांवों में स्कूल, 14 गांवों में मंदिर,अस्पताल और सभी सुविधाओं से युक्त गांव का पुननिर्माण कराया।     

कोविड के संकट काल में सेवा

कोरोना संकट की घड़ी में जब संपूर्ण देश में लाक डाउन लगा और सब लोग अपने घरों में रहने को मजबूर हुए तब संघ के हजारों स्वयंसेवक अपने जान की परवाह न करते हुए सेवा कार्य के लिए निकल पड़े। कोरोना संकट के काल में सेवा कार्य के दौरान कई स्वयंसेवकों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी है। कोविड के दौरान देशभर में करीब 92 हजार से अधिक स्थानों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा सेवा कार्य चलाया गया। इन सेवा कार्यों में साढ़े पांच लाख से अधिक संघ कार्यकर्ता लगे। संघ ने 73,81,802 लाख राशन किट वितरित कराया। साढ़े चार करोड़ लोगों को भोजन पैकेट वितरित किया गया। नब्बे लाख मास्क का वितरण किया और 20 लाख प्रवासी लोगों की सहायता की गई।

इसके अलावा ढ़ाई लाख घुमंतू लोगों की सहायता की गई। कोरोना वायरस के प्रकोप के दौरान मातृशक्ति की भूमिका भी किसी से कम नहीं रही। संघ परिवार से जुड़ी माताओं बहनों ने बड़ी मात्रा में मास्क बनाने का कार्य किया। देशभर में 63 लाख से अधिक मास्क संघ कार्यकर्ताओं द्वारा नि:शुल्क बांटा गया। देशभर में 63 लाख से अधिक मास्क संघ कार्यकर्ताओं द्वारा नि:शुल्क बांटा गया। कोरोना के मरीजों के इलाज के लिए जब रक्त की आवश्यकता पड़ी तो संघ के युवा कार्यकर्ताओं ने आगे आकर 60,239 यूनिट रक्तदान किया। वहीं संघ द्वारा देशभर में 7,11,46,500 परिवारों तक सीधे राशन किट पहुंचाई गई। कार्यकर्ताओं के त्याग, परिश्रम, बलिदान तथा समाज के सहयोग से संघ आज भी बढ़ता जा रहा है।

बृजनंदन राजू,
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और विचार इनके निजी हैं।
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Navneet Sharan

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