नई दिल्ली: गर्मियों की विदाई के साथ ही आर्कटिक (Arctic) महासागर में बर्फ की चादर इस साल फिर से चिंताजनक स्तर पर सिकुड़ गई। नेशनल स्नो एंड आइस डेटा सेंटर (एनएसआईडीसी) और नासा के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 10 सितंबर 2025 को यहां समुद्री बर्फ का विस्तार महज 4.60 मिलियन वर्ग किलोमीटर रह गया। यह आंकड़ा नौ साल के सैटेलाइट रिकॉर्ड में दसवें स्थान पर आता है, जो 2008 और 2010 के स्तर के बराबर है। वैज्ञानिकों का कहना है कि हालांकि यह नया रिकॉर्ड नहीं है, लेकिन यह लंबे समय से चली आ रही गिरावट की कहानी को और मजबूत करता है। आखिर यह घटती बर्फ कितनी खतरनाक है? आंकड़े बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन का यह असर न सिर्फ ध्रुवीय इलाकों को बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित कर सकता है।
सितंबर में सिकुड़न का पैटर्न: रिकॉर्ड तो नहीं, लेकिन ट्रेंड चिंताजनक
आर्कटिक में बर्फ का यह चक्र प्राकृतिक है, सर्दियों में जमाव, गर्मियों में पिघलाव। लेकिन सितंबर हर साल न्यूनतम विस्तार का महीना होता है। इस बार भी वही हुआ। एनएसआईडीसी के अनुसार, 2025 का यह स्तर 2012 के ऐतिहासिक न्यूनतम (3.39 मिलियन वर्ग किमी) से 1.21 मिलियन वर्ग किमी ज्यादा है, लेकिन 1981-2010 के औसत से 1.62 मिलियन वर्ग किमी कम। नासा के गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर के क्रायोस्फेरिक साइंसेज लैब प्रमुख नाथन कुर्ट्ज ने कहा, हालांकि इस साल का आर्कटिक समुद्री बर्फ क्षेत्र रिकॉर्ड न्यूनतम नहीं बना, लेकिन यह गिरावट के दिशा को दर्शाता है। 1979 से चली आ रही निगरानी में, पिछले 19 वर्षों में सभी 19 सबसे कम न्यूनतम इसी दौर के हैं। प्रति दशक 12.1 प्रतिशत की यह कमी बराबर 74,000 वर्ग किलोमीटर सालाना नुकसान के बराबर है, जितना दक्षिण डकोटा राज्य का आकार।
साल की शुरुआत से ही संकेत: जनवरी में दूसरा सबसे कम विस्तार
यह गिरावट नई नहीं है। 2025 की शुरुआत ही बताती है कि समस्या गहरी है। एनएसआईडीसी के आंकड़ों में जनवरी का औसत विस्तार 13.13 मिलियन वर्ग किलोमीटर रहा, जो सैटेलाइट रिकॉर्ड में दूसरा सबसे कम है। 1981-2010 के औसत से यह 1.29 मिलियन वर्ग किलोमीटर कम था। ग्रीनलैंड के आसपास के इलाकों में तापमान सामान्य से कहीं ज्यादा ऊंचा रहा, जो बर्फ जमाव को रोकने का बड़ा कारण बना। कोलोराडो यूनिवर्सिटी के वॉल्ट मेयर, जो एनएसआईडीसी से जुड़े हैं, बताते हैं, पिछले 19 सालों से आर्कटिक महासागर में न्यूनतम कवरेज 2007 से पहले के स्तर से नीचे ही रहा है, और 2025 में यह सिलसिला टूटा नहीं।
जिम्मेदार कौन? बढ़ता तापमान और असामान्य मौसम
इस सबकी जड़ में वैश्विक तापमान वृद्धि है। 19वीं सदी के अंत से ध्रुवों पर तापमान करीब तीन डिग्री सेल्सियस चढ़ चुका है, जो वैश्विक औसत से चार गुना तेज है, इसे ‘आर्कटिक एम्प्लिफिकेशन’ कहते हैं। नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) के अनुसार, 2024 आर्कटिक का दूसरा सबसे गर्म साल था, जहां सतह का तापमान 1900 के बाद का दूसरा ऊंचा दर्ज किया गया। गर्म समुद्र बर्फ को तेजी से पिघला रहे हैं, जो हवा को और गर्म कर रही है। 2012 की तरह इस साल भी शुरुआती पिघलाव तेज था, लेकिन अगस्त में रफ्तार धीमी पड़ी, फिर भी ट्रेंड रुका नहीं। मानवजनित ग्रीनहाउस गैसें इस चक्र को तेज कर रही हैं, जिससे आर्कटिक पहले ही बदलाव का शिकार हो चुका है।
भविष्य का अंधेरा चित्र: 2030 तक बर्फ-मुक्त गर्मियां?
नए अध्ययनों से साफ है कि खतरा वास्तविक है। एक हालिया रिसर्च के मुताबिक, गर्मियों में आर्कटिक बर्फ 2030 तक गायब हो सकती है—यह अनुमान से एक दशक पहले। 2050 तक तो यह पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। उत्सर्जन कम करने से भी यह प्रक्रिया पूरी तरह रुकने की उम्मीद कम है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि अगले दशक में आर्कटिक पहली बार ‘बर्फ-मुक्त’ हो सकता है, जो नई जलवायु व्यवस्था का संकेत देगा।
वन्यजीवों पर सीधा प्रहार: ध्रुवीय भालुओं का संकट
यह सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं, जीवन पर असर पड़ रहा है। ध्रुवीय भालू जैसे जीवों को शिकार और आराम के लिए बर्फ चाहिए, लेकिन घटते कवरेज से उनका अस्तित्व खतरे में है। एक अध्ययन बताता है कि गर्म आर्कटिक में वायरस, बैक्टीरिया और परजीवियों का खतरा बढ़ रहा है, जो इन प्रजातियों को और कमजोर कर रहा है। वैश्विक स्तर पर, यह पिघलाव समुद्र स्तर बढ़ाने, मौसम पैटर्न बिगाड़ने और पारिस्थितिकी असंतुलन का कारण बनेगा।



