बिहार में ‘कमजोर‘ होने के बावजूद कांग्रेस बन सकती है बड़ी खिलाड़ी

बिहार की राजनीति में कांग्रेस का इतिहास उतना ही पुराना है जितनी आजादी की कहानी. लेकिन, वर्ष 1990 के बाद लालू प्रसाद यादव के उभार के साथ कांग्रेस का आधार लगातार खिसकता गया. कभी पूर्ण बहुमत के साथ एकछत्र राज करने वाली पार्टी विधानसभा में सिमटती चली गई और अब उसकी स्थिति बेहद कमजोर हो गई है। गुलशन राय खत्री की रिपोर्ट

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नई दिल्ली: बिहार में लंबे अर्से से कांग्रेस हाशिए पर है और फिलहाल वह बीते कुछ सालों से राष्ट्रीय जनता दल के जूनियर पार्टनर की भूमिका निभा रही है। पिछले विधानसभा चुनाव को देखें तो कांग्रेस को महज 19 ही सीटों पर जीत मिली थी, जो 2015 के मुकाबले आठ कम थीं। इसके बावजूद इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की अहम भूमिका बनी हुई है।

अगर कांग्रेस अपने चुनावी प्रदर्शन में सुधार नहीं करती तो इस बार भी महागठबंधन की राह आसान नहीं होगी। दरअसल, भले ही बिहार में कांग्रेस की भूमिका को कम करके आंका जाए लेकिन वास्तव में वह महागठबंधन के लिए एक स्टेबलाइजर की तरह है। यानी कांग्रेस अगर बेहतर करती है तो वह महागठबंधन को बूस्ट करने में मदद करेगी।

कांग्रेस की ये हैं चुनौतियां

बिहार में इस बार भी एक ओर बीजेपी, जेडीयू और छोटी पार्टियों वाला एनडीए है और दूसरी ओर आरजेडी, कांग्रेस, वाम दलों और छोटी पार्टियां हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में भी महागठबंधन के पिछड़ने की वजह कांग्रेस को माना गया था, क्योंकि उसका सीटों का जीत प्रतिशत सबसे कम था। 70 में से महज 19 सीटों पर ही कांग्रेस जीत सकी थभ यानी 27 प्रतिशत जबकि उसकी सीनियर पार्टनर ने 144 सीटों पर लड़कर 75 सीटें जीतीं यानी 52 फीसदी। इसी गठबंधन में शामिल वाम ने 19 सीटों पर लडकर 12 सीटों पर जीत हासिल की थी।

कांग्रेस और महागठबंधन के लिए सावधानी जरुरी

ऐसे में कांग्रेस के लिए सबसे जरुरी है कि वह अधिक सीटों पर लड़ने की जिद्द करने की बजाए मजबूत सीटों पर लड़कर अपना जीत का प्रतिशत बढ़ाती है तो इसका फायदा महागठबंधन को ही मिलेगा। इसके साथ ही सबसे ज्यादा जरुरी है कि कांग्रेस और आरजेडी के बीच इस तरह का संतुलन बने कि जमीनी स्तर पर भी वोट ट्रांसफर हो सके। अमूमन देखा गया है कि राज्य के स्तर पर गठबंधन होने के बावजूद दोनों ही पार्टियों के नेता अपनी अपनी सीट पर खड़े सहयोगी पार्टी के उम्मीदवार की मदद नहीं करते, जिसका खामियाजा पूरा महागठबंधन भुगतता है। ऐसे में कांग्रेस के लिए जरुरी है कि सिर्फ टिकट बंटवारे तक ही नहीं बल्कि चुनाव प्रचार और फिर वोट ट्रांसफर के लिए वह आरजेडी उम्मीदवारों की मदद करे। ऐसा ही आरजेडी को भी करना पड़ेगा। इसके अलावा उसे उम्मीदवारों के चयन में भी दोनों ही दलों को सावधानी बरतनी होगी।

महागठबंधन के लिए कांग्रेस का महत्व

बिहार की राजनीति में भले ही कांग्रेस को कमजोर खिलाड़ी के तौर पर देखा जारहा है लेकिन कई मायनों में वह महागठबंधन के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। कांग्रेस अकेले भले ही कुछ न कर सके लेकिन वह बीजेपी विरोधी वोटों के बिखराव को रोकने से लेकर राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों को उठाने और विपक्ष को विश्वसनयता दे सकती है।
बिहार में भले ही कांग्रेस का नेतृत्व कमजोर हो लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उसके पास राहुल गांधी, प्रियंका गांधी जैसे नेता हैं, जिनके जरिए महागठबंधन, एनडीए को बेरोजगारी, महंगाई, आर्थिक नीतियों व किसानों की समस्याओं को लेकर घेर सकता है। वैसे भी कांग्रेस का नेतटवर्क छोटे कस्बों व गांवों तक मौजूद है। जिसके जरिए वह मुस्लिम, दलित और पिछड़ी जातियों के बीच परंपरागत वोट महागठबंधन के पाले में ला सकती है।

Sanjay Rai

sanjayrai.dj@gmail.com

संजय राय ने बीते 25 साल के प्रोफेशनल कैरियर में स्वास्थ्य, अपराध, शिक्षा, विकास समेत सभी बीट की कवरेज की है। दिल्ली सरकार, विधानसभा की कार्यवाही, भाजपा, कांग्रेस, आप सरीखे राजनीतिक दलों के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक व आंदोलनात्मक गतिविधियों को भी कवर किया है। कई सत्रों में संसद की कार्यवाही पर भी कलम चलाई है। फिलवक्त NewG India में बतौर सीनियर स्पेशल काॅरेस्पोंडेंट अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

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