पटना: इतिहास के पन्नों पर नये अध्याय लिखने में बिहार हमेशा आगे रहा है, लेकिन उसे सहेजकर रखना बिहार की आदत नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन की बात करें या स्वतंत्रता के बाद भ्रष्टाचार व बेरोजगारी के खिलाफ आंदोलन की बात यहां के युवाओं ने हमेशा पूरे देश को राह दिखाया है। यहां की धरती ने साथ रहते हुए भी विरोध करने का राह भी दिखाया है। यहां स्वतंत्रता आंदोलन में भी खुदी राम बोस ने हंसते-हंसते फांसी को गले लगा लिया।
श्रीकृष्ण सिंहा और अनुग्रह नारायण ने भी स्वतंत्रता आंदोलन में गजब की भूमिका निभाई। दोनों एक दूसरे के साथ भी रहे और दोनों एक दूसरे के विरोधी भी। जैसे आधुनिक समय में लालू और नितिश एक दूसरे सहयोगी भी रहे और आज विरोधी भी। आजादी के बाद श्रीकृष्ण सिंहा और अनुग्रह नारायण की जोड़ी ने बिहार के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।
आजादी के बाद श्रीकृष्ण सिंहा और अनुग्रह की जोड़ी ने किया विकास का काम
बिहार में चीनी और वनस्पति तेल सर्वाधिक उत्पादित होता रहा। पचास के दशक के मध्य तक, भारत का 25 प्रतिशत चीनी उत्पादन बिहार से होता था। कृषि और बागवानी में भी बिहार आगे रहा, यहां बागवानी उत्पादों का 50 प्रतिशत यहाँ उत्पादित होता था। चावल और गेहूं का उत्पादन लगभग 29 प्रतिशत था। डालमियानगर एक बड़ा कृषि-औद्योगिक शहर था।
जैसे बढ़ा भ्रष्टाचार, सड़क पर उतरने में देर नहीं किये युवा
लेकिन यह विकास की रफ्तार कुछ दिनों बाद ही राजनीतिक राजनीति का शिकार होने लगी। विकास की रफ्तार मंद पड़ने लगी। भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा था। बेरोजगारी दर भी बढ़ने लगी। ऐसे में छात्रों ने पुन: एक बार आंदोलन का राह पकड़ा। सत्तर का दशक छात्र आंदोलन के नाम से ही जाना जाएगा, जो पूरे देश को राह दिखाने का काम किया। इस दशक के आंदोलन से निकली चिंगारी ने सत्ता परिवर्तन करने का काम किया। इस छात्र आंदोलन की ही देन आज लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार सहित अनेकों बिहार के दिग्गज नेता मौजूद हैं।
सबसे बड़े छात्र आंदोलन की गवाह बनी बिहार की धरती
आजादी के बाद पूरे राष्ट्र में सबसे बड़ा छात्र आंदोलन का भी गवाह बिहार की धरती बनी। यहां से उठी चिंगारी ने जे.पी जैसे नेता को कांग्रेस के खिलाफ सबसे बड़ा चेहरा बना दिया और कांग्रेस को सत्ता से हटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। 1970 का दशक बिहार में छात्र आंदोलन आगे बढ़कर बोल रहा था। छोटे-छोटे मुद्दों पर छात्र सड़कों पर उतर जाते थे
जब कुलपति ने शिक्षामंत्री के बेटे को ग्रेस मार्क देकर कर दिया पास
इसी समय बिहार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री का बेटा मगध विवि में फेल हो गये। वहां विवि के कुलपति ने ग्रेस मार्क देकर पास कर दिया। इस पर पहले से ही उग्र छात्र इसके खिलाफ आक्रोशित हो गये। पूरा मगध छात्र आंदोलन में शामिल हो गया। पुलिस ने लाठियां भाजी तो पूरा बिहार जुट गया। जैसे-जैसे विस्तार होता गया, मुद्दे भी कई जुटते चले गये। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार आदि मुद्दा आंदोलन का आधार बनने लगा।
गुजरात में जेपी के जाने से पहले हटा दिये गये सीएम
इसी समय गुजरात में भी छात्र आंदोलन चल रहा था। जे.पी को गुजरात पहुंचने का न्यौता दिया। अब मुद्दा बढ़ता गया। वहां जेपी के जाने से पहले ही वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमन भाई पटेल को नौ फरवरी 1974 को हटा दिया गया। इससे बिहार के छात्रों का उत्साह बढ़ गया और आंदोलन तेज हो गया। 24 फरवरी को छात्रों ने मुख्यमंत्री आवास के सामने अनशन किया।
छात्र आंदोलन के लिए बनी संचालन समिति
आंदोलन की रफ्तार बनाये रखने के लिए छात्र संचालन समिति बनायी गयी। इस समिति में लालू प्रसाद यादव, सुशील कुमार मोदी, नीतिश कुमार, शिवा नंद, रविशंकर प्रसाद आदि शामिल किये गये। आज भी बिहार की राजनीति में ये नेता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आ रहे हैं।
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जब छात्रों ने किया था विधानसभा का घेराव
18 मार्च 1974 को छात्रों ने विधानसभा घेराव का निर्णय लिया। जय प्रकाश नारायण के सहयोगी रह चुके कुमार अनुपम का कहना है कि 18 मार्च को विधानसभा का सेशन शुरु होने वाला था। इस कारण यह आंदोलन की तिथि तय की गयी थी। उस समय चारों तरफ नाकेबंदी कर दी गयी। इसके बावजूद सुबह से ही छात्र सड़क पर निकल आये, लेकिन पुलिस ने गोलियां बरसानी शुरू कर दी।



