Pacific Ocean की गहराइयों से मिली तीन नई मछलियो की प्रजातियाँ

इसी क्रम में अमेरिकी शोधकर्ताओं ने पूर्वी प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) के अथाह गहराई वाले क्षेत्रों में मछलियों की तीन नई प्रजातियां खोजी हैं। ये खोजें 3,268 से 4,119 मीटर की गहराई पर की गईं, जहां सूर्य की किरणें कभी नहीं पहुंच पातीं और पानी का दबाव इतना भयानक होता है कि सामान्य जीवों को कुचल सकता है।

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नई दिल्ली: समुद्र की गहराइयां हमेशा से वैज्ञानिकों के लिए एक अनसुलझी पहेली बनी हुई हैं, जहां हर नई खोज पुराने रहस्यों को और उजागर कर देती है। इसी क्रम में अमेरिकी शोधकर्ताओं ने पूर्वी प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) के अथाह गहराई वाले क्षेत्रों में मछलियों की तीन नई प्रजातियां खोजी हैं। ये खोजें 3,268 से 4,119 मीटर की गहराई पर की गईं, जहां सूर्य की किरणें कभी नहीं पहुंच पातीं और पानी का दबाव इतना भयानक होता है कि सामान्य जीवों को कुचल सकता है।

स्नेलफ़िश: एक अलग ही परिवार

इन मछलियों को स्नेलफिश परिवार (लिपारिडे) से जोड़ा गया है, जो गहरे समुद्र में जीवित रहने की अद्भुत क्षमता के लिए जानी जाती हैं। पहली प्रजाति को ‘बम्पी स्नेलफिश’ (कैरप्रोक्टस कोलिकुली) नाम दिया गया है। यह मछली गुलाबी रंग की है, जो बबलगम जैसी लगती है, और इसके गोलाकार सिर, बड़ी नीली आंखें तथा त्वचा पर छोटे-छोटे उभार इसे अन्य स्नेलफिश से अलग करती हैं। इसके पंखों की खास बनावट चट्टानों से चिपकने में सहायक होती है। 2019 में कैलिफोर्निया के मोन्टेरे बे एक्वेरियम रिसर्च इंस्टीट्यूट (एमबीएआरआई) के शोधकर्ताओं ने इसे पहली बार रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल से देखा था। अब तक यह केवल एक ही बार दर्ज की गई है, लेकिन पुराने वीडियो फुटेज से और जानकारी मिलने की उम्मीद है।

दूसरी प्रजाति ‘डार्क स्नेलफिश’

दूसरी प्रजाति ‘डार्क स्नेलफिश’ (कैरप्रोक्टस यैंसी) है, जो पूरी तरह काली रंग की है। इसका सिर गोल है, मुंह क्षैतिज रूप से फैला हुआ है, और गलफड़ों तथा पंखों की संरचना इसे गहरे समुद्र की अन्य स्नेलफिश से अलग बनाती है। यह प्रजाति डीप-सी बायोलॉजिस्ट पॉल यैंसी के सम्मान में नामित की गई है। तीसरी प्रजाति ‘स्लीक स्नेलफिश’ (पैरालिपारिस एम) है, जो लंबी और पतली काली मछली है। इसमें सक्शन डिस्क की कमी है, और जबड़ा तेज कोण पर बाहर निकला होता है। इसका नाम स्टेशन एम पर आधारित है, जहां इसे सबसे पहले खोजा गया। ये सभी प्रजातियां 2025 में आधिकारिक रूप से वर्णित की गई हैं।

खोज की विधि: उन्नत तकनीक का कमाल

ये मछलियां न्यूयॉर्क के स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क एट जेनेसियो (एसयूएनवाई जेनेसियो) की जीवविज्ञानी प्रोफेसर मैकेन्जी ई. गेरिंगर और उनकी टीम द्वारा खोजी गईं। शोध आर्टिकल जर्नल ‘इचथियोलॉजी एंड हर्पेटोलॉजी’ में 27 अगस्त 2025 को प्रकाशित हुआ। केवल वीडियो देखकर इनकी पहचान मुश्किल थी, इसलिए शोधकर्ताओं ने डीएनए विश्लेषण, माइक्रो-सीटी स्कैनिंग और 3डी मॉडलिंग का सहारा लिया। हड्डियों, ऊतकों और पंखों की गिनती जैसे सूक्ष्म विवरणों की जांच से इनकी नई प्रजाति साबित हुई। एमबीएआरआई के वाहनों ने इनकी इमेजरी कैप्चर की, जबकि फ्राइडे हार्बर लेबोरेटरीज में सीटी स्कैन किए गए।

क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज?

स्नेलफिश परिवार की ये मछलियां समुद्री जीवन की विविधता का प्रतीक हैं। ये उथले पानी से लेकर सबसे गहरी खाइयों तक फैली हुई हैं, और अत्यधिक दबाव, ठंड तथा पूर्ण अंधकार में जीवित रहने के लिए जेली जैसी नरम त्वचा और सक्शन डिस्क जैसी विशेषताओं से लैस होती हैं। ये पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, जहां ये छोटे जीवों को खाती हैं और बड़े शिकारियों का भोजन बनती हैं। प्रोफेसर गेरिंगर कहती हैं, गहरे समुद्र की दुनिया जैव विविधता का खजाना है। ये तीन नई प्रजातियां हमें याद दिलाती हैं कि पृथ्वी पर जीवन के रहस्य अभी भी अनछुए हैं। बिना आधिकारिक नाम और वर्णन के, किसी प्रजाति का संरक्षण या जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का आकलन असंभव होता है। यह खोज न केवल वैज्ञानिक समझ बढ़ाती है, बल्कि समुद्री संरक्षण के लिए भी जरूरी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन से गहराई वाले क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं, और ऐसी खोजें हमें सतर्क करती हैं।

समुद्र की गहराइयों में जीवन की अनुकूलन क्षमता

स्नेलफिश जैसी प्रजातियां दिखाती हैं कि कैसे जीव कठोर परिस्थितियों में ढल जाते हैं। इनका जेली जैसा शरीर दबाव सहन करता है, जबकि ढीली त्वचा अंधेरे में छिपने में मदद करती है। प्रशांत महासागर, जो पृथ्वी का सबसे बड़ा आवास है, अभी भी 80% से अधिक अनदेखा है। ये खोजें हमें प्रेरित करती हैं कि और अन्वेषण से क्या-क्या राज खुल सकते हैं।

Sakshi Pal

sakshipal8700@gmail.com

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