नई दिल्ली: डिजिटल युग में डेटा प्राइवेसी और सूचना के अधिकार (RTI) के बीच टकराव ने एक बार फिर संसद को हिला दिया है। मानसून सत्र के दौरान DMK सांसद टी. एम. सेल्वागणपति ने इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव से तीखे सवाल पूछे, जिसमें DPDP एक्ट 2023 के RTI पर असर को लेकर चिंता जताई गई। मंत्री ने साफ लफ्जों में कहा कि यह एक्ट RTI को कमजोर नहीं करता, बल्कि नागरिकों की प्राइवेसी को मजबूत करते हुए पारदर्शिता का संतुलन बनाता है। क्या यह जवाब विवाद को शांत कर पाएगा, या डेटा प्रोटेक्शन का नया कानून RTI की ‘आजादी’ पर सेंध लगाएगा? आइए, जानते हैं पूरी स्टोरी।
संसद में उठा विवादास्पद सवाल: DPDP एक्ट RTI की ‘कमजोरी’ लाएगा?
मानसून सत्र की गर्माहट के बीच सांसद सेल्वागणपति ने तारांकित प्रश्न के जरिए सरकार को घेरा। उनके सवालों का सार कुछ यूं था:
क्या DPDP एक्ट और इसके ड्राफ्ट नियम RTI को कमजोर करेंगे? सांसद ने चिंता जताई कि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट से सूचना मांगने वालों के अधिकारों पर अंकुश लगेगा। RTI की धारा 8(1)(j) पर असर? क्या यह एक्ट RTI के इस प्रावधान को ‘ओवरराइड’ कर देगा, जो पर्सनल इंफॉर्मेशन को प्रोटेक्ट करता है? अमान्य सूचना का दायरा बढ़ेगा? 2023 के डेटा प्राइवेसी कानून से क्या RTI अप्लाई करने वालों को ज्यादा ‘इनवैलिड’ रिस्पॉन्स मिलेंगे? कानूनी विशेषज्ञों की राय? कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि RTI में संशोधन से भारत का ट्रांसपेरेंसी फ्रेमवर्क कमजोर पड़ जाएगा। चर्चा हुई या नहीं? क्या सरकार ने मीडिया और सिविल सोसाइटी के साथ डिबेट की, और अगर हां, तो रिजल्ट क्या?
मंत्री वैष्णव का पलटवार: ‘विस्तृत कंसल्टेशन, कोई टकराव नहीं’
DPDP एक्ट का उद्देश्य: यह एक्ट डिजिटल पर्सनल डेटा को ऐसे प्रोसेस करता है कि व्यक्ति की प्राइवेसी सुरक्षित रहे, साथ ही वैध जरूरतों के लिए डेटा यूज हो सके।” मंत्री ने जोर दिया कि यह सुप्रीम कोर्ट के के.एस. पुट्टास्वामी केस (जिसमें प्राइवेसी को फंडामेंटल राइट घोषित किया गया) के अनुरूप है।
RTI संशोधन का लॉजिक: DPDP के जरिए RTI की धारा 8(1)(j) में बदलाव प्राइवेसी और RTI के बीच ‘बैलेंस’ लाता है। यह संशोधन मौजूदा ज्यूडिशियल प्रिसिडेंट्स को कोडिफाई करता है और कानूनी टकराव रोकता है।
जनहित का दरवाजा खुला: RTI की धारा 8(2) के तहत, अगर पब्लिक इंटरेस्ट में हो, तो पर्सनल इंफॉर्मेशन डिस्क्लोज की जा सकती है भले ही प्राइवेसी हर्ट हो। मंत्री ने उदाहरण दिया कि ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट 1923 के बावजूद जनहित प्राथमिक है।
कंसल्टेशन प्रोसेस: DPDP बिल पर 22,600 से ज्यादा सुझाव आए, जिन पर गहन विचार किया गया। नियम बनाने में भी मीडिया और सिविल सोसाइटी से बात हुई। यह एक्ट पारदर्शिता और प्राइवेसी दोनों को मजबूत करता है, न कि किसी एक को कमजोर।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स? ट्रांसपेरेंसी vs प्राइवेसी का वैश्विक डिबेट
भारत में DPDP एक्ट GDPR (EU का डेटा प्रोटेक्शन लॉ) से इंस्पायर्ड है, लेकिन RTI जैसा मजबूत ट्रांसपेरेंसी टूल कहीं और कम ही मिलता है। कानूनी विशेषज्ञों का मत बंटा है कि पक्षमतसमर्थक (गवर्नमेंट व्यू)संशोधन से डेटा ब्रिच रुकेंगे, RTI का दुरुपयोग (जैसे पर्सनल डेटा लीक) कम होगा।विरोधी (RTI एक्टिविस्ट्स)अमान्य सूचना का दायरा बढ़ेगा, जिससे RTI फाइल करने वाले हतोत्साहित होंगे। पारदर्शिता का ‘बड़ा झटका’। सुप्रीम कोर्ट के पुट्टास्वामी जजमेंट ने प्राइवेसी को RTI के ऊपर रखा था, लेकिन अब सवाल यह है – क्या DPDP इसे और सख्त कर देगा?
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आगे क्या? मीडिया-सिविल सोसाइटी डायलॉग की मांग
मंत्री ने बताया कि नियम ड्राफ्टिंग में मीडिया हाउसेज से चर्चा हुई, लेकिन डिटेल्स शेयर नहीं किए। सिविल सोसाइटी ग्रुप्स अब और ओपन डिबेट की मांग कर रहे हैं। अगर आप RTI यूजर हैं, तो सतर्क रहें – अगली RTI फाइल करने से पहले DPDP नियम चेक करें।



