नई दिल्ली: कुपोषण लंबे समय से बच्चों की सेहत के लिए एक गंभीर चुनौती रहा है, लेकिन अब इसका रूप बदल रहा है। जहां पहले कम वजन, नाटापन और भोजन की कमी इसके मुख्य लक्षण थे, वहीं अब मोटापा और बढ़ता वजन इसकी नई परिभाषा बन रहा है। यूनिसेफ की ताजा वैश्विक पोषण रिपोर्ट-2025 के मुताबिक, दुनिया का हर दसवां बच्चा (5 से 19 साल की उम्र) मोटापे की चपेट में है। यानी करीब 18.8 करोड़ बच्चे इस समस्या से जूझ रहे हैं, जो उन्हें डायबिटीज, हृदय रोग और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों की ओर धकेल रही है। यह स्थिति न केवल बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य को खतरे में डाल रही है, बल्कि उनके मानसिक और सामाजिक विकास पर भी गहरी चोट कर रही है।
‘फीडिंग प्रॉफिट’ रिपोर्ट की मुख्य बातें
‘फीडिंग प्रॉफिट: हाउ फूड एनवायरनमेंट्स आर फेलिंग चिल्ड्रन’ नाम की यह रिपोर्ट 190 से ज्यादा देशों के आंकड़ों पर आधारित है। यह बच्चों के खानपान में आए बड़े बदलाव को रेखांकित करती है। एक तरफ जहां लाखों बच्चे पर्याप्त पौष्टिक भोजन से वंचित हैं, वहीं दूसरी तरफ कई बच्चे जंक फूड और अस्वास्थ्यकर खानपान की वजह से मोटापे का शिकार हो रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि इतिहास में पहली बार मोटापे से जूझ रहे बच्चों की संख्या कम वजन वाले बच्चों से ज्यादा हो गई है। यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक कैथरीन रसेल ने कहा, “कुपोषण अब सिर्फ भूख या कम वजन की समस्या नहीं है। मोटापा भी उतना ही बड़ा खतरा बन चुका है, जो बच्चों के भविष्य को जोखिम में डाल रहा है। आज फल, सब्जियां और पौष्टिक आहार की जगह चीनी और वसा से भरे प्रोसेस्ड फूड ने ले ली है।”
मोटापे का बढ़ता ग्राफ, कम वजन का घटता आंकड़ा
रिपोर्ट में सामने आया कि साल 2000 से अब तक कम वजन वाले बच्चों (5 से 19 साल) की संख्या 13% से घटकर 9.2% रह गई है। दूसरी ओर, मोटापे से ग्रस्त बच्चों की तादाद में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है, जो 3% से बढ़कर 9.4% हो गई है। यानी उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण एशिया को छोड़कर दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में मोटापे से जूझ रहे बच्चे अब कम वजन वाले बच्चों से ज्यादा हैं। खासकर प्रशांत द्वीप क्षेत्रों में यह समस्या गंभीर है, जहां पारंपरिक भोजन की जगह सस्ते, हाई-कैलोरी आयातित खाद्य पदार्थों ने ले ली है। उदाहरण के लिए, नियू में 38%, कुक आइलैंड्स में 37% और नाउरू में 33% बच्चे मोटापे का शिकार हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, जब किसी बच्चे का वजन उसकी उम्र, लिंग और कद के हिसाब से सामान्य से बहुत ज्यादा हो, तो उसे अधिक वजन माना जाता है। मोटापा इसका और गंभीर रूप है, जो इंसुलिन प्रतिरोध और हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्याओं को जन्म देता है। अमीर देशों में भी हालात चिंताजनक हैं, चिली में 27%, अमेरिका और यूएई में 21% बच्चे मोटापे से प्रभावित हैं।
जंक फूड और विज्ञापनों का जाल
रिपोर्ट के अनुसार, 5 से 19 साल की उम्र के करीब 39.1 करोड़ बच्चे बढ़ते वजन की समस्या से जूझ रहे हैं, यानी हर पांचवां बच्चा इसकी चपेट में है। इनमें से आधे मोटापे से पीड़ित हैं। यह स्थिति आगे चलकर डायबिटीज, हृदय रोग और कुछ कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती है। बाजार की ताकतें बच्चों के खानपान पर हावी हो रही हैं। चीनी, नमक और अस्वास्थ्यकर वसा से भरे फास्ट फूड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ उनकी थाली का हिस्सा बन गए हैं। यूनिसेफ के 170 देशों में 64,000 से ज्यादा युवाओं पर किए गए सर्वे में 75% ने बताया कि उन्होंने पिछले एक हफ्ते में जंक फूड या सॉफ्ट ड्रिंक के विज्ञापन देखे। 60% ने कहा कि इन विज्ञापनों ने उन्हें ऐसे खाद्य पदार्थ खाने के लिए उकसाया।
संघर्षग्रस्त देशों में भी 68% युवा इन विज्ञापनों के संपर्क में आए। अगर इस पर लगाम नहीं लगाई गई, तो मोटापे से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएं 2035 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था को सालाना 4 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का नुकसान पहुंचा सकती हैं। भारत में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने भी चेतावनी दी है कि ज्यादातर पैकेज्ड और फास्ट फूड में नमक और वसा की मात्रा FSSAI की सीमा से कहीं ज्यादा है। सीएसई ने हानिकारक खाद्य पदार्थों पर लाल चेतावनी लेबल लगाने और सख्त लेबलिंग नियम लागू करने की मांग की है।
बदलाव की शुरुआत
कई देश इस दिशा में कदम उठा रहे हैं। मेक्सिको ने स्कूलों में जंक फूड और मीठे पेय की बिक्री पर रोक लगाई, जिससे 3.4 करोड़ बच्चों का खानपान बेहतर हुआ। भारत ने भी ट्रांस-फैट पर लगाम कसी है। 2022 में FSSAI ने खाद्य तेलों और वसा से बने उत्पादों में ट्रांस-फैट को अधिकतम 2% तक सीमित कर दिया, जिससे भारत WHO की नीति अपनाने वाला पहला निम्न-मध्य आय वाला देश बना। इस कदम से 140 करोड़ लोगों को ट्रांस-फैट के जोखिम से बचाव मिला है। यूनिसेफ ने सरकारों से अपील की है कि वे बच्चों के लिए स्वस्थ खानपान का माहौल बनाएं। इसके लिए स्कूलों में जंक फूड पर प्रतिबंध, सख्त लेबलिंग नियम, हानिकारक खाद्य पदार्थों पर टैक्स और गरीब परिवारों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने जैसे कदम जरूरी हैं।
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बच्चों का भविष्य दांव पर
आज बच्चों के सामने सवाल यह है कि उनका बचपन पौष्टिक भोजन से स्वस्थ होगा या जंक फूड और मोटापे की गिरफ्त में फंस जाएगा? यूनिसेफ का संदेश साफ है, अगर अभी कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ियां कुपोषण और मोटापे की दोहरी मार झेलेंगी। बच्चों के स्वस्थ भविष्य के लिए सरकारों, समाज और परिवारों को एकजुट होकर काम करना होगा।



